Up board class 10 sanskrit solution chapter 2 आज्ञा गुरूणां हि अविचारणीया

Up board class 10 sanskrit solution chapter 2 आज्ञा गुरूणां हि अविचारणीया

chapter 2 गुरूणां हि अविचारणीया

कस्मिंश्चित् नगरे चन्द्रो नाम भूपतिः प्रतिवसति स्म । तस्य पुत्राः वानरक्रीडारताः वानरयूथं नित्यमेव विविधैः भोज्यपदार्थेः पुष्टिं नयन्ति स्म । तस्मिन् राजगृहे बालवाहनयोग्यं मेषयूथम् आसीत्। तेषां मेषाणां मध्ये एको मेषः जिह्वालोलुपतया अहर्निशं महानसं प्रविश्य यत् पश्यति तद् भक्षयति । ते च सूपकाराः यत्किञ्चित् काष्ठं, मृण्मयं भाजनं, कांस्यताम्रपात्रं वा पश्यन्ति तेन तम् आशु ताडयन्ति स्म ।

मेषस्य सूपकाराणां च कलहम् अवेक्ष्य नीतिविदाम् अग्रणीः वानरयूथपतिः अचिन्तयत्- ‘एतेषां कलहो न वानराणां हिताय ।’ एवं विचार्य स यूथपः सर्वान् कपीन् आहूय रहसि अवदत् सूपकाराणाम् मेषेण सह एषः कलहः नूनं भवतां विनाशकारणं भविष्यति। उक्तम् हि

तस्मात् स्यात् कलहो यत्र गृहे नित्यमकारणः।

तद्गृहं जीवितं वाञ्छन् दूरतः परिवर्जयेत् ॥ 1॥

हिंदी अनुवाद (Hindi Translation)

किसी नगर में चन्द्र नाम का एक राजा रहता था। उसके पुत्र प्रतिदिन बन्दरों के साथ खेलने में लीन रहते थे और बन्दरों को अनेक प्रकार के भोज्य पदार्थों से हष्ट-पुष्ट बनाते थे। उस राजदरबार में राजकुमारों की सवारी के योग्य भेड़ों का समूह भी था। उन भेड़ों के बीच में एक भेड़ अपनी जिह्वा के चटोरेपन के कारण प्रतिदिन रसोईघर में घुसकर रसोई में जो कुछ भी देखता उसे ही खा जाता और वे रसोइए लकड़ी, मिट्टी, काँसे या ताँबे के बर्तन जो कुछ भी देखते उसी से उसे तुरन्त पीट (मार) देते। भेड़ और रसोइयों के इस झगड़े को देखकर नीतिज्ञों में अग्रणी बन्दरों के स्वामी ने सोचा। इनका यह झगड़ा बन्दरों के हित के लिए नहीं है। ऐसा सोचकर वह यूथपति जो बन्दरों के समूह का स्वामी था। सभी बन्दरों को एकान्त में बुलाकर बोला- रसोइयों का भेड़ के साथ • होने वाला यह झगड़ा अवश्य ही आपके विनाश का कारण होगा। कहा भी है जिस घर में बिना किसी कारण के नित्य झगड़ा होता हो जीवन चाहने वाले को वह घर दूर से ही छोड़ देना चाहिए।

ततः सर्वेषां संक्षयो न भवेत्, तदेतद् राजभवनं परित्यज्य वनं गच्छामः । यतः ‘कलहान्तानि हर्म्याणि कुवाक्यान्तं च सौहृदम् । कुराजान्तानि राष्ट्राणि कुकर्मान्तं यशो नृणाम् ॥ ॥

हिंदी अनुवाद (Hindi Translation)

इसीलिए कहीं हम सभी का विनाश न हो जाए इसीलिए राजभवन को छोड़कर वन को जाते हैं। क्योंकि-झगड़ों से राजमहलों का अन्त हो जाता है। बुरे वाक्य बोलने से मित्रता का विनाश हो जाता है। बुरे शासन से देश का विनाश हो जाता है। दुष्कर्म से मनुष्यों का यश नष्ट हो जाता है।

  1. तस्य वचनम् अश्रद्धेयं मत्वा मदोद्धताः कपयः प्रहस्य अवदन्- ‘भो! किमिदम् उच्यते?’ न वयं स्वर्गसमानोपभोगान् विहाय अटव्यां क्षार-तिक्तकषाय-कटु-रूक्षफलानि भक्षयिष्यामः । तच्छ्रुत्वा साश्रुनयो यूथपतिः सगद्गदम् उक्तवान्- ‘रसनास्वादलुब्धाः यूयम् अस्य सुखस्य कुपरिणामं न जानीथ। अहं तु वनं गच्छामि।’

