UP BOARD CLASS 11 ENGLISH CHAPTER 1 MY STRUGGLE FOR AN EDUCATION

UP BOARD CLASS 11 ENGLISH CHAPTER 1 MY STRUGGLE FOR AN EDUCATION पाठ का हिन्दी अनुवाद

UP Board Solutions for Class 11 English Prose Chapter 1 My Struggle for an Education
UP BOARD CLASS 11 ENGLISH CHAPTER 1 MY STRUGGLE FOR AN EDUCATION पाठ का हिन्दी अनुवाद

1- One day …………….. great deal.

एक दिन, जब मैं कोयले की खान में काम कर रहा था, तब मुझे खान में काम करने वाले दो मजदूरों की बात को छिपकर सुनने का अवसर मिला जो वर्जीनिया के किसी स्थान पर नीग्रो के एक बड़े स्कूल के विषय में बातें कर रहे थे। यह पहला अवसर था जब मैंने किसी ऐसे स्कूल या कॉलेज के विषय में सुना था जो हमारे नगर के नीग्रो के छोटे स्कूल से कहीं अधिक आकर्षक था।

जब वे स्कूल का वर्णन कर रहे थे, तब मुझे ऐसा लगा कि यह पृथ्वी का सबसे महान् स्थान होगा। उस समय मुझे स्वर्ग में भी इतने आकर्षण प्रतीत नहीं हुए जितने कि वर्जीनिया के उस हैम्पटन नॉर्मल एवं एग्रीकल्चरल इन्स्टीट्यूट में हुए, जिसके विषय में ये व्यक्ति बातें कर रहे थे। मैंने तुरन्त

उस स्कूल में जाने का निश्चय किया, यद्यपि मुझे यह भी पता नहीं था कि यह कहाँ और कितने मील दूर है या मैं वहाँ कैसे पहुँचूँगा। लगातार मुझे एक ही अभिलाषा प्रेरित कर रही थी कि मैं हैम्पटन में जाऊँ । दिन-रात यह विचार मेरे मन में रहा।

सन् 1872 के पतझड़ के मौसम में मैंने वहाँ जाने का निश्चय किया। मेरी माताजी इस गम्भीर भय से दु:खी थीं कि मैं एक ऐसे कार्य को करने जा रहा हूँ जो असम्भव है। कुछ भी हो मेरी माँ ने बे-मन से मुझे जाने की स्वीकृति दे दी। मेरे पास बहुत थोड़ा धन था जिससे मैं कपड़े खरीदें और यात्रा के लिए व्यय करूं। मेरे भाई जॉन ने जितनी सहायती वह कर सकता था की, किन्तु वास्तव में वह काफी नहीं थी।

2- Finally the great ………….. over my head.

वह महान् दिन आ गया और मैं हैम्पटन के लिए चल पड़ा। मेरे पास एक छोटा सस्ता थैला था जिसमें कुछ कपड़े थे जो मैं प्राप्त कर सका। उस समय मेरी माताजी बीमार और कमजोर थीं। मुझे यह आशा नहीं थी कि मैं पुनः उनसे मिल पाऊँगा और इसलिए हमारा वियोग दुःखदायी था, किन्तु फिर भी वह पूरे समय बहादुर बनी रहीं।

माल्डेन से हैम्पटन की दूरी लगभग पाँच सौ मील है। कभी पैदल चलकर, कभी घोड़ागाड़ी या से लिफ्ट लेकर किसी प्रकार कई दिनों के बाद मैं वर्जीनिया के नगर रिचमंड में पहुँचा जो हैम्प लगभग 82 मील दूर है। जब मैं वहाँ पहुँचा तब बहुत थका हुआ, भूखा और गन्दा था और रात काफी बीत चुकी थी। इससे पहले मैं इतने बड़े शहर में कभी नहीं गया था, इस कारण मेरी परेशानी और बढ़ गई। जब मैं रिचमंड पहुँचा तब मेरे पास बिल्कुल धन नहीं था। उस स्थान पर मेरी जान पहचान का एक भी व्यक्ति नहीं था और नगर के रास्तों से अनभिज्ञ होने के कारण मैं नहीं जान सका कि कहाँ जाऊँ। कई स्थानों पर मैंने रहने के स्थान के विषय में पूछा, लेकिन वे सब पैसा चाहते थे जो मेरे पास नहीं था और अधिक अच्छी बात समझ में न आने के कारण मैं सड़कों पर घूमता रहा।

