UP BOARD CLASS 12TH CIVICS CHAPTER 5 ORGANS OF GOVERNMENT: LEGISLATURE, EXECUTIVE AND JUDICIARY

UP BOARD CLASS 12TH CIVICS CHAPTER 5 ORGANS OF GOVERNMENT: LEGISLATURE, EXECUTIVE AND JUDICIARY पाठ – 5 सरकार के अंग- व्यवस्थापिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका

UP Board Solutions for Class 12 Civics Chapter 1 Principles of Origin of State
सरकार के अंग- व्यवस्थापिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका
सरकार के अंग- व्यवस्थापिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका | (Organs of Government : Legislature, Executive and Judiciary)


लघु उत्तरीय प्रश्न


1– सरकार के किन्हीं दो महत्वपूर्ण अंगों के नाम लिखिए ।
उत्तर — सरकार के दो महत्वपूर्ण अंगों के नाम निम्नलिखित हैं
(i) व्यवस्थापिका- इसे हम विधायिका के नाम से भी जानते हैं । इसका मुख्य कार्य कानून बनाना है ।
(ii) कार्यपालिका- इसका मुख्य कार्य व्यवस्थापिका द्वारा बनाए गए कानूनों को लागू करना है ।

2– व्यवस्थापिका के दो कार्यों का वर्णन कीजिए ।
उत्तर — व्यवस्थापिका के दो कार्य निम्नलिखित हैं
(i) कानूनों का निर्माण- व्यवस्थापिका का सर्वाधिक महत्वपूर्ण कार्य कानूनों का निर्माण करना है । यह आवश्यकतानुसार नए कानून बनाती है, पुराने कानूनों में संशोधन करती है और आवश्यक कानूनों को रद्द करती है ।
(ii) वित्तीय कार्य- व्यवस्थापिका देश की सम्पूर्ण वित्त व्यवस्था पर नियंत्रण रखती है । वह नए कर लगाती है और निरर्थक करों को समाप्त करती है । इसके अतिरिक्त वह ऋणों की व्यवस्था करती है और राजकीय व्ययों को स्वीकृति प्रदान करती है ।

3– व्यवस्थापिका के आधारभूत कार्यों का वर्णन कीजिए और संसदात्मक शासन-प्रणाली में इसकी विशिष्ट भूमिका पर
प्रकाश डालिए ।
अथवा
व्यवस्थापिका के कार्यों का वर्णन कीजिए ।


उत्तर — व्यवस्थापिका के आधारभूत कार्य निम्नलिखित हैं
(i) विचार-विमर्श कार्य
(ii) कानून बनाने संबंधी कार्य
(iii) प्रशासन संबंधी कार्य
(iv) आर्थिक अथवा वित्तीय कृत्य
(v) न्यायिक कार्य
(vi) निर्वाचन संबंधी कार्य
(vii) वैदेशिक नीति संबंधी कार्य
(viii) जन भावनाओं की अभिव्यक्ति


संसदात्मक शासन-प्रणाली में व्यवस्थापिका का महत्व– संसदात्मक शासन-प्रणाली में व्यवस्थापिका की भूमिका सरकार के दूसरे अंगों की अपेक्षा अधिक महत्वपूर्ण है । व्यवस्थापिका न केवल कानूनों का ही निर्माण करती वरन् प्रशासन की नीति भी निश्चित करती है और संसदात्मक शासन-प्रणाली में तो कार्यपालिका पर प्रत्यक्ष रूप से नियंत्रण भी रखती है । संविधान संशोधन का कार्य भी व्यस्थापिका के द्वारा ही किया जाता है ।

4– व्यवस्थापिका के दो कार्यों का उल्लेख कीजिए तथा किन्हीं दो तरीकों का वर्णन कीजिए जिनसे व्यवस्थापिका
कार्यपालिका पर नियंत्रण स्थापित करती है ।
उत्तर — व्यवस्थापिका के दो कार्य- इसके लिए लघु उत्तरीय प्रश्न संख्या-2 के उत्तर का अवलोकन कीजिए ।
व्यवस्थापिका द्वारा कार्यपालिका पर नियंत्रण स्थापित करने के दो तरीके निम्नवत् हैं
(i) पूरक-प्रश्न पूछकर
(ii) काम रोको प्रस्ताव रखकर ।

5– द्विसदनात्मक विधानमण्डल ( व्यवस्थापिका) की दो विशेषताएँ बताइए ।
उत्तर — द्विसदनात्मक विधानमण्डल (व्यवस्थापिका) की दो विशेषताएँ निम्नवत् हैं
(i) स्वतंत्रता की रक्षा का साधन- द्विसदनात्मक व्यवस्थापिका जनता की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए अत्यन्त आवश्यक है । यह नीतियों में सन्तुलन स्थापित करती व अल्पसंख्यकों की रक्षा करती है । लॉर्ड एक्टन ने दूसरे सदन को स्वतंत्रता की रक्षा का सबसे प्रमुख साधन माना है ।
ii) संघ राज्य के लिए उपयुक्त- एक संघ राज्य में जो विभिन्न इकाइयाँ होती हैं, उनमें क्षेत्र और जनसंख्या की दृष्टि से बहुत अधिक अन्तर होता है । ऐसी परिस्थिति में द्विसदनात्मक व्यवस्थापिका के द्वारा प्रथम सदन में जनसंख्या के आधार पर और दूसरे सदन में इकाइयों की समानता के आधार पर प्रतिनिधित्व प्रदान किया जा सकता है । इस प्रकार संघ की सभी इकाइयों को सन्तुष्ट रखा जा सकता है और छोटी इकाइयों के हितों की रक्षा सम्भव होती है ।

6– द्विसदनात्मक व्यवस्थापिका के पक्ष में दो तर्क दीजिए ।
उत्तर — उत्तर के लिए लघु उत्तरीय प्रश्न संख्या-5 के उत्तर का अवलोकन कीजिए ।

7- “व्यवस्थापिका में दूसरे सदन का होना आवश्यक है ।” इस कथन की विवेचना कीजिए ।
उत्तर — व्यवस्थापिका में दूसरे सदन की आवश्यकता- एकसदनात्मक व्यवस्थापिका में जनता द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधि रहते हैं, अत: वे जनता की क्षणिक भावनाओं या आवेशों से प्रभावित होकर कानून बनाने में अधिक जल्दबाजी कर सकते हैं । परिणामस्वरूप एकपक्षीय और तर्कहीन कानूनों के बनने की आशंका बनी रहती है । इसके विपरीत जहाँ द्विसदनात्मक व्यवस्थापिका है, वहाँ दूसरे सदन में निचले सदन द्वारा बनाए गए विधेयकों पर विवेकपूर्ण विचार कर उनकी त्रुटियों को दूर कर दिया जाता है ।

“नियंत्रण करने, संशोधन करने तथा रुकावट पैदा करने में जो कार्य द्वितीय सदन करता है, उसकी आवश्यकता स्वयंसिद्ध है । यह कानून पर सुधारात्मक निरोधात्मक तथा क्रमबद्धात्मक प्रभाव डालता है ।”…………………………..-लेकी

“द्विसदनात्मक सिद्धान्त न केवल विधानमण्डलों की अपने उतावलेपन और भावुकता से रक्षा करता है, बल्कि यह व्यक्ति को एक सदन की निरंकुशता से भी बचाता है ।”…………………….-गार्नर

8– व्यवस्थापिका द्वारा कार्यपालिका पर नियंत्रण के कोई चार साधन लिखिए ।
उत्तर — व्यवस्थापिका द्वारा कार्यपालिका पर नियंत्रण के चार साधन निम्नलिखित हैं
(i) पूरक-प्रश्न पूछकर
(ii) काम रोको प्रस्ताव रखकर
(iii) अविश्वास प्रस्ताव रखकर
(iv) महत्वपूर्ण राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय समस्याओं पर विचार-विमर्श करके

9– व्यवस्थापिका में उच्च सदन होने के दो लाभों का उल्लेख कीजिए ।
उत्तर — व्यवस्थापिका में उच्च सदन होने के दो लाभ निम्नवत् हैं
(i) कार्य-विभाजन से लाभ
(ii) जनमत निर्माण में सहायक

10– एक सदनात्मक व्यवस्थापिका के दो लाभ स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर — एक सदनात्मक व्यवस्थापिका के दो लाभ निम्नवत् हैं
(i) एक सदनात्मक व्यवस्थापिका पद्धति कम खर्चीली है ।
(ii) एक सदनात्मक व्यवस्थापिका में गत्यारोध की सम्भावना कम है ।

11– कार्यपालिका के विविध रूपों का उल्लेख कीजिए ।
उत्तर — कार्यपालिका के विविध रूप निम्नलिखित हैं
(i) नाममात्र की तथा वास्तविक कार्यपालिका
(ii) संसदीय तथा अध्यक्षात्मक कार्यपालिका
(iii) एकल तथा बहुल कार्यपालिका
(iv) राजनीतिक और अराजनीतिक कार्यपालिका
(v) वंशानुगत और निर्वाचित कार्यपालिका

12– कार्यपालिका के चार कार्यों का वर्णन कीजिए ।
उत्तर — कार्यपालिका के चार कार्य निम्न प्रकार हैं
(i) सैनिक कार्य
(ii) प्रशासनिक कार्य
(iii) कानून बनाने संबंधी कार्य
(iv) न्यायिक कार्य

13– कार्यपालिका की शक्तियों में वृद्धि के चार कारण दीजिए ।
उत्तर — कार्यपालिका की शक्तियों में वृद्धि के चार कारण निम्नलिखित हैं
(i) कार्यपालिका को लोकसभा में बहुमत दल का समर्थन प्राप्त होता है ।
(ii) कार्यपालिका लोकसभा को कार्यकाल पूरा होने से पहले राष्ट्रपति द्वारा भंग करने में सक्षम है ।
(iii) कार्यपालिका कानून निर्माण की आधारशिला है । यह विधेयकों को तैयार कराके उन्हें विधानमंडल में प्रस्तुत करती है और बहुमत के आधार पर उन्हें पारित भी करा सकती है ।

14– कार्यपालिका के दो कार्य लिखिए ।
उत्तर — कार्यपालिका के दो कार्य निम्नवत् हैं
(i) सैनिक कार्य
(ii) प्रशासनिक कार्य

15– बहुल कार्यपालिका की मुख्य विशेषताएँ बताइए ।
उत्तर — बहुल कार्यपालिका की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं
(i) बहुल कार्यपालिका की शक्तियाँ एक ही व्यक्ति में निहित न होकर कुछ व्यक्तियों की एक समिति में निहित होती हैं ।
(ii) बहुल कार्यपालिका की संघीय परिषद् अपने सदस्यों में से एक सदस्य को एक वर्ष के लिए राष्ट्रपति निर्वाचित करती है ।

16– आधुनिक राज्यों में कार्यपालिका के किन्हीं चार कार्यों का उल्लेख कीजिए ।
उत्तर — आधुनिक राज्यों में कार्यपालिका के चार कार्य निम्नलिखित हैं
(i) शिक्षा संबंधी कार्य
(ii) स्वास्थ्य संबंधी कार्य
(iii) राजकीय कार्यों का प्रबन्ध करना
(iv) उपाधियों तथा सम्मान का वितरण करना

17– आधुनिक लोकतंत्रों में कार्यपालिका के बढ़ते हुए प्रभाव के चार कारण लिखिए ।
उत्तर — आधुनिक लोकतंत्रों में कार्यपालिका के बढ़ते हुए प्रभाव के चार कारण निम्नलिखित हैं
(i) दलीय पद्धति
(ii) कार्यपालिका को व्यवस्थापिका के विघटन का अधिकार
(iii) लोक-कल्याणकारी राज्य की अवधारणा
(iv) अंतर्राष्ट्रीय संबंध तथा विदेश व्यापार

18– लोकतंत्र में न्यायपालिका की स्वतंत्रता का संक्षेप में वर्णन कीजिए ।
उत्तर — न्यायपालिका की स्वतंत्रता- वर्तमान लोकतान्त्रिक युग में स्वतंत्र न्यायपालिका की आवश्यकता को अत्यन्त महत्व दिया गया है । स्वतंत्र न्यायपालिका से तात्पर्य है कि यह व्यवस्थापिका तथा कार्यपालिका के नियंत्रण से स्वतंत्र रहकर नागरिकों के आर्थिक तथा सामाजिक जीवन की रक्षा करने में समर्थ हो । न्यायाधीशों के कार्यकाल, वेतन तथा उनके कार्य की दशाओं पर कोई ऐसा नियंत्रण नहीं होना चाहिए जिससे निष्पक्ष न्याय के मार्ग में किसी प्रकार की बाधा पड़े । यदि न्यायपालिका स्वतंत्र नहीं होगी और उस पर कार्यपालिका अथवा व्यवस्थापिका का अनावश्यक अंकुश होगा तो यह आशा करना कि नागरिकों की स्वतंत्रता तथा अधिकारों की रक्षा हो सकेगी, मात्र भ्रम ही होगा । स्वतंत्र न्यायपालिका के महत्व को डॉ० गार्नर ने निम्नवत् स्पष्ट किया है, “यदि न्यायाधीशों में प्रतिभा, सत्यता और निर्णय देने की स्वतंत्रता न हो तो न्यायपालिका का वह सारा ढाँचा खोखला प्रतीत होगा और उस उद्देश्य की प्राप्ति न हो सकेगी जिसके लिए उसका निर्माण किया गया है ।” स्पष्ट है कि न्यायाधीशों की नियुक्ति, उनके कार्यकाल, वेतन तथा पद की सुरक्षा पर जब शासन के अन्य किसी भी अंग का अंकुश नहीं होता है तो उसे स्वतंत्र न्यायपालिका की संज्ञा दी जाती है ।

