संस्कृत अनुवाद कैसे करें – संस्कृत अनुवाद की सरलतम विधि – sanskrit anuvad ke niyam

sanskrit anuvad ke niyam

संस्कृत अनुवाद कैसे करें – संस्कृत अनुवाद की सरलतम विधि – sanskrit anuvad ke niyam

संस्कृत अनुवाद एक कला है। यदि आप इस कला से परिचित होना चाहते हैं तो (भले ही आप संस्कृत के विषय में कुछ नहीं जानते, किन्तु सीखने की इच्छा रखते हैं) आइये हमारे साथ केवल पन्द्रह दिन प्रतिदिन एक घण्टा । निश्चय ही आपकी यह धारणा बदल जाएगी कि संस्कृत कठिन है। शर्त केवल ये है कि आज के पाठ को कल पर न छोड़ें, रोज का रोज याद कर लें।

किसी भी वाक्य में कर्ता और क्रिया प्रमुख होते हैं। जैसे— वह पढ़ता है। यहाँ ‘वह’ कर्ता है तथा ‘पढ़ता है’ क्रिया पद है। संस्कृत में सभी कर्ता ‘पुरुष’ कहलाते हैं और उन्हें तीन भागों में विभाजित किया जाता है— प्रथम पुरुष, मध्यम पुरुष और उत्तम पुरुष ।

(१) कर्ता ज्ञान – उत्तम पुरुष में केवल मैं, मध्यम पुरुष में तू या तुम तथा प्रथम पुरुष में शेष सभी कर्ता प्रयुक्त होते हैं। जैसे
राम श्याम सीता वह वे आदि

यहाँ तक कि ‘आप’ भी ‘प्रथम पुरुष’ में ही प्रयुक्त होता है।

(२) वचन-ज्ञान– यहाँ एक बात ध्यान देने योग्य है कि उक्त तीनों पुरुषों के एकवचन द्विवचन तता बहुवचन तीन भेद हो जाते हैं। यदि काम करने वाला एक है तो एकवचन । यदि काम करने वालों की संख्या दो है तो द्विवचन तथा यदि कर्ता तीन या तीन से अधिक हैं तो बहुवचन का प्रयोग करेंगे। जिसे इस प्रकार भी प्रदर्शित कर सकते हैं
प्रथम पुरुष
वह सः –

वह (स्त्री) = सा

कौन = कः

यह = अयम्

वह (पुस्तक) तत्

राम रामः –

रमा रमा

आप = भवान्

.आप (स्त्री) = भवती
वे दोनों = तौ

वे दोनों (स्त्री) = ते

कौन दोनों = कौ

ये दोनों = इमौ

  • वे दोनों (पुस्तकें) = ते

दो राम = रामौ

दो रमा = रमे

आप दोनों भवन्तौ

आप दोनों (स्त्री) = भवत्यौ

बहुवचन

वे सब = ते

वे सब (स्त्री) = ताः

कौन सब = के

ये सब = इमे

वे सब (पुस्तकें) = तानि

. बहुत से राम = रामा:

बहुत सी रमा = रमा:

आप सब = भवन्तः

आप सब (स्त्री) = भवत्यः

मध्यम पुरुष तू या तुम = त्वम् तुम दोनों = युवाम् तुम सब = यूयम्
उत्तम पुरुष मैं = अहम् हम दोनों = आवाम् हम सब = वयम्

विशेष— उपर्युक्त कर्ताओं को पुरुष एवं वचन के साथ पूर्ण शुद्ध रूप से स्मरण कर लेना चाहिए, क्योंकि छात्र प्रायः इनका प्रयोग करते समय विसर्ग हलन्त अथवा मात्रा की गलती करते हैं। जैसे— वे युवाम् पर दीर्घ ऊ ‘यूवाम्’ तथा यूयम् पर हस्व उ का प्रयोग करके ‘युयम्’ लिखते है, जो गलत है। साथ ही वे हलन्त आदि का भी विशेष ध्यान नहीं रखते हैं। अतः संस्कृत अनुवाद सीखने से पहले इनका ठीक प्रकार से प्रयोग पुरुष आदि का ठीक-ठीक ज्ञान अत्यावश्यक है।