मैं आधी रात के बाद तक सड़कों पर चक्कर काटता रहा। अन्त में, मैं इतना थक गया था कि और अधिक नहीं चल सकता था। मैं थका हुआ था, भूखा था और सभी कुछ होते हुए भी मैं हतोत्साहित नहीं था। जब मैं शारीरिक रूप से अत्यधिक थक गया, तब मैं सड़क के एक ऐसे किनारे पर आ गया जहाँ फुटपाथ का चबूतरा कुछ उठा हुआ था। कुछ क्षण मैंने प्रतीक्षा की जब तक मुझे यह विश्वास नहीं हो गया कि इधर से जाने वाला कोई व्यक्ति मुझे देखेगा नहीं, तब मैं रेंगकर चबूतरे के नीचे पहुँच गया और रात बिताने के लिए। धरती पर लेट गया और कपड़ों के थैले को तकिये के स्थान पर लगा लिया। लगभग पूरी रात मैंने ऐसा सुना मानो राह चलने वालों के पैर मेरे सिर पर पड़ रहे हों।

3- The next morning. ….. what was in me.

दूसरे दिन प्रात:काल मैंने स्वयं को कुछ तरोताजा पाया, किन्तु मैं अत्यन्त भूखा था। ज्यों ही इतना प्रकाश हो गया कि मैं अपने चारों ओर की वस्तुएँ देख सकें, मैंने देखा कि पास में एक बड़ा जहाज था। ऐसा लगा कि इसमें से कच्चा लोहा

उतारा जा रहा है। मैं तुरन्त जहाज के पास गया और मैंने जहाज के कप्तान से प्रार्थना की कि वह मुझे जहाज से सामान उतारने में सहायता करने की स्वीकृति दे दे ताकि मैं भोजन के लिए कुछ धन प्राप्त कर सकें। कप्तान, जो एक अंग्रेज था और दयालु हृदय वाला व्यक्ति मालूम पड़ता था, सहमत हो गया। अपने नाश्ते के लिए धन कमाने के लिए मैंने काफी समय तक कार्य किया और जैसा कि मुझे अब भी याद है, ऐसा मालूम पड़ता है कि मैंने इससे अच्छा नाश्ता पहले कभी नहीं खाया था।

मेरे कार्य ने कप्तान को इतना प्रसन्न कर दिया कि उसने मुझसे कहा कि मैं थोड़ी मजदूरी प्रतिदिन करता रहूँ। ऐसा करने के लिए मैं बहुत प्रसन्न था। मैंने कई दिनों तक इस जहाज पर कार्य किया। अपनी थोड़ी-सी मजदूरी से भोजन खरीदने के बाद मेरे पास हैम्पटन जाने के लिए अधिक पैसे बचते थे। हर प्रकार से बचत करने के लिए मैंने चबूतरे पर सोना जारी रखा।

जब हैम्पटन पहुँचने के लिए मैंने काफी धन बचा लिया, तो जहाज कप्तान को उसकी दया के लिए धन्यवाद दिया और फिर चल पड़ा। बिना किसी असाधारण घटना के मैं हैम्पटन पहुँच गया। मेरे पास अपनी शिक्षा आरम्भ करने के लिए पूरे पचास सैण्ट फालतू थे। इस बड़ी तीन मंजिल की ईंटों की बनी हुई इमारत पर पहली दृष्टि पड़ते ही मुझे ऐसा लगा कि इस स्थान तक पहुँचने में जो परेशानियाँ उठानी पड़ीं उन सभी का मुझे इनाम मिल गया है। इस भवन के दृश्य ने मुझे नया जीवन प्रदान किया।