19– लोकतंत्र में न्यायपालिका के महत्व को इंगित कीजिए ।
उत्तर — लोकतंत्र की सफलता के लिए स्वतंत्र न्यायपालिका का होना अनिवार्य है । लोकतंत्र के अनिवार्य तत्व स्वतंत्रता और समानता हैं । अत: नागरिकों को स्वतंत्रता और समानता के अवसर उसी समय प्राप्त हो सकेंगे, जब न्यायपालिका निष्पक्षता के साथ अपने कार्य का समापन करेगी । प्रत्येक देश में न्यायपालिका कानून और नागरिक अधिकारों की रक्षक होती है । यदि संसद कोई ऐसा कानून बनाती है जो संविधान के विरुद्ध हो तो न्यायपालिका उसे अवैधानिक घोषित करके रद्द कर सकती है । अत: आधुनिक युग में एक स्वतंत्र और प्रभावशाली न्यायपालिका का होना अत्यन्त आवश्यक है ।

20– न्यायपालिका के दो कार्यों का उल्लेख कीजिए तथा स्वतंत्र न्यायपालिका के पक्ष में दो तर्क दीजिए ।

उत्तर — न्यायपालिका के दो कार्य निम्न प्रकार हैं
(i) संविधान की सुरक्षा- उच्चतम न्यायालय संविधान का रक्षक है । वह संसद के कानूनों तथा शासक वर्ग के नियमों को यदि वे संविधान के विरुद्ध हों, असंवैधानिक घोषित करता है । भारत और अमेरिका में उच्चतम न्यायालय को संविधान की सुरक्षा के लिए पूरी शक्ति प्रदान कर गई हैं । संघात्मक व्यवस्था का रक्षक-संघ का गठन कई स्वतंत्र इकाइयों के संगठन द्वारा होता है । शासन की शक्तियों को संघीय सरकार तथा इकाइयों में विभक्त किया जाता है । कभी-कभी संघीय इकाइयों में पारस्परिक संघर्ष तथा इकाइयों व केन्द्र में संघर्ष हो जाता है । इन विवादों को निपटाने के लिए उच्चतम न्यायालय अनिवार्य हैं ।
स्वतंत्र न्यायपालिका के पक्ष में दो तर्क
(i) स्वतंत्र न्यायपालिका से मिलने वाला न्याय निष्पक्ष न्याय है ।
(ii) स्वतंत्र न्यायपालिका व्यवस्थापिका और कार्यपालिका पर नियंत्रण रख शासन की कार्य-कुशलता में वृद्धि करती है ।

21– न्यायपालिका की स्वतंत्रता को सुनिश्चित करने के दो उपायों का उल्लेख कीजिए ।
उत्तर — न्यायपालिका की स्वतंत्रता को सुनिश्चित करने के दो उपाय निम्न प्रकार हैं
(i) कानून की उच्च योग्यता आवश्यक-उच्चतम् योग्यता वाला न्यायाधीश ही अपने विचार स्वतंत्रतापूर्वक प्रकट करने की
क्षमता रखता है । अयोग्य न्यायाधीश योग्य अधिवक्ताओं की कठपुतली बन जाता है ।
(ii) निष्पक्ष तथा योग्य न्यायाधीशों की नियुक्ति- न्यायपालिका की स्वतंत्रता के लिए आवश्यक है कि न्यायाधीशों की
नियुक्ति निष्पक्ष की जाए ताकि वे अपनी स्वतंत्रता बनाए रख सकें, साथ ही योग्य व्यक्तियों की नियुक्ति हो सके ।

22— “न्यायिक सक्रियतावाद”से क्या आशय है?
उत्तर — न्यायिक सक्रियतावाद वह सक्रियता है जिसमें न्यायपालिका संविधान कानून और अपने दायित्वों की पूर्ति कानूनी व्याख्याओं से आगे बढ़कर सामाजिक, आर्थिक एवं न्याय की आवश्यकता को देखते हुए स्वयं या किसी के माध्यम से मामले का संज्ञान लेते हुए करती है । जब कार्यपालिका और व्यवस्थापिका अपने मूल कर्त्तव्यों से विचलित हो जाती है तो परिस्थितियों से प्रेरित एवं बाध्य होकर ही न्यायपालिका न्यायिक सक्रियता के मार्ग को अपनाती है ।

23– न्यायपालिका के कार्यों का उल्लेख कीजिए ।
उत्तर — न्यायपालिका के प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं
(i) संविधान की सुरक्षा (ii) संघात्मक व्यवस्था की रोक
(iii) न्याय करना (iv) कानूनों की व्याख्या करना
(v) अधिकारों का पोषक
(vi) कानून बनाना (vii) परामर्श संबंधी कार्य
(viii) प्रशासनिक कार्य
(ix) घोषणात्मक निर्णय देने का कार्य

24– कार्यपालिका और न्यायपालिका में संबंध बताइए ।

उत्तर — कार्यपालिका और न्यायपालिका में संबंध– लोकतंत्र की सफलता के लिए कार्यपालिका और न्यायपालिका को एक-दूसरे से पृथक रहना आवश्यक माना जाता है, किन्तु व्यवहार में इनका पारस्परिक संबंध घनिष्ठ होता है, क्योंकि न्यायाधीशों की नियुक्ति का अधिकार कार्यपालिका के हाथ में ही होता है । इन दोनों का संबंध निम्नलिखित रूपों में स्पष्ट किया जा सकता है

(i) कार्यपालिका व्यवस्थापिका द्वारा बनाए गए कानूनों को लागू करती है और न्यायपालिका कानूनों का उल्लंघन करने वालोंको दण्डित करती है तथा शक्ति का अतिक्रमण करने से कार्यपालिका को रोकती है ।

(ii) न्यायपालिका के दण्डात्मक निर्णयों का कार्यान्वयन कार्यपालिका ही करती है । न्यायाधीशों की नियुक्ति कार्यपालिका के प्रधान द्वारा ही की जाती है ।

(iv) न्यायपालिका के निर्णयों की आलोचना करने का अधिकार कार्यपालिका को नहीं है ।

(v) न्यायपालिका कार्यपालिका के भ्रष्ट कर्मचारियों को भी दण्डित करने का अधिकार रखती है तथा कर्त्तव्यविमुख होने की अवस्था में किसी भी विभाग के विभागाध्यक्ष से आख्या माँग सकती है तथा तत्संबंधित आदेश दे सकती है ।

25– शक्ति-पृथक्करण के विपक्ष में चार तर्क दीजिए ।

उत्तर — शक्ति-पृथक्करण के विपक्ष में चार तर्क निम्नलिखित हैं_ (i) ऐतिहासिक दृष्टि से गलत (ii) शक्तियों का पूर्ण पृथक्करण सम्भव नहीं (iii) शक्ति पृथककरण अवांछनीय भी है । (iv) सरकार के तीनों अंगों की असमान स्थिति

26– संघीय सर्वोच्चता से आप क्या समझते हैं?

उत्तर — संसदीय शासन-प्रणाली में व्यवस्थापिका (संसद) कानून निर्माण करती है । कार्यपालिका उन कानूनों के आधार पर शासन करती है और न्यायपालिका उन कानूनों के आधार पर नागरिकों को न्याय प्रदान करती है । संसदीय शासन-प्रणाली में संसद (व्यवस्थापिका) कार्यपालिका पर प्रत्यक्ष रूप से नियंत्रण करती है और संविधान संशोधन का कार्य भी करती है । अत: संसदीय शासन-प्रणाली में व्यवस्थापिका (संसद) कार्यपालिका और न्यायपालिका से ऊपर होने के कारण सर्वोच्च स्थान रखती है । संसदीय प्रणाली की इस विशेषता को संसदीय सर्वोच्चता कहते हैं ।

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न–


1– सरकार के प्रमुख अंग कौन-कौन से हैं? व्यवस्थापिका कार्यपालिका पर किस प्रकार नियत्रंण रखती है?

उत्तर — सरकार के तीन प्रमुख अंग हैं
(i) व्यवस्थापिका- इसे हम विधायिका के नाम से भी जानते हैं । इस अंग का मुख्य कार्य कानून बनाना है ।
(ii) कार्यपालिका- इस अंग का मुख्य कार्य व्यवस्थापिका द्वारा बनाए गए कानूनों को लागू करना है ।
(iii) न्यायपालिका-राज्य में न्याय का समुचित प्रबन्ध न्यायपालिका द्वारा किया जाता है । न्यायपालिका द्वारा ऐसे व्यक्तियों को दण्ड दिया जाता है जो विधायिका द्वारा बनाए गए कानूनों का उल्लंघन करते हैं ।

व्यवस्थापिका द्वारा कार्यपालिका पर नियंत्रण- व्यवस्थापिका का प्रमुख कार्य कार्यपालिका का गठन तथा नियंत्रण करना होता है । जिन देशों में संसदीय प्रणाली की सरकार है, वहाँ की कार्यकारिणी सभी कार्यों के लिए व्यवस्थापिका के प्रति उत्तरदायी होती है तथा व्यवस्थापिका उस पर प्रत्यक्ष नियंत्रण रखती है । व्यवस्थापिका ही कार्यपालिका तथा मन्त्रिमण्डल के कार्यों पर पूरक-प्रश्न, काम रोको प्रस्ताव, निन्दा प्रस्ताव, महत्वपूर्ण राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय समस्याओं पर विचार-विमर्श, अविश्वास प्रस्ताव आदि द्वारा नियंत्रण रखती है । अध्यक्षात्मक शासन-प्रणाली में व्यवस्थापिका तथा कार्यपालिका को पृथकपृथक तथा एक-दूसरे के समकक्ष माना जाता है । शक्ति का विभाजन भी दोनों के मध्य स्पष्ट रूप से किया जाता है । अमेरिका में राष्ट्रपति द्वारा जितनी भी प्रशासनीय नियुक्तियाँ अथवा अन्तर्राष्ट्रीय सन्धियाँ की जाती हैं, सबको कार्यरूप में परिणत होने के पूर्व सीनेट का अनुमोदन आवश्यक होता है । इस प्रकार आधुनिक युग की प्रजातान्त्रिक प्रणालियों में व्यवस्थापिका कार्यपालिका पर पूर्ण नियंत्रण रखती है ।
“व्यवस्थापिका का वास्तविक कार्य यह देखना है कि कार्यपालिका अपना कार्य ठीक ढंग से कर रही है ” -…………………………….प्रो० लास्की

2– व्यवस्थापिका क्या है? द्विसदनात्मक व्यवस्थापिका के गुण बताइए ।
उत्तर — व्यवस्थापिका का अर्थ- सरकार का वह अंग जो कानूनों का निर्माण करता है व्यवस्थापिका कहलाता है । कानून के निर्माण के साथ-ही-साथ आवश्यक कानूनों को निरस्त करने तथा संवैधानिक तरीकों से उनमें संशोधन करने का कार्य भी व्यवस्थापिका द्वारा ही किया जाता है । शासन के तीन अंगों में व्यवस्थापिका का सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्थान है ।


“व्यवस्थापिका शासन का प्रमुख आधार है ।”………………………..-गिलक्राइस्ट


“आधुनिक संवैधानिक राज्य में सर्वाधिक महत्वपूर्ण अंग व्यवस्थापिका अर्थात् कानून बनाने वाली संस्था होती है ।”-………..सी०एफ० स्ट्राँग


कार्यपालिका कानूनों को लागू करती है और न्यायपालिका कानूनों की व्याख्या करती है तथा इनका उल्लंघन करने वालों को दण्ड देती है । समाज में शान्ति एवं व्यवस्था बनाए रखने के लिए कानून बनाना आवश्यक है, अन्यथा समाज में अराजकता फैल जाएगी । लगभग सभी शासन प्रणालियों में कानून बनाना, धन पर नियंत्रण, पद तथा सेवाओं की स्थापना तथा संविधान संशोधन व्यवस्थापिका के कार्य-क्षेत्र के अन्तर्गत आते हैं । संसदीय शासन-प्रणाली में व्यवस्थापिका सर्वोच्च होती है तथा कार्यपालिका उसके प्रति उत्तरदायी होती है । इंग्लैण्ड तथा भारत इसके अच्छे उदाहरण हैं, जहाँ संसद कार्यपालिका से ऊपर है तथा मन्त्रिपरिषद, संसद के प्रति उत्तरदायी होता है । व्यवस्थापिका एकसदानात्मक अथवा द्विसदनात्मक हो सकती है ।


द्विसदनात्मक व्यवस्थापिका के गुण-द्विसदनात्मक व्यवस्थापिका के गुण निम्नलिखित हैं
(i) द्विसदनात्मक पद्धति प्रजातान्त्रिक सिद्धान्तों के अनुकूल- प्रजातान्त्रिक व्यवस्था की रक्षा के लिए वैयक्तिक स्वतंत्रता की रक्षा अनिवार्य है । इसके लिए यह आवश्यक है कि सम्प्रभुता का केन्द्रीकरण किसी एक अंग या सभा के हाथ में न होने पाए । इसी उद्देश्य से यह भी आवश्यक है कि व्यवस्थापिका के अन्तर्गत एक सदन के हाथों में शक्ति को केन्द्रित होने से बचाने के लिए द्विसदनात्मक प्रणाली अपनाई जाए ।

“हमें ऐसा संविधान बनाना है कि जो ऐसे उपाय खोज निकाले जिससे सरकार शासितों के ऊपर नियंत्रण रख सके तथा पहले ऐसा उपाय खोजे जिससे शासन स्वयं अपने ऊपर नियंत्रण रखे ।’………………………….-मेडिसन