(३) हलन्त और विसर्ग – इसी प्रसङ्ग में हलन्त और विसर्ग के बारे में बताना भी उचित होगा। किसी वर्ण के अन्त में दो बिन्दु । प्रयोग किए जाने को विसर्ग कहते हैं। इसके उच्चारण में ‘ह’ की ध्वनि का आभास होता है। इसका उच्चारण मुख में कण्ठ से किया जाता है। जैसे— सः = वह।

अन्त में प्रयुक्त व्यञ्जन के नीचे टेढ़ी लाइन (म्) को हलन्त कहा जाता है। इसका प्रयोजन जिसके नीचे प्रयोग किया जाता है, में स्वर के अभाव को प्रदर्शित करना होता है, क्योंकि म का विच्छेद म् + अ किया जा सकता है। ठीक इसी प्रकार हम किसी भी व्यञ्जन से उसमें स्थित स्वर को निकाल कर प्रदर्शित कर सकते हैं।

अतः जिस व्यञ्जन पर भी हलन्त का प्रयोग किया जाए तो उसका अर्थ है— उस व्यञ्जन में स्वर नहीं है। जैसे— वयम् = हम सब, यहाँ म् हलन्त युक्त कहा जाएगा। इसे हम उससे पूर्व वर्ण पर अनुस्वार लगाकर भी प्रदर्शित कर सकते हैं। जैसे— वयं, किन्तु यदि ‘वयम’ लिखेंगे तो गलत होगा।


(४) स्मरण करने की सरल विधि- संस्कृत शब्दों को स्मरण करते समय इस बात का विशेष ध्यान रखें कि इन्हें ‘सः’ का अर्थ है ‘वह’, इस रूप में याद न करके ‘वह’ के लिए शब्द प्रयुक्त होगा ‘सः’ इस प्रकार याद करने का अभ्यास करना चाहिए। ऐसा करने से अनुवाद करते समय प्रयोग में सुविधा रहेगी। जैसे ‘आज’ की संस्कृत है— ‘अद्य’। इस रूप में यदि हमें याद है तो जब अनुवाद में – आज शब्द आएगा तो हमें, अद्य तुरन्त स्मरण आ जाएगा, जिसके प्रयोग में कोई कठिनाई नहीं होगी। धातुओं को याद करते समय भी इसी बात को ध्यान में रखें।

(५) क्रियाओं का ज्ञान – अभी हमनें ऊपर बताया कि वाक्य में कर्ता और क्रिया दो प्रमुख तत्त्व हैं। क्रिया के लिए संस्कृत में धातुओं का प्रयोग किया जाता है। जैसे— ‘चलना’ क्रिया के लिए .चल् धातु, ‘खेलना’ के लिए खेल् अथवा .क्रीड् तथा ‘हँसना’ के लिए .हस्।

संस्कृत में लगभग २००० धातुएँ प्रयुक्त हुई हैं, किन्तु प्रयोग की दृष्टि से केवल में १०० धातुओं से कार्य चल जाता है। अतः उन धातुओं को भलीप्रकार याद कर लेना चाहिए । धातु शब्द के प्रयोग की अपेक्षा शब्द से पूर्व (1) इस प्रकार के चिह्न का प्रयोग करना चाहिए। जैसे— पठ् धातु लिखने की अपेक्षा .पठ् लिखना अधिक उचित है।

विशेष – धातुओं के विषय में एक बात और ध्यान देने योग्य है- ‘सभी धातुओं के अन्त में यदि व्यञ्जन हो तो उसे हलन्त करते हैं। जैसे— .गम् – जाना।

(६) लिङ्ग-ज्ञान– संस्कृत में तीन लिङ्ग होते हैं— पुल्लिंग, स्त्रीलिङ्ग, नपुंसकलिङ्ग । जिन शब्दों से पुरुष जाति का बोध होता है, वे पुल्लिंग कहलाते हैं। जैसे- राम कहने से पुरुष का बोध हो रहा है। अतः राम पुल्लिंग हुआ। इसी प्रकार जिनके कहने पर स्त्री जाति का बोध हो, वे स्त्रीलिंङ्ग कहलाते हैं। जैसे कमला कहने पर स्त्री का बोध हो रहा है। अतः यह स्त्रीलिङ्ग कहलाएगा।