हिंदी अनुवाद (Hindi Translation)

उस समूह के स्वामी के वचन को श्रद्धाहीन मानकर मूद से मस्त वानर हँसते हुए बोले- यह क्या कह रहे हैं? हम स्वर्ग के समान उपभोगों को छोड़कर जंगल में खारे, तीखे, कसैले, कड़वे और रूखे फलों को नहीं खाएँगे। यह सुनकर आँसुओं से युक्त नेत्रों वाले समूह का स्वामी गद्गद् स्वर में बोला-‘जीभ के स्वाद के लालच में तुम इस (स्वर्ग के समान उपभोगों के) सुख के दुष्परिणाम को नहीं जानते हो। मैं तो वन को जा रहा हूँ।”

  1. अथ अन्यस्मिन् अहनि स मेषो यावत् महानसं प्रविशति तावत् सूपकारेण अर्धज्वलितकाष्ठेन ताडितः । ऊर्णाप्रचुरः मेष: वह्निना जाज्वल्यमानशरीर: निकटस्थाम् अश्वशालां प्रविशति दाहवेदनया च भूमौ लुठति । तस्य क्षितौ प्रलुठतः तृणेषु वह्निञ्चालाः समुत्थिताः ।

ज्वालमालाकुलाः अश्वाः प्राणत्राणाय इतस्ततः अधावन् । तेषु केचिद् दग्धाः केचिद् अर्धदग्धाः केचन च पञ्चत्वं गताः। दग्धां हयशालां विज्ञाय सविषादः राजा शालिहोत्रज्ञान् वैद्यान् आहूय अपृच्छत्- ‘हा! दग्धाः मे घोटकाः कथं रक्षणीयाः? सपदि उपायः क्रियताम्।’ तदा राजवैद्यः प्रोवाच ‘कपीनां मेदसा दोषो वह्निदाहसमुद्भवः ।

अश्वानां नाशमभ्येति तमः सूर्योदये यथा ॥ 3 ॥ ‘

हिंदी अनुवाद (Hindi Translation)

उसके बाद दूसरे दिन वह (नर) भेड़ ज्यों ही रसोई में घुसा त्यों ही रसोइए ने आधी जली हुई लकड़ी उसे दे मारी। ऊन से भरा हुआ तथा आग से दहकते हुए शरीर वाला वह भेड़ पास के घुड़साल में घुस गया और जलने की पीड़ा से भूमि पर लोटने लगा। उसके भूमि पर लोटने से उठती हुई आग की लपटें घास में चारों ओर फैल गई।

धधकती हुई आग की लपटों से व्याकुल घोड़ों में से कई जल गए, कुछ आधे जल गए और कुछ पाँच तत्वों में मिल गए अर्थात् मर गए। जली हुई घुड़शाल (अस्तबल) को देखकर अत्यन्त दुखी राजा ने पशुचिकित्सकों को बुलाकर पूछा- हाय! जले हुए मेरे घोड़े कैसे बचाए जाएँ? तुरन्त कोई उपाय करो तब राजा का वैद्य बोला- आग लगने से होने वाला घोड़ों का घाव बन्दरों की चर्बी से उस प्रकार समाप्त हो जाता है जिस प्रकार सूर्य के निकलने पर अन्धकार नष्ट हो जाता है।

  1. ‘यथोचितं क्रियताम्’ इति राजादेशं श्रुत्वा सर्वे भयत्रस्ताः कपयः अचिन्तयन् ‘हा! हताः वयम् । अवधीरिताः अस्माभिः गुरुजनोपदेशाः । उक्तम् हि मित्ररूपाः हि रिपवः सम्भाष्यन्ते विचक्षणैः । ये हितं वाक्यमुत्सृज्य विपरीतोपसेविनः ॥

हिंदी अनुवाद (Hindi Translation)

‘जैसा उचित हो वैसा कीजिए’ राजा का ऐसा आदेश सुनकर भय से दुःखी बन्दरों ने सोचा- हाय! हम मारे गए। हमने अपने गुरु के उपदेश को नहीं माना। कहा गया है जो हितकारी वाक्य को छोड़कर उससे विपरीत का सेवन करने वाले होते हैं, बुद्धिमान लोग उन्हें मित्र रूप में शत्रु ही कहते हैं।

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