(ii) निम्न सदन को योगदान-————– आज प्रजातान्त्रिक युग में राज्य के कार्यों में पर्याप्त वृद्धि हुई है । व्यवस्थापिका के निम्न सदन के कार्य इतने बढ़ गए हैं कि उन्हें अकेले नहीं सँभाला जा सकता । इसके अलावा इसके सदस्य निरन्तर बदलते रहते हैं और शासन की जटिलता से परिचित होने का अवसर उन्हें नहीं मिल पाता । इसके विपरीत, उच्च सदन एक स्थायी सभा होती है, उसमें अनुभवी और योग्य व्यक्तियों की संख्या अधिक होती है । अत: प्रशासन के कार्यों के संचालन में वह निम्न सदन को अपना महत्वपूर्ण योगदान देती है ।


(III) सभी विशिष्ट वर्गों के हितों का प्रतिनिधित्व–————– निम्न सदन के प्रतिनिधि केवल बहुमत के प्रतिनिधि होते हैं । अल्पसंख्यकों के प्रतिनिधि चुनाव में पीछे छूट जाते हैं । ऐसा भी देखा जाता है कि बहुत से अनुभवी और योग्य व्यक्ति निर्वाचन के झमेले में नहीं पड़ना चाहते । इसलिए वे प्रतिनिधि भी नहीं होना चाहते । इन त्रुटियों की पूर्ति उच्च सदन द्वारा होती है । इसमें देश के अनुभवी, योग्य, कुशल एवं बुद्धिमान व्यक्तियों को मनोनीत कर लिया जाता है । उच्च सदन ज्ञान-बुद्धि, परम्परा और राजनीतिक अनुभव का कोष होता है क्योंकि उसमें प्राय: बुद्धिमान और अनुभवी राजनीतिज्ञों को प्राथमिकता दी जाती है ।


(IV) द्विसनात्मक पद्धति कानून बनाने में जल्दबाजी और उतावलेपन को रोककर उन पर सुधारात्मक प्रभाव डालती है–—एकसदनात्मक व्यवस्थापिका में जनता द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधि रहते हैं, अत: वे जनता की क्षणिक भावनाओं या आवेशों से प्रभावित होकर कानून बनाने में अधिक जल्दबाजी कर सकते हैं । परिणामस्वरूप एकपक्षीय और तर्कहीन कानूनों के बनने की आशंका बनी रहती है । इसके विपरीत जहाँ द्विसदनात्मक व्यवस्थापिका है, वहाँ दूसरे सदन में निचले सदन द्वारा बनाए गए विधेयकों पर विवेकपूर्ण विचार कर उनकी त्रुटियों को दूर कर दिया जाता है ।


(V) द्विसदनात्मक पद्धति स्वेच्छाचारिता और निरंकुशता पर रोक लगाती है-—— राज-शक्ति प्राय: मनुष्य को घमण्डी, महत्वाकांक्षी तथा स्वेच्छाचारी बना देती है । व्यवस्थापिका के प्रथम सदन के सदस्य यद्यपि जनता द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधि होते है, किन्तु ऐसा भी सम्भव है कि एक बार निर्वाचित होने के बाद वे निरंकुशता की ओर अग्रसर हों । वे भावावेश तथा जोशीले भाषणों के प्रभाव में बहकर अनुत्तरदायी और स्वेच्छाचारी शासन की स्थापना कर नागरिकों की स्वतंत्रता का हनन कर सकते हैं ।

(vi) संघात्मक शासन व्यवस्था के लिए अनिवार्य—— संघात्मक शासन व्यवस्था के लिए द्विसदनात्मक प्रणाली का होना आवश्यक है । संघ शासन में अनिवार्यत: दो तत्वों का प्रतिनिधित्व होता है- एक जनता का और दूसरे संघीभूत इकाइयों का । अत: जनता के प्रतिनिधित्व के लिए निम्न या प्रथम सदन तथा संघीभूत इकाइयों के लिए उच्च या द्वितीय सदन की व्यवस्था की जाती है । उदाहरण के लिए अमेरिका, भारत आदि संघ-राज्यों में द्वितीय सदन राज्य का प्रतिनिधित्व करते हैं ।


(vii) पुनरावलोकन का कार्य-बेजहॉट का कथन है—————- “उच्च सदन विधेयकों का पुनरावलोकन करता है ।” अत: निम्न सदन द्वारा जो विधेयक पारित होकर आता है, उसमें बहुत-सी त्रुटियों की सम्भावना बनी रहती है । उच्च सदन में उन दोषों को दूर करने का प्रयत्न किया जाता है । यह निम्न सदन से आए विधेयकों को शीघ्रता से पारित नहीं करता, संशोधन करने का उसे पर्याप्त अवसर मिल जाता है तथा विधेयकों के संबंध में लोकमत का अनुमान लग जाता है । अत: इस अर्थ में दूसरा सदन अत्यन्त उपयोगी माना जाता है ।

3– व्यवस्थापिका के मुख्य कार्यों का उल्लेख कीजिए ।
उत्तर — व्यवस्थापिका के कार्य– विभिन्न देशों की व्यवस्थापिकाएँ भिन्न-भिन्न कार्य करती हैं, तथापि कुछ ऐसे हैं, जिनका सम्पादन सभी देशों के व्यवस्थापिकाएँ करती हैं । इन कार्यों का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है

(i) कानूनों का निर्माण– व्यवस्थापिका का सर्वाधिक महत्वपूर्ण कानूनों का निर्माण करना है । यह आवश्यकता के अनुसार नए कानून बनाती है, पुराने कानूनों में संशोधन करती है और अनावश्यक कानूनों को रद्द करती है ।

(ii) संविधान में संशोधन- व्यवस्थापिका को संविधान में संशोधन करने का अधिकार भी प्राप्त होता है । संविधान में संशोधन करने की प्रक्रिया भिन्न-भिन्न देशों में भिन्न-भिन्न प्रकार की है । इंग्लैण्ड में व्यवस्थापिका (ब्रिटिश संसद) ही सर्वोपरि है । वह साधारण कानूनों के समान ही संविधान में संशोधन कर सकती है । परन्तु संयुक्त राज्य अमेरिका और भारत में संशोधन की विशेष प्रक्रिया अपनाई जाती है ।

(iii) निर्वाचन संबंधी कार्य- —-व्यवस्थापिका निर्वाचन संबंधी कार्यों का संपादन करती है । हमारे देश में संसद के दोनों सदनों के सदस्य राज्यों के विधानमण्डलों के साथ मिलकर राष्ट्रपति के निर्वाचन के लिए निर्वाचक-मंडल का निर्माण करते हैं ।

(iv) वित्तीय कार्य—— व्यवस्थापिका देश की सम्पूर्ण वित्त व्यवस्था पर नियंत्रण रखती है । वह नए कर लगाती है और निरर्थक करों को समाप्त करती है । इसके अतिरिक्त वह ऋणों की व्यवस्था करती है । और राजकीय व्ययों को स्वीकृति प्रदान करती है ।

(v) कार्यपालिका पर नियंत्रण-—- विश्व के सभी देशों में व्यवस्थापिका किसी-न-किसी रूप से कार्यपालिका पर नियंत्रण स्थापित करती है । संसदीय शासन-प्रणाली में तो कार्यपालिका व्यवस्थापिका के नियंत्रण में रहकर ही कार्य करती है । इसके साथ-ही-साथ व्यवस्थापिका प्रश्न पूछकर, काम रोको प्रस्ताव रखकर भी कार्यपालिका पर नियंत्रण रखती है । इसके अतिरिक्त संसदात्मक शासन-प्रणाली वाले देशों में व्यवस्थापिका के सदस्य ही कार्यपालिका के सदस्य बनते हैं । यदि किसी ऐसे व्यक्ति को कार्यपालिका का सदस्य बना लिया जाता है, जो व्यवस्थापिका का सदस्य न हो, तो उसे किसी न-किसी रूप मे निर्धारित अवधि के अन्तर्गत व्यवस्थापिका की सदस्यता ग्रहण करनी होती है ।

(vi) राज्य के नीति संबंधी कार्य-— व्यवस्थापिका ही राज्य की गृह-नीति का निर्धारण करती है और उसके द्वारा स्वीकृत नीति ही कार्यपालिका द्वारा क्रियान्वित की जाती है ।

(vii) वैदेशिक नीति संबंधी कार्य–— राज्य की विदेश नीति पर भी व्यवस्थापिका का नियंत्रण होता है । वह युद्ध, शान्ति, सन्धि तथा अंतराष्ट्रीय संबंधों के विषय में निर्णय लेने का अधिकार रखती है ।

(viii) लोकमत का निर्माण——————— लोकमत का निर्माण करने वाली प्रमुख संस्थाओं में व्यवस्थापिका को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है । व्यवस्थापिका के सदनों में राष्ट्रीय-हित के मामलों पर वाद-विवाद होता है । इन वाद-विवादों पर आधारित विचारों का ज्ञान जनता टेलीविजन, रेडियो तथा समाचार-पत्रों द्वारा प्राप्त करती हैं । इसके परिणामस्वरूप ही देश में स्वस्थ लोकमत का निर्माण होता है ।

(ix) न्याय संबंधी कार्य—- अनेक देशों में व्यवस्थापिका न्याय संबंधी कार्य भी करती है; उदाहरणार्थ- अमेरिका की ‘कांग्रेस’ और भारत की ‘संसद’ आवश्यकता के समय राष्ट्रपति पर महाभियोग लगाती है और उपराष्ट्रपति, न्यायमूर्ति आदि को समय से पूर्व पद से हटाने के सन्दर्भ में निर्णय करती है । इंग्लैण्ड में तो ‘लॉर्ड सभा’ अपील के उच्चतम न्यायालय के रूप में भी कार्य करती है ।
(x) समिति और आयोगों की नियुक्ति—– विधानमंडल समय-समय पर किन्हीं विशेष कार्यों की जाँच करने के लिए उन समितियों और आयोगों की नियुक्ति करता है । जिनके माध्यम से शासन के कार्यों की जाँच की जाती है ।

(xi) जनभावनाओं की अभिव्यक्ति- लोकतान्त्रिक व्यवस्थापिका में जनता के प्रतिनिधि सरकार का ध्यान जनता के कष्टों के प्रति आकर्षित करते हैं । इस प्रकार व्यवस्थापिका के माध्यम से जनभावनाओं की अभिव्यक्ति होती है । व्यवस्थापिका के उपर्युक्त कार्यों से स्पष्ट हो जाता है कि व्यवस्थापिका सरकार के तीनों अंगों में सबसे महत्वपूर्ण है ।

4– लोकतंत्र में व्यवस्थापिका का क्या महत्व है? इसके कार्यों का वर्णन कीजिए ।
उत्तर — व्यवस्थापिका का महत्व—— सरकार के तीनों ही अंगों द्वारा महत्वपूर्ण कार्य किए जाते हैं, लेकिन इन तीनों में व्यवस्थापन विभाग सर्वाधिक महत्वपूर्ण है । व्यवस्थापन विभाग व्यवस्थापिका ही उन कानूनों का निर्माण करती है । जिनके आधार पर कार्यपालिका शासन करती है और न्यायपालिका न्याय प्रदान करने का कार्य करती है । इस प्रकार व्यवस्थापिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के कार्य के लिए आवश्यक आधार प्रदान करती है व्यवस्थापन विभाग केवल कानूनों का ही निर्माण नहीं करता, वरन प्रशासन की नीति भी निश्चित करता है और संसदात्मक शासन-व्यवस्था में तो कार्यपालिका पर प्रत्यक्ष रूप से नियंत्रण भी रखता है । संविधान में संशोधन का कार्य भी व्यवस्थापिका के द्वारा ही किया जाता है । अत: यह कहा जा सकता है कि व्यवस्थापन विभाग सरकार के दूसरे अंगों की अपेक्षा अधिक महत्वपूर्ण स्थिति रखता है । वर्तमान युग लोकतंत्रात्मक शासन-व्यवस्था का युग है । विश्व के प्रायः सभी महत्वपूर्ण देशों ने लोकतंत्रात्मक व्यवस्था को अपना लिया है । लोकतंत्रात्मक व्यवस्था में व्यवस्थापिका के महत्व को निम्नवत स्पष्ट किया जा सकता है

(i) व्यवस्थापिका जन-प्रतिनिधियों की सभा है————– व्यवस्थापिका जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों की सभा है, अत: जनता के निकट सम्पर्क में रहने के कारण यह जनता की कठिनाईयों तथा इच्छाओं से भली-भाँति परिचित होती है । व्यवस्थापिका द्वारा जनता की इच्छाओं को कार्यपालिका के समक्ष प्रस्तुत कर इसे जनभावना के अनुरूप कार्य करने को प्रेरित करने का महत्वपूर्ण कार्य किया जाता है । बड़े क्षेत्रफल वाले राज्यों में तो इसका महत्व और भी अधिक हो जाता है ।


(ii) प्रत्यक्ष लोकतंत्र की कठिनाई को दूर करती है——— प्रत्यक्ष लोकतंत्र केवल कम जनसंख्या तथा छोटे क्षेत्रफल वाले राज्यों में ही सफल हो सकता है क्योंकि बड़ी जनसंख्या का दूर-दूर से आकर एक स्थान पर एकत्रित होना प्रायः असम्भव ही है । अत: प्रत्यक्ष लोकतंत्र की इस समस्या का निवारण भी व्यवस्थापिका द्वारा हो जाता है ।