ठीक इसी प्रकार कुछ शब्द निर्जीव पदार्थों के द्योतक हैं जो न पुल्लिंग में आते हैं और न ही स्त्रीलिङ्ग में, वे नपुंसकलिङ्ग कहलाते हैं। जैसे- पत्रम्, पुस्तकम्, जगत् आदि।

(७) क्रियाओं के पुरुष और वचन – जिस प्रकार कर्ताओं के तीन पुरुष और तीन वचन होते हैं। ठीक उसी प्रकार क्रियाएँ भी तीन पुरुष और तीन वचन वाली होती हैं। इन्हें भलीभाँति याद कर लेना चाहिए

(लट् लकार = वर्तमानकाल) पढना = .पठ्

प्रथम पुरुष पठति पठतः पठन्ति

मध्यम पुरुष पठसि पठथः पठथ

उत्तम पुरुष पठामि पठावः पठामः

(८ ) काल ज्ञान – वर्तमान भूत और भविष्यत तीन कालों से तो आप परिचित होंगे। जो चल रहा है, उसे वर्तमानकाल कहते हैं। संस्कृत में इस काल के वाक्यों को बनाने के लिए लट् लकार का प्रयोग करते हैं। उपर्युक्त, पठ् धातु के रूप लट् लकार में ही दिए हुए हैं। जैसे वह पढ़ता है। वह पढ़ रहा है। वर्तमान काल के वाक्य हैं।

जो व्यतीत हो चुका उसे भूतकाल कहते हैं। जैसे- उसने पढ़ा। वह गया। वह खेलता था। इस प्रकार के वाक्यों का अनुवाद बनाने के लिए लङ् लकार का प्रयोग किया जाता है। जैसे- सः अपठत्। सः अगच्छत् । सः अक्रीडत् ।

जो कार्य भविष्य में होना है। जैसे- वह जायेगा। यह भविष्यकाल का वाक्य कहा जाएगा तथा इसे बनाने के लिये लृट् लकार का प्रयोग करेंगे। सः गमिष्यति। सा पठिष्यति ( वह पढ़ेगी ) ।

इसके अतिरिक्त संस्कृत अनुवाद में आज्ञाकाल (लोट् लकार), चाहिए अर्थ में (विधिलिङ्ग लकार) का भी प्रयोग किया जाता है। उनका उल्लेख हम बाद में करेंगे। सर्वप्रथम हम अनुवाद का प्रारम्भ वर्तमान काल के वाक्यों से करते हैं

वर्तमान काल की पहचान यदि वाक्य के अन्त में ता है, ती हैं, ते हैं अथवा रहा है, रही है, रहे हैं या केवल है या हैं आए तो हमें जानना चाहिए कि वाक्य वर्तमान काल का है। ऐसे वाक्यों का अनुवाद करने के लिए हम लट् लकार का प्रयोग करेंगे।

अब मान लीजिए हमें अनुवाद करना है- वह पढ़ता है। तो इसके लिए हमें इस क्रम से निम्न बातों पर विचार करना होगा

१. वाक्य किस काल का है ?

२. उस काल में किस लकार का प्रयोग करेंगे ?

३. वाक्य में क्रिया क्या प्रयुक्त हुई है?

४. उस क्रिया के लिए किस धातु का प्रयोग होगा?

५. उस धातु के उस लकार में किस प्रकार रूप चलेंगे ?

६. वाक्य का कर्ता कौन है? उसका पुरुष और वचन ?

अब हम उक्त वाक्य के परिप्रेक्ष्य में उपर्युक्त बिन्दुओं पर विचार करते हैं। १. क्योंकि वाक्य के अन्त में ‘ता है’ का प्रयोग हुआ है, इसलिए ऊपर बताई गई पहचान के आधार पर यह वाक्य वर्तमान काल का हुआ।

२. वर्तमान काल में लट् लकार का प्रयोग होगा।

३. वाक्य में ‘पढ़ना’ क्रिया का प्रयोग हुआ है।

४. ‘पढ़ना’ क्रिया के लिए ‘पठ्’ धातु का प्रयोग होता है। ५. .पठ् धातु के वर्तमानकाल अर्थात् लट् लकार में रूप चलते हैं— पठति, पठतः पठन्ति इत्यादि ।