हैम्पटन स्कूल के प्रांगण में पहुँचने के तुरन्त बाद कक्षा में प्रवेश के लिए कोई कार्य प्राप्त करने के लिए मैं मुख्य अध्यापिका के समक्ष प्रस्तुत हुआ। इतने समय तक बिना भोजन, स्नान और कपड़े न बदलने के कारण। वास्तव में में उन पर बहुत अनुकूल प्रभाव नहीं डाल सका। मैंने तुरन्त पहचान लिया कि उनके मस्तिष्क में मुझे प्रवेश देने के लिए सन्देह था। कुछ समय तक उन्होंने मुझे प्रवेश देने के लिए न तो मना ही किया और न मेरे पक्ष में कोई निर्णय लिया। मैं उनके पीछे-पीछे फिरता रहा और अपनी योग्यता के अनुसार हर प्रकार से उन्हें प्रभावित करता रहा। इसी बीच मैंने उन्हें अन्य विद्यार्थियों को प्रवेश देते हुए देखा और इससे मेरी परेशानी और बढ़ गई। मेरे हृदय में तीव्र इच्छा थी कि मुझे भी यदि अपनी योग्यता दिखाने का एक अवसर मिल जाए, तो मैं भी उन विद्यार्थियों के समान ही अच्छा कार्य करके दिखा सकता हूँ।

4- After some hours………..Lever passed.

कुछ घण्टे गुजरने के बाद मुख्य अध्यापिका ने मुझसे कहा, “बगल के संगीत के कमरे में सफाई की आवश्यकता है। झाडू लो और इसे साफ करो।”

मुझे ऐसा लगा मानो अब मुझे अवसर मिल गया है। मैंने किसी आदेश को पहले कभी इतनी प्रसन्नता से स्वीकार नहीं किया था।

मैंने संगीत कक्ष में तीन बार झाडू लगाई फिर मैंने झाड़ने का कपड़ा उठाया और चार बार पोंछा लगाया। दीवारों पर लगा लकड़ी का सामान, प्रत्येक बेंच, मेज, डेस्क सभी को चार बार झाड़न से साफ किया। प्रत्येक फर्नीचर को हटाया और कमरे की सभी अलमारियों तथा कोनों को पूर्ण रूप से साफ किया। मेरा यह विचार था कि काफी हद तक मेरा भविष्य उस प्रभाव पर निर्भर करता है जो कमरे को साफ करके अपनी अध्यापिका पर छोडूंगा। जब मैंने अपना कार्य पूरा कर लिया तब मैंने

मुख्य अध्यापिका को बताया। वह अमेरिका के उत्तरी राज्यों में रहने वाली एक महिला थी जो जानती थी कि धूल कहाँ हो सकती है। वह कमरे में गई और फर्श तथा अलमारियों का निरीक्षण किया। फिर उसने रूमाल निकाला और दीवारों से लगीं लकड़ी की वस्तुओं पर, मेज तथा बैंचों पर इसे रगड़ा। जब उसे फर्श या किसी फर्नीचर पर धूल का एक कण भी नहीं मिला तब उसने धीरे से कहा, “मेरा विचार है कि तुम्हें भी इस विद्यालय में प्रवेश मिलना चाहिए।”

उस समय में इस पृथ्वी पर सबसे प्रसन्न व्यक्तियों में से एक था। कमरे में झाडू लगाना मेरी विद्यालय की परीक्षा थी। तब से मैंने अनेक परीक्षाएँ पास की हैं, किन्तु मैंने सदा यह अनुभव किया कि यह सर्वोत्तम परीक्षा थी जो मैंने पास की।

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