कानून-निर्माण के क्षेत्र में शक्ति का विकेन्द्रीकरण आवश्यक——- राजतंत्र तथा अधिनायक तंत्र में शासन की शक्ति के केन्द्रीकरण की आवश्यक बुराई को दूर करने के प्रयोजन से लोकतंत्र में सत्ता के विकेन्द्रीकरण की नीति अपनायी गई और उसी के अनुरूप व्यवस्थापिका अपने वर्तमान स्वरूप में आई । व्यवस्थापिका कानन-निर्माण की प्रक्रिया में कार्यपालिका पर अपना अंकुश लगाकर उसे स्वेच्छाचारी होने से रोके रहती है । लोकतंत्र में व्यवस्थापिका द्वारा किया जाने वाला यह एक अत्यन्त महत्वपूर्ण कार्य है । व्यवस्थापिका के कार्य- इसके लिए विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या- 3 के उत्तर का अवलोकन कीजिए ।

5– व्यवस्थापिका के कार्यों का वर्णन कीजिए तथा इसका कार्यपालिका से संबंध बताइए ।
अथवा
संसदात्मक शासन-प्रणाली में व्यवस्थापिका और कार्यपालिका के मध्य संबंधों का वर्णन कीजिए ।


उत्तर —————— व्यवस्थापिका के कार्य——- इसके लिए विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या- 3 के उत्तर का अवलोकन कीजिए । व्यवस्थापिका और कार्यपालिका में संबंध—— कार्यपालिका तथा व्यवस्थापिका के संबंध की प्रकृति ही शासन की प्रमुख प्रणालियों-संसदात्मक प्रणाली और अध्यक्षात्मक प्रणाली में भेद स्थापित करती है । संसदात्मक प्रणाली में कार्यपालिका तथा व्यवस्थापिका के मध्य संबंध बहुत घनिष्ठ होता है । कार्यपालिका को व्यवस्थापिका की एक समिति कहा जा सकता है । अध्यक्षात्मक शासन-प्रणाली में कार्यपालिका और व्यवस्थापिका सिद्धान्त रूप से सर्वथा एक-दूसरे से अलग होती है, परन्तु शासन की आवश्यकताएँ इन्हें पूर्णरूपेण पृथक् नहीं रहने देती हैं । इस प्रकार व्यवहार रूप में दोनों एक-दूसरे को नियंत्रित और मर्यादित करती हैं । प्रत्येक राज्य में कार्यपालिका को प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से कुछ विधायी कार्य करने पड़ते हैं और व्यवस्थापिका को कुछ कार्यपालिका सम्बन्धी कार्य करने पड़ते हैं । कार्यपालिका और व्यवस्थापिका के संबंध का अध्ययन दो रूपों में किया जा सकता है-


(i) कार्यपालिका की विधायी शक्तियाँ और उसका व्यवस्थापिका पर नियंत्रण ।
(ii) व्यवस्थापिका की प्रशासकीय शक्तियाँ और उसका कार्यपालिका पर नियंत्रण ।
(क) कार्यपालिका की विधायी शक्तियाँ और उसका व्यवस्थापिका पर नियंत्रण————— कार्यपालिका कई प्रकार से विधायी अर्थात् कानून-निर्माण संबंधी कार्यों में भाग लेती हैं । संसदीय शासन-प्रणाली वाले देशों में कार्यपालिका को व्यवस्थापिका का अधिवेशन बुलाने, उसको स्थगित करने तथा समाप्त करने का अधिकार होता है । वह निम्न सदन को भंग करके नये चुनाव के लिए आदेश दे सकती है, परन्तु अध्यक्षात्मक शासन-प्रणाली वाले देशों में कार्यपालिका व्यवस्थापिका को समय-समय पर देश की कानून संबंधी आवश्यकताओं से अवगत कराती रहती है और उसका उचित नेतृत्व और पथ प्रदर्शन करती है । कार्यपालिका समस्त विधेयकों का प्रारूप तैयार करती है और

व्यवस्थापिका में उन्हें प्रस्तुत करती है तथा विपक्ष की आलोचनाओं को सहन करती हुई पारित कराती है । अध्यक्षात्मक प्रणाली में कार्यपालिका अप्रत्यक्ष रूप से विधायी कार्य को प्रभावित करती है । दूसरे शब्दो में, इस प्रणली में राष्ट्रपति को केवल सन्देशों के माध्यम से ही व्यवस्थापिका का ध्यान आलोचनाओं की ओर आकर्षित करने का अधिकार होता है । अमेरिका के राष्ट्रपति को व्यवस्थापिका (कांग्रेस) को सन्देश भेजने का अधिकार है । संसदात्मक तथा अध्यक्षात्मक दोनों प्रकार की प्रणलियों में कार्यपालिका को अध्यादेश जारी करने तथा व्यवस्थापिका द्वारा पारित विधेयकों के संबंध में निषेधाधिकार प्रयोग करने का अधिकार प्राप्त होता है । ब्रिटेन की संसद सम्राट के निषेधाधिकार की उपेक्षा नहीं कर सकती । बहुत से राज्यों में व्यवस्थापिका बहुमत के आधार पर इसे अस्वीकार कर सकती है । हैमिल्टन के अनुसार, “निषेधाधिकार कार्यपालिका के लिए कवच का काम करता है ।” कुछ देशों में प्रतिनिध्यात्मक विधायी प्रणाली का प्रयोग किये जाने लगा है, जिसके कारण कार्यपालिका की विधायी शक्तियों का क्षेत्र और अधिक विकसित हो गया है ।

                 (ख) व्यवस्थापिका की प्रशासनिक शक्तियाँ और उसका कार्यपालिका पर नियंत्रण------ दूसरी ओर कार्यपालिका भी  कई प्रकार से व्यवस्थापिका द्वारा नियन्त्रित होती है । संसदीय प्रणाली में यह नियंत्रण अध्यक्षात्मक प्रणाली की अपेक्षा अधिक होता है । संसदीय प्रणाली में कार्यपालिका का जीवन व्यवस्थापिका की इच्छा पर निर्भर होता है । दूसरे शब्दों में, कार्यपालिका उस समय तक अपने पद पर बनी रहती है जब तक कि उसे व्यवस्थापिका का विश्वास प्राप्त है । व्यवस्थापिका अविश्वास प्रस्ताव पारित करके, कार्यपालिका के- शासन संबंधी आचरण की निन्दा का प्रस्ताव स्वीकृत करके, अनुदान करके अथवा सरकार द्वारा प्रस्तुत किसी प्रस्ताव को अस्वीकृत करके मन्त्रिमण्डल को अपने पद से हटा सकती है । अध्यक्षात्मक शासन-प्रणाली में इस प्रकार के नियंत्रण उपलब्ध नहीं होते हैं । इसमें कार्यपालिका को नियन्त्रित करने के दसरे साधन हैं । अमेरिका में लोक सदन राष्ट्रपति को महाभियोग द्वारा पद से हटा सकता है । इसी प्रकार सीनेट को कार्यपालिका द्वारा की गयी उच्च नियुक्तियों को स्वीकृत प्रदान करने का अधिकार है तथा राष्ट्रपति द्वारा प्रत्येक सन्धि के लिए उसकी अनुमति प्राप्त करना आवश्यक होता है । कार्यपालिका और व्यवस्थापिका के संबंधों में उपर्युक्त वर्णन से यह स्पष्ट हो जाता है कि दोनों ही एक-दूसरे पर नियंत्रण रखती हैं । ऐसी स्थिति में यह अत्यन्त आवश्यक हो जाता है कि इन दोनों के संबंध परस्पर सहयोगपूर्ण  होने चाहिए । यदि पारस्परिक सहयोग नहीं रहेगा तो शासन कार्य सुचारू रूप से चलना असम्भव हो जायेगा । 

6– व्यवस्थापिका के कार्यों की व्याख्या कीजिए ।वर्तमान युग में व्यवस्थापिका के ह्रास के क्या कारण है?
उत्तर — व्यवस्थापिका के कार्य—– इसके लिए विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या-3 के उत्तर का अवलोकन कीजिए ।
वर्तमान युग में व्यवस्थापिका के ह्रास के कारण——- व्यवस्थापिका के महत्व में कमी और इसकी शक्तियों के ह्रास के लिए कई कारण हैं । संक्षेप में व्यवस्थापिका के ह्रास के निम्नलिखित कारण हैं-


(i) युद्ध और संकट की स्थिति——- प्रायः सभी लोकतान्त्रिक देशों में राज्याध्यक्ष ही सेना का प्रधान होता है, सैनिक मामलों में विधायिका कुछ भी नहीं कर सकती है । अत: युद्ध या अन्य संकटकाल के समय विधायिका नहीं अपितु कार्यपालिका सर्वेसर्वा बन जाती है, ऐसी कठिन परिस्थितियों में तुरन्त निर्णय लेने की आवश्यकता होती है । उदाहरण के लिए सन् 1971 ई० के युद्ध में भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गाँधी ने स्वतंत्र रूप से युद्ध-नीति का संचालन किया था । अमेरिका में भी राष्ट्रपति निक्सन ने वियतनाम युद्ध के दौरान कई बार कांग्रेस की अवहेलना की थी । फॉकलैण्ड युद्ध में भी ब्रिटिश प्रधानमन्त्री श्रीमती मार्गरेट थैचर ने देश का नेतृत्व स्वयं किया था । अत: युद्ध या संकट के समय कार्यपालिका ऐसी स्थिति ला देती है, जिससे विधायिका के समक्ष उसे स्वीकार करने के अतिरिक्त और कोई रास्ता नहीं रह जाता है । यह प्रक्रिया 20वीं शताब्दी में प्रारम्भ हुई ।


(ii) परामर्शदात्री समितियों और विशेषज्ञ समितियों का विकास—- प्रत्येक मन्त्रालय और विभाग में सलाहकार समितियाँ गठित होने लगी है तथा विशेषज्ञों के संगठन बनाए जाने लगे हैं । विधेयकों का प्रारूप तैयार करने में इनसे सलाह ली जाती है । सदन में जब विचार-विमर्श होता है और सदस्यों द्वारा संशोधन प्रस्तुत किए जाते हैं, तब यह कहकर उन्हें चुप कर दिया जाता है कि इस पर विशेषज्ञों की सलाह ली जा चुकी है । फलस्वरूप विधायिका के समक्ष ऐसे प्रस्तावों को स्वीकृत करने के अलावा अन्य कोई विकल्प नहीं रह जाता है ।


(iii) दबाव गुटों और हितसमूहों का विकास——— 20वीं शताब्दी में विधायिका के सदस्यों का एक मुख्य कार्य जन-शिकायतों को सरकार तक पहुँचाना रहा, लेकिन दबाव गुटों और हितसमूहों के विकास के कारण उसकी इस भूमिका में भी कमी आई । पिछली शताब्दी में नागरिक संगठित हितसमूहों का सदस्य होता गया । परिणामस्वरूप विधायिका की अनदेखी कर कार्यपालिका से वह सीधा सम्पर्क जोड़ लेता था और अपनी मांगों को मनवाने के सन्दर्भ में सफलता प्राप्त करता था । अत: विधायिका पृष्ठभूमि में चली गई और निर्णय प्रक्रिया में कार्यपालिका ही मुख्य भूमिका अदा करती रही ।


(iv) संचार साधनों की भूमिका———— रेडियो और टेलीविजन विज्ञान के ऐसे चमत्कार हैं, जिन्होंने कार्यपालिका के प्रधान का जनता के साथ प्रत्यक्ष संबंध जोड़ा । संचार साधनों के ऐसे विकास से कार्यपालिका के प्रधान द्वारा विधायिका को नजरअन्दाज कर सीधा जनसम्पर्क स्थापित किया जाने लगा जिसका प्रतिकूल प्रभाव विधायिका की शक्तियों पर पड़ता गया ।


(v) प्रतिनिधायन—— के०सी० ह्वीयर के मतानुसार प्रतिनिधायन द्वारा कार्यपालिका ने विधायिका की कीमत पर अपनी स्थिति को सुदृढ़ किया है । इस सिद्धान्त के फलस्वरूप कार्यपालिका को विधि-निर्माण का अधिकार प्राप्त हो गया । व्यवहार में विभिन्न कारणों से विधायिका ने स्वत: कार्यपालिका को यह शक्ति प्रदान की । अत: विधि-निर्माण का जो मुख्य कार्य विधायिका के कार्य क्षेत्र के अन्तर्गत था वह भी प्रतिनिधायन के कारण उसके क्षेत्राधिकार से निकलता चला गया ।


(vi) कार्यपालिका की शक्तियों में असीम वृद्धि- पूर्व की तुलना में विभिन्न कारणों से कार्यपालिका का अधिक महत्वपूर्ण होना स्वाभाविक है । अनेक विद्वान यह मानते हैं कि इसकी शक्तियों में वृद्धि कर विपरीत प्रभाव विधायिका पर पड़ता है । इसीलिए विगत शताब्दी में अनेक राष्ट्रों में विधायिका की संस्था और कमजोर हुई है ।


(vii) वैदेशिक संबंधों की सर्वोच्चता- भूतपूर्व अमरीकी राष्ट्रपति वुडरो विल्सन का मत है कि कार्यपालिका की शक्ति के बढ़ने से अन्तर्राष्ट्रीय संबंधों में उसे महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करना पड़ता है । वैदेशिक संबंध एक ऐसा क्षेत्र है जिसमें विधायिका शायद ही महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करती हो, लेकिन कार्यपालिका द्वारा इस क्षेत्र में सफलतापूर्वक निर्वाह किया जाता रहा है । धीरे-धीरे यह क्षेत्र विधायिका से कार्यपालिका की ओर खिसकता जा रहा है । इस प्रकार विधायिका की स्थिति निरन्तर कमजोर होती चली गई है ।