६. वाक्य का कर्ता है, ‘वह’। जो प्रथम पुरुष का है एवं एक होने से हुआ

‘एकवचन’ अर्थात् ‘वह’, ‘प्रथम पुरुष एकवचन का कर्ता हुआ। इसके बाद इस नियम को याद करें-‘ महत्त्वपूर्ण नियम- जिस पुरुष और वचन का कर्ता होता है, उसी पुरुष और वचन की क्रिया का प्रयोग करेंगे।

उपर्युक्त वाक्य में कर्ता प्रथम पुरुष एकवचन का होने से क्रिया भी प्रथम पुरुष, एकवचन ‘पठति’ का ही प्रयोग करेंगे। इसलिए वह पढ़ता है’, वाक्य का संस्कृत अनुवाद हुआ, ‘सः पठति’, क्योंकि वह की संस्कृत है— सः । उक्त बिन्दुओं के आधार पर निम्न वाक्यों का भी अभ्यास करें

अभ्यास १ वह पढ़ता है, २. तुम हो, ३. मैं पढ़ता हूँ, ४. तुम दोनों पढ़ते हो, ५. तुम सब पढ़ते हो, ६. वे दोनों पढ़ते हैं, ७. हम दोनों पढ़ते हैं, ८. वे सब पढ़ते हैं, ९. हम सब पढ़ते हैं, १० हरि पढ़ता है, ११. राम पढ़ता है, १२ रमा पढ़ती है, १३. कौन पढ़ता है, १४. कमला पढ़ती है, १५. आप पढ़ते हैं, १६. आप दोनों पढ़ते हैं, १७. आप सब पढ़ती हैं, १८. आप सब पढ़ते हैं, १९ वह पढ़ती है, २०. वे दोनों पढ़ती हैं, २१. वे सब पढ़ती हैं, २२. यह पढ़ता है, २३. ये दोनों पढ़ते हैं, २४. ये सब पढ़ते हैं, २५. कौन पढ़ते हैं।

अब देखें क्या आपने अनुवाद ठीक किया है

१. सः पठति २. त्वम् पठसि ३ अहम् पठामि ४. युवाम् पठ्थ: ५ यूयम् पठथ ६. तौ पठतः ७. आवाम् पठावः ८. ते पठन्ति ९. वयम् पठामः १०. हरिः पठति ११. रामः पठति १२. रमा पठति १३. कः पठति १४. कमला पठति १५. भवान् पठति १६ भवन्तौ पठतः १७. भवत्यः पठन्ति १८ भवन्तः पठन्ति . १९. सा पठति २०. ते पठतः २१ ताः पठन्ति २२. अयम् पठति २३. इमौ पठतः २४. इमे पठन्ति २५. के पठन्ति ।

ध्यान रखें- १. हरिः रामः आदि पदों पर यदि आपने विसर्गों का प्रयोग नहीं किया तो वाक्य गलत होगा, क्योंकि यहाँ विसर्ग सुप् प्रत्यय का रूप है। इस प्रत्यय के प्रयोग के बिना हरि’ पद संज्ञा वाला न होने से प्रयोग के योग्य ही नहीं होगा (नापदं प्रयुञ्जीत- जो पद नहीं उसका प्रयोग नहीं करते हैं ) ।

२. रमा, कमला सा आदि स्त्रीलिङ्ग पदों पर विसर्गों का प्रयोग नहीं करेंगे, क्योंकि प्रथमा विभक्ति एकवचन में इनके ये ही रूप बनेंगे।

३. वाक्य संख्या २० में ‘ते’ के साथ ‘पठतः’ क्रिया पद का प्रयोग होने पर शंका नहीं करनी चाहिए, क्योंकि यहाँ ‘ते’ स्त्रीलिङ्ग (तत्) का द्विवचन का रूप है,
रूप चलेंगे- सा ते, ताः ।
‘राम’ शब्द के रूप’ (अकार, राम् + अ अकार है अन्त में जिसके, पुल्लिंग)