(viii) विभिन्न राष्ट्रों में लोक-कल्याणकारी राज्य की भावना का उदय-20वीं शताब्दी में समाज का सर्वांगीण विकास करने के लिए राज्य का कार्य-क्षेत्र बहुत बढ़ गया । लोक-कल्याण प्रत्येक राज्य का उद्देश्य बन गया । इससे नि:सन्देह विधायिका के कार्य भी बढ़े किन्तु कार्यपालिका विधायिका की तुलना में और महत्वपूर्ण हो गई है । परिणामस्वरूप पिछली शताब्दी में विधायिका का प्रभाव कार्यपालिका की तुलना में कम हो गया ।


(ix) अनुशासित राजनीतिक दलों का विकास- एल०ए० बॉल के अनुसार 20वीं शताब्दी में बड़े-बड़े अनुशासित दलों के विकास तथा कार्यपालिका शक्ति में वृद्धि के कारण विधायिकाओं के पतन या ह्रास की चर्चा एक सामान्य-सी बात हो गई है । विधायी शक्ति को कार्यपालिका ने वास्तविक अर्थ में दलों के माध्यम से छीन लिया है । दलीय अनुशासन की कठोरता के कारण कार्यपालिका विधायी नियंत्रण से कम से कम संसदीय शासन-प्रणाली में तो मुक्त हो गई हैं ।
अत: इस तथ्य की उपेक्षा नहीं की जा सकती कि अनुशासित राजनीतिक दलों के कारण विधायिकाएँ कार्यपालिका का रबड़ स्टाम्प बन गई हैं ।


(x) संकट व तनाव की अवस्था का युग- रॉबर्ट सी० बोन ने 20वीं शताब्दी को चिन्ता का युग कहा है । उक्त शताब्दी में विभिन्न देशों में किसी-न-किसी कारण से प्राय: ही संकट के बादल मँडराते रहे, जो न केवल सरकारों को बल्कि नागरिकों को भी तनाव की स्थिति में ला देते थे । संचार-साधनों के विकास के कारण विश्व की घटनाओं का समाचार निरन्तर रेडियों तथा टेलीविजन द्वारा मिलना सामान्य बात थी । ऐसी स्थिति में कार्यपालिका ही उनकी आशा का केन्द्र बनी । यही कारण है कि चिन्ता के उस युग में विधायिका लोगों को आश्वस्त करने की भूमिका नहीं निभा सकी । यह कार्य कार्यपालिका का हो गया । आज कार्यपालिका सर्वशक्तिमान बनने की दिशा में बढ़ रही है ।

7– व्यवस्थापिका के आधारभूत कार्यों का वर्णन कीजिए और संसदात्मक प्रणाली में इसकी विशिष्ट भूमिका पर भी प्रकाश डालिए ।
उत्तर ——- व्यवस्थापिका के आधारभूत कार्य—– इसके लिए विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या- 3 के उत्तर का अवलोकन कीजिए ।

संसदात्मक प्रणाली में व्यवस्थापिका की भूमिका ( महत्व)—- इसके लिए विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या- 4 के उत्तर में ‘लोकतंत्र में व्यवस्थापिका का महत्व’ का अवलोकन कीजिए

8– “द्वितीय सदन की विद्यमानता स्वतंत्रता की गारण्टी व कुछ सीमा तक अत्याचार से सुरक्षा भी है ।” इस कथन के
आलोक में द्विसदनात्मक व्यवस्थापिका के पक्ष में तर्क दीजिए ।

उत्तर ———– “द्वितीय सदन की विद्यमानता स्वतंत्रता की गारण्टी व कुछ सीमा तक अत्याचार से सुरक्षा भी है” इस कथन के आलोक में द्विसदनात्मक व्यवस्थापिका के पक्ष में तर्क निम्नलिखित हैं
(i) प्रथम सदन की मनमानी पर रोक- यह एक सर्वमान्य तथ्य है कि शक्ति भ्रष्ट करती है और बिना किसी प्रतिबन्ध के दी हुई शक्ति मनुष्य को नितान्त भ्रष्ट कर देती है । व्यवस्थापिका अत्याचारी, भ्रष्ट व स्वेच्छाचारी न होने पाये, इसके लिए दो सदन होना आवश्यक है ।


डॉ० गार्नर के शब्दों में, “इस प्रकार द्वितीय सदन की विद्यमानता स्वतंत्रता की गारण्टी व कुछ सीमा तक अत्याचार से सुरक्षा भी है ।”


(ii) अविचारपूर्ण कानून निर्माण पर रोक- दूसरा सदन पहले सदन की जल्दबाजी और कुविचारपूर्ण कानूनों पर रोक लगाने का सर्वाधिक प्रभावशाली साधन है । जनता के प्रतिनिधि भावुक, क्रान्तिकारी और अव्यहारिक होते हैं और अनेक बार वे ऐसे क्रान्तिकारी कानून बनाने के लिए तैयार हो जाते हैं जिनसे लाभ के स्थान पर हानि ही अधिक होती है । द्वितीय सदन इस प्रकार के अविचारपूर्ण कानूनों पर रोक लगाकर अत्यन्त उपयोगी कार्य करता है । दूसरे सदन की उपयोगिता बताते हुए ब्लण्टशली ने कहा है कि “दो आँखों की अपेक्षा चार आँखें सदा अच्छा देखती है । विशेषतः जब किसी प्रश्न पर विभिन्न दृष्टिकोणों से विचार करना आवश्यक हो ।”


(iii) सभी वर्गों को प्रतिनिधित्व- प्रथम सदन में शक्तिशाली राजनीतिक दलों से संबंधित निम्न एवं मध्यम वर्ग के सदस्यों को ही प्रतिनिधित्व प्राप्त हो पाता है, लेकिन लोकतंत्र का आदर्श सभी वर्गों को प्रतिनिधित्व प्रदान करना है । अत: दूसरे सदन में विशेष वर्गों, अल्पसंख्यकों एवं विद्या, ज्ञान एवं अनुभव की दृष्टि से योग्य व्यक्तियों का प्रतिनिधित्व सुरक्षित रखा जा सकता है । इस प्रकार प्रतिनिधित्व की उत्तमता की दृष्टि से दो सदनों की व्यवस्था श्रेष्ठ समझी जाती है ।

(iv) कार्य-विभाजन से लाभ- जनकल्याणकारी राज्य के विचार को अपना लेने के कारण वर्तमान समय में व्यवस्थापिका के अन्तर्गत कार्य बहुत अधिक बढ़ गये हैं । व्यवस्थापिका के दो सदन होने पर इस बढ़े हुए कार्य का विभाजन किया जा सकता है और इससे व्यवस्थापिका की कार्यक्षमता बढ़ जाती है । वे विधेयक, जिन पर विशेष मतभेद नहीं होता । पहले द्वितीय सदन में पेश किये जा सकते हैं और प्रथम सदन अपना ध्यान अधिक महत्वपूर्ण समस्याओं की ओर केन्द्रित कर सकता है ।


(v) जनमत निर्माण में सहायक- विधेयक के निम्न सदन से पास हो जाने के बाद उच्च सदन में पास होने में समय लगता है । इस प्रकार उच्च सदन विधेयक पास करने से पूर्व जनता को विधेयक के बारे में सोचने-विचारने के लिए समय देता है और सामान्य जनता, राजनीतिक दल एवं प्रेस इस प्रस्तावित विधेयक पर अपने विचार व्यक्त कर सकते हैं ।


(vi) स्वतंत्रता की रक्षा का साधन- द्विसदनात्मक व्यवस्थापिका जनता की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए भी अत्यन्त आवश्यक है । यह नीतियों में संतुलन स्थापित करती व अल्पसंख्यकों की रक्षा करती है । लॉर्ड एक्टन ने दूसरे सदन को स्वतनत्रता की रक्षा का सबसे प्रमुख साधन माना है । कार्यपालिका की स्वतंत्रता में वृद्धि- गैटिल का कथन है कि, “दो सदन एक-दूसरे पर रुकावट का कार्य करके कार्यपालिका को अधिक स्वतंत्रता प्रदान करते हैं और अन्त में इससे लोकहित की बढ़ोत्तरी होती है । कई बार मन्त्रियों को अपनी सही नीति के लिए भी प्रथम सदन में पर्याप्त समर्थन नहीं मिल पाता । ऐसी स्थिति में यदि उन्हें द्वितीय सदन में पर्याप्त समर्थन मिल जाए, तो उनकी स्थिति काफी मजबूत हो जाती है ।

9– द्विसदनात्मक व्यवस्थापिका के पक्ष एवं विपक्ष में तर्क दीजिए ।
उत्तर — द्विसदनात्मक व्यवस्थापिका के पक्ष में तर्क- इसके लिए विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या-8 के उत्तर का अवलोकन कीजिए ।
द्विसदनात्मक व्यवस्थापिका के विपक्ष में तर्क—-द्विसदनात्मक व्यवस्थापिका के विपक्ष में निम्नलिखित तर्क दिए जा सकते है
(i) उत्तरदायित्व का विभाजन- द्विसदनात्मक पद्धति में उत्तरदायित्व एवं शक्ति विभाजित रहती है, अत: यह पता लगाना कठिन हो जाता है कि व्यवस्थापिका की इच्छा क्या है और किसी भी कार्य के लिए अन्तिम रूप से जिम्मेदार कौन है ।
(ii) सर्वसाधारण हितों के प्रतिकूल- इससे किसी भी वर्ग के हितों का संरक्षण नहीं होता, बल्कि सार्वजनिक हित को क्षति पहुँचती है । इस प्रणाली का इतिहास इस बात का प्रमाण है कि इसकी स्थापना धनी वर्ग के हितों के संरक्षण के लिए हुई है । उदाहरण के लिए अमेरिका में द्वितीय सदन, सीनेट सम्पत्तिवान एवं पूँजीपति वर्ग का और इंग्लैण्ड में लॉर्ड सभा प्रतिक्रियावादियों का गढ़ और धनवान वर्गों का संरक्षक है । वास्तविकता तो यह है कि पूँजीवादी वर्ग ने उच्च सदन को अपनी हित साधना का एक माध्यम बना लिया है ।
(III) सम्प्रभुता की धारणा के विपरीत- प्रजातंत्र में सार्वभौमिकता जनता में निवास करती है । इस सम्प्रभुता की अभिव्यक्ति जनता की इच्छा में होती है, जिसका प्रतिनिधित्व व्यवस्थापिका द्वारा होता है । यह सम्प्रभु इच्छा अखण्ड या अविभाजित होती है । इसलिए इसके प्रतिनिधित्व के लिए केवल एक ही सदन होना चाहिए, दूसरे सदन की कोई आवश्यकता नहीं है ।

Up Board Class 12th Civics Chapter 4 Right and Duties अधिकार एवं कर्त्तव्य

(IV) द्वितीय सदन कानून में कोई आवश्यक संशोधन भी नहीं करता है- द्विसदनात्मक व्यवस्था के समर्थकों का मानना है कि दूसरा सदन पहले द्वारा बनाए गए कानूनों में संशोधन और आवश्यक सुधार की संस्तुति करता है । किन्तु यह विचार भी निरर्थक है । दल प्रथा के कारण भी सदस्य अपने दल के निर्णय के विपरीत कार्य नहीं कर सकता है । इसके अलावा सदन में एक ही दल का बहुमत हो तो प्रथम सदन के बहुमत द्वारा पारित किए गए विधेयक को दूसरा सदन संशोधित अथवा परिवर्तित नहीं कर सकता ।

(V) कानून बनाने के लिए दो सदन आवश्यक नहीं- एकसदनात्मक व्यवस्थापिका में केवल जनता के प्रतिनिधि रहते हैं, जो किसी भी कानून को क्षणिक भावावेश और उतावलेपन में पारित कर देते हैं । एक सदन के इसी उतावलेपन एवं जल्दबाजी को रोकने के लिए द्विसदनात्मक प्रणाली अपनाई गई है । इस प्रणाली से अच्छे और उपयोगी कानूनों की रचना होती है । लेकिन यह विचार भ्रामक है । आज प्रथम सदन के उतावलेपन पर जल्दबाजी का आरोप लगाना गलत है । प्रो० लास्की का कथन है कि कम-से-कम इस आधार पर दूसरे सदन का समर्थन तो नहीं किया जा सकता है । आज किसी विधेयक को कानून का रूप देने के लिए प्रथम सदन में उस लम्बे समय तक विचार-विमर्श होता है । समाचार-पत्रों में उसे प्रकाशित कर उस पर लोकमत जान लिया जाता है । आज प्रथम सदन किसी भी विधेयक को अधिक सतर्कता से कानून का रूप देता है । इसके अलावा आधुनिक युग में प्रथम सदन के अविवेकपूर्ण कार्यों पर अंकुश लगाने के लिए राजनीतिक दल, प्रेस, रेडियो, दूरदर्शन, सभा-संस्थाएँ, आन्दोलन, लोकमत, न्यायालय आदि अनेक शक्तिशाली संस्थाएँ हैं ।

(vi) अत्यन्त खर्चीली पद्धति है- “आधुनिक राज्यों की आवश्यकता की पूर्ति एकसदनीय व्यवस्थापिका में ही हो सकती है क्योंकि द्विसदनीय व्यवस्थापिका में काम की पुनरावृत्ति होती है, समय नष्ट होता है और राष्ट्रीय कोष पर अनावश्यक भार पड़ता है ।”……………………………………….-प्रो० लास्की
(VII) गत्यावरोध की सम्भावना————— द्विसदनात्मक व्यवस्थापिका में दोनों सदनों के बीच संघर्ष की स्थिति उत्पन्न होने से गत्यावरोध की सम्भावना बनी रहती है । इसका प्रमुख कारण दोनों सदनों के स्वरूप और संरचना में विभिन्नता है । द्वितीय सदन रूढ़िवादियों तथा प्रतिक्रियावादियों का शरण-स्थल बन जाता है जो प्रथम सदन के प्रगतिशील विधेयकों का आवश्यक रूप से विरोध करता है ।