प्रथमा विभक्ति—–राम:———–रामौ———रामाः
द्वितीया विभक्ति ——रामम्————रामौ——–रामान्
तृतीया विभक्ति—–रामाभ्याम्—-रामेण——–रामै:
चतुर्थी विभक्ति—–रामाय——–रामाभ्याम्———रामेभ्यः
पञ्चमी विभक्ति—–रामात्———रामाभ्याम्——–रामेभ्यः
षष्ठी विभक्ति——रामस्य—-रामयोः—-रामाणाम्
सप्तमी विभत्ति——-रामे———–रामयोः——-रामेषु

सभी अकारान्त पुल्लिंग शब्दों के रूप राम के समान ही चलेंगे। जैसे बालक, नर, वानर, (बन्दर) मनुष्य, अश्व, सूर्य, चन्द्र, सुर, असुर, गज, मेघ, छात्र, अध्यापक, नृप, पर्वत, आश्रम, समुद्र, मृग, भ्रमर, सिंह, वक, अनल, ग्राम, कर (हाथ ) मोदक (लड्डू), चतुर, पवन, विद्यालय, जनक, पुत्र, कपोत, काक आदि। इन शब्दों का बोल कर अभ्यास करें। जैसे— समुद्रः समुद्रौ, समुद्राः, इत्यादि
आज पहले दिन इतना ही यद् कर लें और अच्छे से अभ्यास कर ले |
आगे की प्रक्रिया पाठ – 2 में बतायेगे|

कुछ अन्य उदहारण

हम लोग विद्यालय जाते है । — वयं विद्यालयं गच्छामः ।
मुझे घर जाना चाहिये । — अहं गृहं गच्छेयम्‌ ।
यह राम की किताब है । — इदं रामस्य पुस्तकम्‌ अस्ति ।
हम सब पढ़ते हैं । — वयं पठामः ।


सभी छात्र पत्र लिखेंगे । — सर्वे छात्राः पत्रं लिखिष्यन्ति ।
मै विद्यालय जाऊंगा । — अहं विद्यालयं गमिष्यामि ।
प्रयाग में गंगा -यमुना का संगम है । — प्रयागे गंगायमुनयोः संगमः अस्ति ।
हम सब भारत के नागरिक हैं । —- वयं भारतस्य नागरिकाः सन्ति ।
वाराणसी गंगा के पावन तट पर स्थित है । — वाराणसी गंगायाः पावनतटे स्थितः अस्ति ।
वह गया । — -सः आगच्छ्त् ।


वह क्यों लज्जित होता है ? — -सः किमर्थम् लज्जते ?
हम दोनों ने आज चलचित्र देखा । — आवां अद्य चलचित्रम् अपश्याव ।
हम दोनों कक्षा में अपना पाठ पढ़ेंगे । — आवां कक्षायाम्‌ स्व पाठम पठिष्यावः ।
वह घर गई । — सा गृहं‌ अगच्छ्त्‌ ।
सन्तोष उत्तम सुख है । — संतोषः उत्तमं सुखः अस्ति ।


पेड़ से पत्ते गिरते है । —- वृक्षात्‌ पत्राणि पतन्ति ।
मेरे मित्र ने पुस्तक पढ़ी । — मम मित्रः पुस्तकं अपठत् ।
वे लोग घर पर क्या करेंगे । — ते गृहे किं करिष्यन्ति ।
वह गाय का दूध पीता है । — -सः गोदुग्धं पिवति ।

वृक्ष से फल गिरते हैं । — वृक्षात् फलानि पतन्ति ।
शिष्य ने गुरु से प्रश्न किया । — शिष्यः गुरुं प्रश्नम् अपृच्छ्त् ।
मैं प्रतिदिन स्नान करता हूँ । — अहं प्रतिदिनम् स्नानं कुर्यामि ।
मैं कल दिल्ली जाऊँगा । — अहं श्वः दिल्लीनगरं गमिष्यामि ।

तुम पुस्तक पढ़ो । — त्वं पुस्तकं पठ ।
हम सब भारत के नागरिक हैं । — वयं भारतस्य नागरिकाः सन्ति ।
देशभक्त निर्भीक होते हैं । — देशभक्ताः निर्भीकाः भवन्ति ।
सिकन्दर कौन था ? — अलक्षेन्द्रः कः आसीत् ?


राम स्वभाव से दयालु हैं । — रामः स्वभावेन दयालुः अस्ति ।
प्रयाग में गंगा-यमुना का संगम है । — प्रयागे गंगायमुनयोः संगमः अस्ति ।
वाराणसी की पत्थर की मूर्तियाँ प्रसिद्ध हैं । — वाराणस्याः प्रस्तरमूर्त्तयः प्रसिद्धाः ।
यह नगरी विविध कलाओ के लिए प्रसिद्ध हैं । — इयं नगरी विविधानां कलानां कृते प्रसिद्धा अस्ति ।


वे यहा निःशुल्क विद्या ग्रहण करते हैं । — ते अत्र निःशुल्कं विद्यां गृह्णन्ति ।
भिक्षुक प्रत्येक व्यक्ति के सामने दीन वचन मत कहो । — भिक्षुक! प्रत्येकं प्रति दिन वचः न वद्तु ।
हंस नीर- क्षीर विवेक में प्रख्यात हैं । — हंसः नीर-क्षीर विवेक प्रसिद्ध अस्ति ।
सत्य से आत्मशक्ति बढ़ती है । — सत्येन आत्मशक्तिः वर्धते ।


भारतीय संस्कृति सर्वश्रेष्ठ है । — भारतीयाः संस्कृतिः सर्वश्रेष्ठः अस्ति ।
आज मेरे विद्यालय मे उत्सव होगा। — अद्य मम् विद्यालये उत्सवः भविष्यति ।
ताजमहल यमुना किनारे पर स्थित है । — ताजमहलः यमुना तटे स्थितः अस्ति ।
किसी के साथ बुरा कार्य मत करो । — केनापि सह दुष्कृतं मा कुरु।


सच और मीठा बोलो । — सत्यं मधुरं च वद ।
तुम शीघ्र घर जाओ । — त्वं शीघ्रं गृहं गच्छ ।
हमें मित्रों की सहायता करनी चाहिये । —- वयं मित्राणां सहायतां कुर्याम ।
विवेक आज घर जायेगा । — विवेकः अद्य गृहं गमिष्यसि ।
सदाचार से विश्वास बढता है । — सदाचारेण विश्वासं वर्धते ।
मै वाराणसी जाऊंगा । — अहं वाराणासीं गमिष्यामि ।

वाराणसी में मरना मंगलमय होता है । — वाराणस्यां मरणं मंगलमयं भवति ।
सूर्य उदित होगा और कमल खिलेंगे । — सूर्यः उदेष्यति कमलानि च हसिष्यन्ति ।
रात बीतेगी और सवेरा होगा । — रात्रिः गमिष्यति, भविष्यति सुप्रभातम् ।
कुँआ सोचता है कि हैं अत्यन्त नीच हूँ । — कूपः चिन्तयति नितरां नीचोऽस्मीति ।

हमे नित्य भ्रमण करना चाहिये । — वयं नित्यं भ्रमेम ।
अपवित्रता से दरिद्रता बढ़ती है । — अशौचेन दारिद्रयं वर्धते।
अभ्यास से निपुणता बढ़ती है। — अभ्यासेन निपुणता वर्धते ।
उदारता से अधिकतर बढ़ते है । — औदार्येण प्रभुत्वं वर्धते ।
उपेक्षा से शत्रुता बढ़ती है । — उपेक्षया शत्रुता वर्धते।

काम करके ही फल मिलता है । — कर्म कृत्वा एव फलं प्राप्यति ।
विद्या सब धनों में प्रधान है । — विद्या सर्व धनं प्रधानम् ।
मनुष्य को निर्लोभी होना चाहिये । — मनुष्यः लोभहीनः भवेत्।

गाय का दूध गुणकारी होता है । — धेनोः दुग्धं गुणकारी भवति ।
जंगल मे मोर नाच रहे हैं । — वने मयूराः नृत्यन्ति ।
हमारे पूर्वज धन्य थे । — अस्माकं पूर्वजाः धन्याः आसन्।
जन्म भूमि स्वर्ग से भी बड़ी है । — जन्मभूमि स्वर्गादपि गरीयसी।
विदेश में धन मित्र होता है।- — विदेशेषु धनं मित्रं भवति ।

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