(viii) संगठन संबंधी अनिश्चितता- द्वितीय सदन का संगठन संबंधी सिद्धान्त सर्वमान्य तथा निश्चित नहीं है । विभिन्न देशों ने इसकी रचना व संगठन विभिन्न परम्पराओं और सिद्धान्तों के आधार पर की है । प्रायः सभी देशों में इसका संगठन अप्रजातान्त्रिक है । उदाहरण के लिए इंग्लैण्ड के दूसरे सदन लॉर्ड सभा के प्रतिनिधियों का चुनाव वंश परम्परा या अधिकार के आधार पर किया जाता है । इसके अतिरिक्त इस पद्धति में यह निश्चित करना कठिन हो जाता है कि द्वितीय सदन को वास्तव में कितने अधिकार दिए जाने चाहिए ।
(ix) संघात्मक शासन के लिए भी दूसरा सदन आवश्यक नहीं- वर्तमान में संघीय शासन व्यवस्था के अन्तर्गत अल्पसंख्यकों अथवा संघीभूत इकाइयों के अधिकारों की रक्षा दूसरे सदन से नहीं बल्कि वैधानिक संरक्षण एवं स्वतंत्र न्यायपालिका द्वारा हो सकती है । अत: संघीय शासन व्यवस्था में भी दूसरे सदन का अस्तित्व अनावश्यक प्रतीत होता है ।

10– कार्यपालिका से आप क्या समझते हैं? इसके विविध रूपों का वर्णन कीजिए ।
उत्तर — कार्यपालिका का अर्थ- सरकार का दूसरा महत्वपूर्ण अंग कार्यपालिका है । कार्यपालिका ही व्यवस्थापिका द्वारा पारित कानूनों को लागू करती है । तथा प्रशासन का संचालन करती है ।
(i) गार्नर ने कार्यपालिका का अर्थ स्पष्ट करते हुए लिखा है, “व्यापक एवं सामूहिक अर्थ में कार्यपालिका के अधीन वे सभी अधिकारी, राज-कर्मचारी तथा एजेन्सियाँ आ जाती है, जिनका कार्य राज्य की इच्छा को, जिसे व्यवस्थापिका ने व्यक्त कर कानून का रूप दे दिया है, कार्यरूप में परिणत करना है ।”
(ii) गिलक्राइस्ट के अनुसार, “कार्यपालिका सरकार का वह अंग है, जो कानून में निहित जनता की इच्छा को लागू करता है ।”
(iii) लीकॉक के अनुसार, “कार्यपालिका शब्द का प्रयोग सरकार के उन अधिकारियों के लिए किया जाता है, जिनका कार्य देश के कानून को क्रियान्वितत करना होता है ।”

कार्यपालिका के विविध रूप- कार्यपालिका के विविध रूप निम्नलिखित हैं—————–
(i) नाममात्र की तथा वास्तविक कार्यपालिका—- यह वर्गीकरण अधिकार क्षेत्र के आधार पर किया गया है । नाममात्र की कार्यपालिका अधिकारशून्य कार्यपालिका होती है । वह स्वविवेक से कुछ भी कार्य नहीं करती है, यद्यपि शासन से संबंधित समस्त कार्य उसी के नाम से किए जाते हैं । जैसे इंग्लैण्ड में सम्राट और भारत में राष्ट्रपति हैं । ये नाममात्र की कार्यपालिकाएँ हैं । वास्तविक कार्यपालिका द्वारा शासन की समस्त शक्ति का प्रयोग स्वयं किया जाता है । संसदात्मक शासन व्यवस्था में वास्तविक कार्यपालिका शक्तियाँ मन्त्रिपरिषद में निहित होती हैं, जो संसद के प्रतिउत्तरदायी होती है । यह व्यवस्था इंग्लैण्ड और भारत में भी है! जहाँ राजा और राष्ट्रपति नाममात्र के अध्यक्ष होते हैं । अध्यक्षात्मक पद्धति में दोनों प्रकार की शक्तियाँ राष्ट्रपति में निहित होती हैं, जैसे अमेरिका का राष्ट्रपति सिद्धान्त तथा व्यवहार दोनों में कार्यपालिका शक्तियों का प्रयोग करता है । अत: उसमें वास्तविक कार्यपालिका निहित है ।

(II) संसदीय तथा अध्यक्षात्मक कार्यपालिका अथवा उत्तरदायी एवं अनुत्तरदायी कार्यपालिका- विधायिका तथा कार्यपालिका के संबंधों के आधार पर इसे संसदीय तथा अध्यक्षात्मक कार्यपालिका के रूपों में बाँटा गया है । संसदीय कार्यपालिका में वास्तविक कार्यपालिका शक्तियाँ मन्त्रिपरिषद् में निहित होती हैं और वह संसद के प्रति उत्तरदायी होती है । उन देशों में एक संवैधानिक अध्यक्ष होता है, जो नाममात्र की शक्तियों का प्रयोग करता है । यह व्यवस्था इंग्लैण्ड, भारत, जापान आदि में है । अध्यक्षात्मक कार्यपालिका में व्यवस्थापिका और कार्यपालिका भिन्न-भिन्न होती हैं तथा कार्यपालिका व्यवस्थापिका के प्रति उत्तरदायी नहीं होती है । अमेरिका में इसी प्रकार की शासन व्यवस्था है ।
(III) एकल तथा बहुल कार्यपालिका- यदि कार्यपालिका की समस्त शक्तियाँ संवैधानिक तौर पर एक ही व्यक्ति में निहित होती हैं तो उसे एकल कार्यपालिका कहते हैं । इंग्लैण्ड, भारत तथा अमेरिका आदि देशों में एकल कार्यपालिका है । यदि कार्यपालिका की शक्तियाँ एक ही व्यक्ति में निहित न होकर कुछ व्यक्तियों की एक समिति में निहित होती हैं तो उसे बहुल कार्यपालिका कहते हैं । स्विट्जरलैण्ड की सात सदस्यों की संघीय परिषद् तथा पूर्व सोवियत संघ की 33 सदस्यों की प्रेसीडियम इसी प्रकार की कार्यपालिका के उदाहरण हैं । सात सदस्यों वाली संघीय परिषद् औपचारिक कार्यों को सम्पन्न करने के लिए अपने सदस्यों में से एक सदस्य को 1 वर्ष के लिए राष्ट्रपति निर्वाचित करती है ।
(iv) राजनीतिक और अराजनीतिक (स्थायी) कार्यपालिका- आधुनिक काल में जनता द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधि और प्रशिक्षित स्थायी नागरिक सेवक मिलकर कार्य करते हैं । इनमें प्रथम को राजनीतिक एवं दूसरे को अराजनीतिक कार्यपालिका कहते हैं । नागरिक सेवक प्रत्यक्ष रूप से राजनीतिक गतिविधियों में भाग नहीं लेते हैं । सरकार के आने-जाने का इन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है यह सरकार की नीतियों को बिना किसी आलोचना के लागू करने का प्रयास करते हैं । वंशानुगत और निर्वाचित कार्यपालिका- यदि राज्य का अध्यक्ष वंशानुगत ढंग से सत्ता प्राप्त करता है तो उसे वंशानुगत कार्यपालिका कहा जाता है वंशानुगत कार्यपालिका का उदाहरण ब्रिटेन तथा जापान है, और यदि जनता द्वारा प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से निर्वाचित किया जाता है तो उसे निर्वाचित कार्यपालिका कहा जाता है । निर्वाचित कार्यपालिका भारत, अमेरिका आदि अधिकांश देशों में है ।

11– एकल एवं बहुल कार्यपालिका पर टिप्पणी लिखिए ।
उत्तर — उत्तर के लिए विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या- 10 के उत्तर का अवलोकन कीजिए ।

12– कार्यपालिका क्या है? आधुनिक काल में इसके बढ़ते हुए महत्व के क्या कारण है?
उत्तर — कार्यपालिका- इसके लिए विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या- 10 के उत्तर का अवलोकन कीजिए ।
आधुनिक काल में कार्यपालिका के बढ़ते महत्व के कारण- कानून के निर्माण और सरकार की नीति-निर्धारण का कार्य व्यवस्थापिका (विधान-मंडल) द्वारा किया जाता है । व्यवस्थापिका द्वारा जो कानून निर्मित किये जाते हैं तथा जिन नीतियों का निर्धारण किया जाता है, उनके आधार पर ही कार्यपालिका शासन करती है तथा न्यायपालिका न्याय प्रदान करने का कार्य करती है । व्यवस्थापिका का निर्माण जनता के द्वारा होता है । अत: वह जन-प्रतिनिधित्व करती है, कानूनों का निर्माण करती है । तथा नीतियों का निर्धारण करती है । इस कारण जनतन्त्रीय व्यवस्था में व्यवस्थापिका का महत्वपूर्ण स्थान है, परन्तु देखा यह जा रहा है कि पिछले दशकों में व्यवस्थापिका की तुलना में कार्यपालिका के कार्यों और शक्तियों में वृद्धि हुई है । कार्यपालिका के बढ़ते हुए महत्व के कारण निम्नवत् हैं

(i) लोकसभा में बहुमत- कार्यपालिका (मन्त्रिपरिषद्) को लोकसभा में बहुमत दल का समर्थन प्राप्त होता है । अत: विधेयकों को अपनी इच्छानुसार पारित करा ले जाती है । कार्यपालिका को विधानमंडल के अधिकांश सदस्यों का समर्थन प्राप्त होने के कारण उसके अपदस्थ होने की आशंका नहीं रहती । अत: वह अपनी नीतियों को भली-भाँति क्रियान्वित करने में सफल हो जाती है और देश उसकी नीतियों पर ही चलता रहता है ।

(II)लोकसभा पर अंकुश- कार्यपालिका लोकसभा को कार्यकाल पूरा होने से पहले राष्ट्रपति द्वारा भंग करने में सक्षम है । लोकसभा यदि कार्यपालिका की नीतियों पर अनावश्यक तथा जनहित के विरुद्ध अवरोध डालने का प्रयत्न करती है, तो शासन कार्य में रुकावट पड़ने के साथ-साथ देश की जनता का अहित होने की आशंका भी उत्पन्न हो जाती है । इस स्थिति से निबटने के लिए कार्यपालिका को अधिकार है कि वह राष्ट्रपति से लोकसभा भंग करने की सिफारिश कर उसे भंग करा दे । इस अधिकार के कारण कार्यपालिका की शक्ति में वृद्धि हो जाती है ।

(iii) कानून-निर्माण- कार्यपालिका कानून निर्माण की आधारशिला है । कार्यपालिका विधेयकों को तैयार कराके उन्हें विधानमंडल में प्रस्तुत कराती है और बहुमत के आधार पर उन्हें पारित भी करा ले जाती है । संसद में वे ही विधेयक प्राय: पारित होते हैं जो मन्त्रियों द्वारा प्रस्तावित होते हैं । निर्दलीय सांसदों के विधेयक उसी समय पारित हो सकते हैं जब उन्हें मन्त्रिपरिषद् का सहयोग एवं सक्रिय समर्थन प्राप्त हो जाए । इस प्रकार कार्यपालिका विधानमंडल पर छाई रहती है ।

(iv) मन्त्रिपरिषद् की न्यायिक शक्ति——- कार्यपालिका सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायधीश के तथा अन्य न्यायाधीशों की नियुक्तियाँ करती है । कार्यपालिका की इस न्यायिक शक्ति के कारण भी कार्यपालिका का महत्व बढ़ जाता है । साधारण योग्यता के व्यक्तियों का चुनाव-विधानमंडल (व्यवस्थपिका) के सदस्य प्रत्यक्ष निर्वाचन के आधार पर चुने जाते हैं । विशेष प्रतिभाशाली व्यक्ति चुनावों के झंझट में नहीं पड़ना चाहते हैं । प्रायः पेशेवर राजनीतिज्ञ व्यवस्थापिका में चुने जाते हैं । ऐसे व्यक्ति अपने कार्यों, आचरण तथा कम योग्यता से व्यवस्थापिका की गरिमा कम कर देते हैं । वे कानूनों की पेचीदगी को समझने में असमर्थ होते हैं । अत: विधानमंडल में वे मूक दर्शक बने रहते हैं और मन्त्रियों के रुख को परखकर ही वे मतदान करते रहते हैं ।

(vi) लोक-कल्याणकारी राज्य———– वर्तमान काल में राज्यों ने लोक-कल्याणकारी राज्य का चोला पहन रखा है । अत: राज्य के कार्य बहुत अधिक बढ़ जाने से विधानमंडल की शक्ति कम हो गयी है और कार्यपालिका का महत्व बढ़ जाने से उसकी शक्तियाँ भी बढ़ गयी है । आधुनिक समस्याओं की जटिलता- वर्तमान काल में राज्य को अत्यधिक जटिल समस्याओं का सामना करना पड़ता है । इन समस्याओं को हल करने के लिए जिस विशेष ज्ञान, अनुभव और योग्यता की आवश्यकता होती हैं, वह कार्यपालिका के सदस्यों में ही होती है । व्यवस्थापिका (विधानमंडल) के सामान्य योग्यता वाले सदस्य इन समस्याओं को सुलझाने में अपने आपको असमर्थ पाते हैं ।

(viii) नियोजन———— वर्तमान काल में अधिकांश प्रगतिशील देशों में आर्थिक विकास के लिए नियोजन को अपनाया जा रहा है । अत: योजनाएँ बनाने तथा उन्हें कार्यरूप में परिणित करने का कार्य कार्यपालिका के द्वारा ही किया जाता है । निष्कर्ष- संसदीय व्यवस्था में मन्त्रिपरिषद का निर्माण विधानमंडल में से ही होता है किन्तु व्यवहार में दलीय अनुशासन के कारण मन्त्रिपरिषद् विधानमंडल पर हावी हो जाता है । मन्त्रिपरिषद् द्वारा विधानमंडल को विघटित करने की शक्ति के कारण कार्यपालिका की शक्ति और अधिकार पिछले दशकों में काफी बढ़ गये है और विधानमंडल की शक्तियाँ तथा अधिकारों में ह्रास होने लगा है ।

13– संसदीय व्यवस्था में कार्यपालिका और व्यवस्थापिका के मध्य उचित संबंधों की विवेचना कीजिए ।
उत्तर — उत्तर के लिए विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या-5 के उत्तर का अवलोकन कीजिए ।

14– कार्यपालिका के प्रमुख कार्यों का वर्णन कीजिए ।
उत्तर — कार्यपालिका के कार्य- राज्य के कार्यों के संबंध में वर्तमान समय में व्यक्तिवादी विचारधारा को त्यागकर जनकल्याणकारी राज्य के विचार को अपना लिया गया है । जनकल्याणकारी राज्य की विचारधारा का स्वाभाविक परिणाम यह हुआ कि राज्य के कार्यों में वृद्धि हुई ।

“राज्य के कार्यों में प्रत्येक वृद्धि ने कार्यपालिका के कार्यों और शक्ति में वृद्धि की है ।”……………… –लिप्सन

कार्यपालिका के प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं
(i) सैनिक कार्य-कार्यपालिका का प्रथम कार्य देश की सुरक्षा करना है । यह बाहरी आक्रमणों से देश की सुरक्षा करती है । जल, थल तथा वायु सेना का संगठन और नियंत्रण करती है तथा युद्ध और शान्ति की भी घोषण करती है ।
कैण्ट के शब्दों में, “सैन्य बल का नियंत्रण एवं प्रयोग ,शान्ति की स्थापना, बाहरी आक्रमण से रक्षा स्वभावत: कार्यपालिका संबंधी कार्य हैं ।”


(II) प्रशासनिक कार्य-कार्यपालिका का सर्वप्रथम कार्य देश की सुरक्षा, आन्तरिक शान्ति तथा व्यवस्था को बनाए रखना और देश के प्रशासन की व्यवस्था सुचारु रूप से संचालित करना है । इसके लिए कार्यपालिका व्यवस्थापिका द्वारा पारित कानूनों को लाग करती है । कार्यपालिका प्रशासनिक विभागों की स्थापना, कर्मचारियों की नियुक्ति, अधिकार तथा कार्य की व्यवस्था, नियुक्तियाँ तथा विभागों का संचालन करती है । शिक्षा तथा समाज कल्याण के कार्य भी कार्यपालिका द्वारा संचालित किए जाते हैं ।

(III)कानून बनाने संबंधी कार्य- प्रत्येक देश की कार्यपालिका किसी-न-किसी रूप में कानून बनाने की प्रक्रिया में भी भाग लेती है । कार्यपालिका द्वारा ही संसद का अधिवेशन बुलाया जाता है तथा स्थगित व समाप्त किया जाता है । संसदीय शासन में कानून बनाने की प्रक्रिया में मन्त्रिमण्डल की पूर्ण सहभागिता होती है । कार्यपालिका का प्रमुख संसद के प्रथम अधिवेशन में दोनों सदनों को सामूहिक रूप से सम्बोधित करता है । अध्यक्षात्मक शासन-प्रणाली में राष्ट्रपति सन्देश भेजकर या अपने दल के माध्यम से कानून बनाने के कार्य को प्रभावित करता है । संसद द्वारा पारित विधेयकों पर कार्यपालिका स्वीकृति प्रदान करती है । साथ ही संसद के अधिवेशन न होने की स्थिति में कार्यपालिका को अध्यादेश जारी करने का भी अधिकार प्राप्त होता है, जो कानून के समान ही महत्व रखते हैं ।

(iv) कूटनीतिक कार्य- कार्यपालिका विभिन्न राष्ट्रों से राजनीतिक संबंध स्थापित करती है तथा अन्तर्राष्ट्रीय संबंधों का संचालन करती है और युद्ध, शान्ति, सन्धि-समझौता, विदेश नीति, अन्य देशों से संबंध, दूतावासों की स्थापना, राजदूतों की नियुक्ति आदि करती है । विदेशों के साथ राजनीतिक, सैनिक, आर्थिक तथा व्यापारिक सभी प्रकार के समझौते कार्यपालिका सम्पन्न करती है ।
(V) न्यायिक कार्य- कार्यपालिका के न्यायिक कार्यों में न्यायाधीशों की नियुक्ति, क्षमादान तथा दण्ड स्थगित करने व कम करने के कार्य आते हैं ।
(VI)वित्तीय कार्य————– कार्यपालिका बजट का निर्माण करती है तथा उसे अनुमोदन के लिए व्यवस्थापिका के समक्ष प्रस्तुत करती है । वह आय-व्यय का निरीक्षण भी करती है बजट को लागू करती है तथा लेखांकन व लेखा-परीक्षण का कार्य भी सम्पन्न करती हैं ।

(vii) अन्य कार्य————- इसके अतिरिक्त कार्यपालिका के कुछ अन्य कार्य भी हैं । उपाधियों तथा सम्मान का वितरण करना, विशिष्ट सेवाओं के लिए पुरस्कार प्रदान करना, लोक-हितकारी कार्य करना तथा समस्त राजकीय कार्यों का प्रबन्ध करना कार्यपालिका के कार्यों के अधीन आते हैं । वर्तमान में राज्य के बढ़ते कार्य-क्षेत्र से कार्यपालिका के कार्य भी निरन्तर बढ़ते जा रहे हैं । “राज्य के कार्यों की प्रत्येक वृद्धि ने कार्यपालिका के कार्यों और शक्ति में वृद्धि की है ।” …………….-लिप्सन

15– न्यायपालिका के कार्य एवं महत्व पर प्रकाश डालिए ।
उत्तर — न्यायपालिका के प्रमुख कार्य—
(i) संविधान की सुरक्षा—- उच्चतम न्यायालय संविधान का रक्षक है । )वह संसद के कानूनों तथा शासक वर्ग के नियमों को यदि वे संविधान के विरुद्ध हों, असंवैधानिक घोषित करता है । भारत और अमेरिका में उच्चतम न्यायालय को संविधान की सुरक्षा के लिए पूरी शक्ति प्रदान कर गई हैं ।
(II) संघात्मक व्यवस्था क रक्षक —- संघ क गठन कई स्वतंत्र इकाइयों के गठन से होता है शासन की शक्तियों को संघीय सर्कार तथा इकाइयों में विभक्त किया जाता है कभी कभी संघीय इकाइयों में पारस्परिक संघर्ष तथा इकाइयों के केंद्र में संघर्ष हो जाता है in विवादों को निपटाने के लिए उच्चतम न्यायालय अनिवार्य है |
(iii) न्याय करना ——– आज अधिकांश अपराध राज्य के परत दोष मने जाते है |अतः अभियोगों क निर्णय और न्याय करना न्यायलय का कार्य है यह देश के कानूनों के आधार पर फौजदारी और दीवानी मुकदमों को सुनवाई कलरके निर्णय देता है जो सभी राष्ट्र का प्रथम कर्तव्य है |

(iv) कानूनों की व्याख्या करना———- विभिन्न मामलों में कानूनों की व्याख्या करना तथा उनका अर्थ स्पष्ट करना न्यायपालिका का कार्य है । इन व्याख्याओं को कानूनों के समान ही समझा जाता है ।
(v) अधिकारों का पोषक- न्यायालय नागरिकों के अधिकारों के रक्षक हैं । ये अधिकार नाममात्र के रह जाते हैं, यदि इनकी सुरक्षा न हों । “न्यायाधिकारी वर्ग का होना अत्यन्त आवश्यक है, जिससे वह लोगों के अधिकारों की रक्षा करे और शांति स्थापना के लिए उन लोगों को दंड दे, जो भोले-भाले लोगों पर अत्याचार करते हैं तथा शोषण में लीन है ।”………….-सले
भारत और अमेरिका के उच्चतम न्यायालय नागरिकों के अधिकारों के रक्षक हैं ।
(VI )कानून बनाना- न्यायपालिका कानून की व्याख्याता मात्र नहीं, बल्कि कानून बनाने वाली भी है । अस्पष्ट उपबन्धों की कानूनी व्याख्या कर वह वास्तविक आशय को स्पष्ट कर देती है । उसकी यह व्यवस्था कभी-कभी कानून का विस्तार भी कर देती है तथा भविष्य के लिए दृष्टान्त भी बन जाती है । जहाँ कानून मौन है, वहाँ न्यायाधीश स्वविवेक से निर्णय देता है । न्यायालय के निर्णय अप्रत्यक्ष रूप से कानून बन जाते हैं ।

“न्यायाधीश कानून के निर्माता भी है और व्याख्याकार भी ।”…….-डॉ० गिलक्राइस्ट
“न्यायाधीश कानून बनाने का काम करते हैं और उन्हें ऐसा करना भी चाहिए ।’………-राज

(vii) परामर्श संबंधी कार्य- न्यायाधीशों को परामर्श संबंधी कार्य भी करने होते हैं । भारत के राष्ट्रपति को सार्वजनिक दृष्टि से महत्वपूर्ण विषयों में कानूनी परामर्श उच्चतम न्यायालय से लेने का अधिकार प्राप्त है । कनाडा के गर्वनर जनरल तथा अमेरिका के कुछ राज्यों में भी न्यायालयों को यह अधिकार प्रदान किया गया है ।

(viii) प्रशासनिक कार्य- न्यायालय अपने कर्मचारियों की नियुक्ति करते हैं, न्यायालय की कार्यवाही से संबंधित प्रक्रिया का निर्धारण करते हैं और उन्हें छोटे-छोटे नियमों को लागू करने का अधिकार है ।

(ix) अन्य कार्य- इसके अतिरिक्त न्यायपालिका को अन्य अधिकार भी प्राप्त हैं जैसे- प्रतिबन्धात्मक आदेश, लेख जारी करना, अपने सम्मान की सुरक्षा, अपने कार्य-संचालन के लिए नियमों का निर्माण, प्रबन्धकर्ता नियुक्त करना, निर्धारित जाँच करना इत्यादि ।

न्यायपालिका का महत्व————- कानून की व्याख्या न्यायपालिका द्वारा की जाती है, अत: यह सरकार का ही महत्वपूर्ण अंग होता है तथा कानून भंग करने वालों को दण्ड देता है । इसलिए शासन संगठन को बनाए रखने के लिए न्याय विभाग अत्यधिक अनिवार्य है ।

“विधानमण्डल की अनुपस्थिति में जो एक समाज की कल्पना की जा सकती है, किन्तु न्यायपालिका के अभाव में एक सभ्य राज्य की कल्पना नहीं की जा सकती है । किसी शासन की सर्वश्रेष्ठता की कसौटी उसके न्याय विभाग की कुशलता है ।”……………-लार्ड ब्राइस
“सरकार के जितने भी मुख्य कार्य हैं, उनमें निःसन्देह न्याय सबसे महत्वपूर्ण है ।”…………………..-मैरियट

कार्यपालिका तथा विधायिका दोनों ही न्यायपालिका द्वारा मर्यादित किए जाते हैं । उच्चतम न्यायलय कुछ प्रलेखों और विधियों के सहयोग से शासन को सभी स्तरों पर स्थायित्व प्रदान करता है । एक निष्पक्ष तथा स्वतंत्र न्याय-विभाग या न्यायपालिका के बिना किसी सभ्य शासन की कल्पना नहीं की जा सकती है ।
‘क्योंकि न्यायपालिका जनता के अधिकारों व स्वतंत्रता की रक्षक होती है । यदि न्याय की समुचित व्यवस्था नहीं होगी तो नागरिकों की स्वतंत्रता खतरे में पड़ जाएगी ।’ ………….ब्राइस
“सरकार के जितने भी महत्वपूर्ण कार्य हैं उनमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण कार्य न्याय संबंधी है, जिसका संबंध न्याय से हैं ।” ……..मैरियट
-न्यायपालिका राज्य के प्रचलित कानूनों की व्याख्या करती है और यदि कोई व्यक्ति किसी कानून का उल्लंघन करता है तो उस पर विचार करके उस व्यक्ति को उचित दण्ड देती है । प्रत्येक देश में न्यायपालिका कानून और नागरिक अधिकारों की रक्षक होती है । जिन देशों में लिखित एवं अपरिवर्तनशील संविधान है वहाँ पर वह संविधान की संरक्षिका होती है । यदि संसद कोई ऐसा कानून बनाती है जो संविधान के विरुद्ध हो तो न्यायपालिका उसे अवैधानिक घोषित करके उसे रद्द क्र सकती है

17– न्यायपालिका की स्वतंत्रता क्यों आवश्यक है? इसकी स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए क्या उपाय किए जाने चाहिए? उत्तर — न्यायपालिका की स्वतंत्रता- वर्तमान प्रजातांत्रिक युग में स्वतंत्र न्यायपालिका की आवश्यकता को अत्यन्त महत्व दिया गया है । स्वतंत्र न्यायपालिका से तात्पर्य है कि यह व्यवस्थापिका तथा कार्यपालिका के नियंत्रण से स्वतंत्र रहकर नागरिकों के आर्थिक तथा सामाजिक जीवन की रक्षा करने में समर्थ हो । न्यायाधीशों के कार्यकाल, वेतन तथा उनके कार्य की दशाओं पर कोई ऐसा नियंत्रण नहीं होना चाहिए जिससे निष्पक्ष न्याय के मार्ग में किसी प्रकार की बाधा पड़े । यदि न्यायपालिका स्वतंत्र नहीं होगी और उस पर कार्यपालिका अथवा व्यवस्थापिका का अनावश्यक अंकुश होगा तो यह आशा करना कि नागरिकों की स्वतंत्रता तथा अधिकारों की रक्षा हो सकेगी, मात्र भ्रम ही होगा । स्वतंत्र न्यायपालिका के महत्व को डॉ० गार्नर ने निम्नवत् स्पष्ट किया है, “यदि न्यायाधीशों में प्रतिभा, सत्यता और निर्णय देने की स्वतंत्रता न हो तो न्यायपालिका का वह सारा ढाँचा खोखला प्रतीत होगा और उस उद्देश्य की प्राप्ति न हो सकेगी जिसके लिए उसका निर्माण किया गया है ।” स्पष्ट है कि न्यायाधीशों की नियुक्ति, उनके कार्यकाल, वेतन तथा पद की सुरक्षा पर जब शासन के अन्य किसी भी अंग का अंकुश नहीं होता है तो उसे स्वतंत्र न्यायपालिका की संज्ञा दी जाती है । न्यायपालिका की स्वतंत्रता को बनाए रखने के उपाय- न्यायपालिका की स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए निम्न उपाय अपनाये चाहिए

(i) पर्याप्त वेतन———– ब्राइस का कथन है कि न्यायाधीश की पवित्रता और योग्यता, ईमानदारी और स्वतंत्रता उसके पद की सम्भावित उन्नति एवं आकर्षणों पर निर्भर करती है । कम वेतन पाने वाला न्यायाधीश अवश्य ही अनैतिक साधनों की ओर आकर्षित होगा । योग्य और ईमानदार व्यक्ति कभी भी कम वेतन पर कार्य करने के लिए तैयार नहीं होगा । ऐसी स्थिति में न केवल न्यायाधीश के मन में पद के प्रति आस्था बनी रहेगी– अपित योग्य व्यक्ति भी इस क्षेत्र की ओर आकर्षित होंगे । साथ ही यह व्यवस्था भी होनी चाहिए कि कार्यकाल के मध्य में वेतन तथा सेवा-शर्तों में कोई कटोती न की जाए ।


(ii) कानून की उच्च योग्यता आवश्यक———–उच्चतम योग्यता वाला न्यायाधीश ही अपने विचार स्वतंत्रतापूर्वक प्रकट करने की क्षमता रखता है । अयोग्य न्यायाधीश सदैव योग्य अधिवक्ताओं की कठपुतली बन जाता है । वह अपनी स्वतंत्रता भी बनाए रखने में असमर्थ हो जाता है क्योंकि बाहरी प्रभाव उस पर हावी होने लगते है । भारत में उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश वही बन सकता है, जो पाँच वर्ष उच्च न्यायालय में न्यायाधीश के पद पर कार्य कर चुका हो या दस वर्ष तक उच्च या उच्चतम न्यायालय में एडवोकेट रहा हो या वह देश का ख्यातिप्राप्त न्यायवेत्ता या विधिशास्त्र का ज्ञाता हो । अमेरिका में यद्यपि संघीय न्यायाधीशों की योग्यता सीमांकित नहीं है, फिर भी उन्हें न्याय व कानून का पूर्ण ज्ञान अवश्य होना चाहिए ।


(III) निष्पक्ष तथा योग्य न्यायाधीशों की नियुक्ति——
—-न्यायपालिका की स्वतंत्रता के लिए यह आवश्यक है कि न्यायाधीशों की नियुक्ति इस प्रकार की जाए कि वे अपनी स्वतंत्रता को बनाए रख सकें, साथ ही योग्य व्यक्तियों की नियुक्ति हो सके । स्विट्जरलैण्ड के कुछ कैण्टनों तथा अमेरिका के कुछ राज्यों में न्यायाधीशों को प्रत्यक्ष रूप से जनता चुनती है । इससे योग्य व्यक्ति न्यायाधीश नहीं बन पाते हैं ओर चयनित न्यायाधीश राजनीतिक दलबन्दी का शिकार हो जाते हैं । यह प्रणाली काफी समय तक अमेरिका के राज्यों में भी प्रचलित रही । इससे न्यायाधीश का पद राजनीतिक हो जाता है तथा न्यायाधीश व्यवस्थापिका के हाथों की कठपुतली बन जाते हैं ।

  "यदि व्यवस्थापिका न्यायाधीशों को निर्वाचित करेगी तो न्यायपालिका में प्रशासन की प्राप्ति और उस साध्य की पूर्ति के लिए ऐसे विभिन्न अवसर और प्रलोभन उपस्थित होंगे, जब षड्यंत्र, दलीय गर्व और केवल स्थानीय हित की भावना का ही बोलबाला रहेगा ।" ..................-कैण्ट 

इस तरह दोनों पद्धतियों के गलत होने पर एक ही पद्धति शेष रह जाती है- कार्यपालिका द्वारा नियुक्ति । विश्व के लगभग सभी देशों में उच्च तथा सर्वोच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति कार्यपालिका का अध्यक्ष करता है । यह पद्धति अन्य पद्धतियों की तुलना में श्रेष्ठ हैं । इस पद्धति से न्यायपालिका स्वतंत्र रह सकती है ।
(iv) कार्यकाल की सुरक्षा- पदावधि की सुरक्षा न्यायपालिका की स्वतंत्रता को बनाए रखने की आवश्यक शर्त है । यह ठीक है कि ईमानदारी और सदाचार उसकी पदावधि की सुरक्षा करते हैं । यह तभी सम्भव हो सकता है, जबकि न्यायाधीश को पद से हटाने की प्रक्रिया जटिल हो । इंग्लैण्ड में न्यायाधीश को पद से तभी हटाया जा सकता है, जब संसद प्रस्ताव पारित कर राजा से प्रार्थना करे । भारत में कदाचार या असमर्थता के आधार पर संसद के साधारण बहुमत द्वारा और उपस्थित व मत देने वाले सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत द्वारा समर्थित प्रस्ताव पारित होने पर न्यायाधीश को पद से हटाया जा सकता है, इसलिए ईमानदार तथा सदाचारी न्यायाधीश स्वतंत्रतापूर्वक अपने पद पर कार्य करते रहते हैं ।

(v) न्यायपालिका का कार्यपालिका तथा व्यवस्थापिका से पृथक्करण-——- न्यायपालिका की स्वतंत्रता के लिए यह आवश्यक है कि उसे कार्यपालिका तथा व्यवस्थापिका से पृथक रखा जाए । यदि कार्यपालिका और न्यायपालिका शक्तियों को किसी भी स्तर पर मिलने देगे, तो निरंकुशता का भय व्याप्त हो जाएगा तथा स्वतंत्रता खतरे में पड़ जाएगी । इसी कारण भारत के संविधान के नीति-निदेशक तत्वों में स्पष्ट कर दिया गया है कि न्यायपालिका तथा कार्यपालिका का पृथक्करण किया जाएगा । इसी भावना की पूर्ति के लिए सभी राज्यों में कार्यपालिका तथा न्यायपालिका के अधिकारी पृथक-पृथक किए गए हैं । अमेरिका में सर्वोच्च न्यायलय को राष्ट्रपति की शक्तियों से बाहर रखने का पूरा प्रयत्न किया गया है । न्यायपालिका पर विधायिका का नियंत्रण अथवा हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए अन्यथा न्यायाधीश स्वतंत्र व निष्पक्ष रूप से न्याय नहीं कर सकेंगे ।


(vi) लम्बी पदावधि या कार्यकाल——–न्यायपालिका की स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए यह भी आवश्यक है कि न्यायाधीशों की नियुक्ति लम्बे समय के लिए की जाए । अल्पावधि होने पर वे पुन: पद प्राप्त करने का प्रयत्न करेंगे और उनके प्रभावित होने के अवसर बढ़ जाएँगे । न्यायाधीश को तब तक अपने पद पर बने रहने देना चाहिए जब तक कि वह अपनी प्रतिष्ठा तथा ईमानदारी का प्रमाण देता रहे । ऐसा न्यायाधीश, जो सदाचार और ईमानदारी का प्रमाण देता हुआ दीर्घकाल तक पद पर रहता है, लोकहितकारी राज्य के लिए आवश्यक है । ऐसा न्यायाधीश स्वतंत्र रूप से कार्य करता रहता है और उसे अपनी पदावधि का भय नहीं रहता । अमेरिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति सदाचार के आधार पर आजीवन होती है । भारत में उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश की सेवानिवृत्ति की आयु 65 वर्ष है । न्यायपालिका की स्वतंत्रता का संक्षेप में विवेचन विलोबी के इन शब्दों में किया जा सकता है- “न्यायाधीशों की नियुक्ति किसी दलीय वचनबद्धता के आधार पर नहीं होनी चाहिए । एक बार नियुक्त हो जाने के बाद उनकी पदावधि जीवनपर्यन्त या सदाचार पर्यन्त होनी चाहिए । वे पदच्युति के संबंध में कार्यपालिका के अधीन नहीं होने चाहिए । उन्हें दुराचारी होने पर अभियोग द्वारा अथवा विधानमण्डल के दोनों सदनों द्वारा प्रस्तुत निवेदन पर ही हटाया जाना चाहिए । उनके सेवाकाल में उनके वेतन को न तो रोका जाना चाहिए और न ही कम किया जाना चाहिए ।

18– आधुनिक लोकतंत्र में न्यायपालिका के कार्य तथा महत्व समझाइए ।
उत्तर — उत्तर के लिए विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या-15 के उत्तर का अवलोकन कीजिए ।

19– स्वतंत्र न्यायपालिका क्या है? न्यायपालिका की स्वतंत्रता सुरक्षित करने के लिए कौन-कौन से उपाय किए जाते हैं?
उत्तर — उत्तर के लिए विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या-17 के उत्तर का अवलोकन कीजिए ।

20– कार्यपालिका, व्यवस्थापिका एवं न्यायपालिका के पारस्परिक संबंधों की विवेचना कीजिए ।
उत्तर — व्यवस्थापिका और कार्यपालिका में संबंध- इसके लिए विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या-5 के उत्तर का अवलोकन कीजिए ।
व्यवस्थापिका और न्यायपालिका में संबंध—— व्यवस्थापिका और न्यायपालिका सरकार के दो प्रमुख अंग हैं । इनका पारस्परिक संबंध निम्नलिखित तथ्यों से स्पष्ट किया जा सकता है
(i) न्यायपालिका व्यवस्थापिका द्वारा बनाए गए कानूनों की व्याख्या कर सकती है, किन्तु उनमें संशोधन नहीं कर सकती है ।
(ii) न्यायपालिका व्यवस्थापिका के ऐसे किसी भी कानून को अवैधानिक घोषित कर सकती है, जो संविधान के अनुच्छेदों की भावनाओं का पालन न करता हो ।
(iii) व्यवस्थापिका न्यायपालिका के निर्णयों का न तो विरोध कर सकती है और न ही वाद-विवाद कर सकती है । भारत में ऐसे अनेक उदाहरण विद्यमान है, जैसे- शाहबानो का मामला, दिल्ली में सीलिंग का मामला आदि ।
(iv) व्यवस्थापिका कदाचार या भ्रष्टाचार के आरोप के आधार पर न्यायाधीशों की पदच्युति का प्रस्ताव पारित कर सकती है, लेकिन उन्हें दण्डित करने का अधिकार उसे प्राप्त नहीं है ।
(v) न्यायपालिका व्यवस्थापिका द्वारा पारित कानूनों के अनुसार ही निर्णय देती है, किन्तु कभी-कभी न्यायपालिका को स्वविवेक से भी निर्णय देना पड़ता है ।


कार्यपालिका और न्यायपालिका में संबंध———- लोकतंत्र की सफलता के लिए कार्यपालिका और न्यायपालिका को एक-दूसरे से पृथक रहना आवश्यक माना जाता है, किन्तु व्यवहार में इनका पारस्परिक संबंध घनिष्ठ होता है, क्योंकि न्यायाधीशों की नियुक्ति का अधिकार कार्यपालिका के हाथ में ही होता है । इन दोनों का संबंध निम्नलिखित रूपों में स्पष्ट किया जा सकता है
(i) कार्यपालिका व्यवस्थापिका द्वारा बनाए गए कानूनों को लागू करती है और न्यायपालिका कानूनों का उल्लंघन करने वालों को दण्डित करती है तथा शक्ति का अतिक्रमण करने से कार्यपालिका को रोकती है ।
(ii) न्यायपालिका के दण्डात्मक निर्णयों का कार्यान्वयन कार्यपालिका ही करती है ।
(iii) न्यायाधीशों की नियुक्ति कार्यपालिका के प्रधान द्वारा ही की जाती है ।
(iv) न्यायपालिका के निर्णयों की आलोचना करने का अधिकार कार्यपालिका को नहीं है ।
(v) न्यायपालिका कार्यपालिका के भ्रष्ट कर्मचारियों को भी दण्डित करने का अधिकार रखती है तथा कर्त्तव्यविमुख होने की अवस्था में किसी भी विभाग के विभागाध्यक्ष से आख्या मांग सकती है तथा तत्संबंधित आदेश दे सकती है ।

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