Up board class 12th civics solution chapter 18 Local Self Government स्थानीय स्वशासन

Up board class 12th civics solution chapter 18 Local Self Government स्थानीय स्वशासन

UP Board Solutions for Class 12 Civics Chapter 1 Principles of Origin of State
पाठ-18 स्थानीय स्वशासन (Local Self Government)


लघु उत्तरीय प्रश्न


1– स्थानीय स्वशासन से आप क्या समझते हैं? इस प्रदेश में स्थानीय स्वशासन की कौन-सी संस्थाएँकार्य कर रही हैं? उत्तर— स्थानीय स्वशासन का अर्थ ऐसी शासन-व्यवस्था से है जिसमें स्थानीय संस्थाओं द्वारा स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप विभिन्न समस्याओं के निराकरण का प्रयास किया जाता है । लॉर्ड ब्राइस ने उचित ही लिखा है- “स्थानीय स्वशासन प्रजातन्त्र का सर्वश्रेष्ठ विद्यालय है । ‘ स्थानीय स्वशासन में पंचायती राज की संस्थाओं ग्राम पंचायत, क्षेत्र पंचायत, जिला पंचायत, नगर पंचायत, नगर परिषद् तथा नगर निगमों आदि को सम्मानित किया जाता है । भारत की लोकतान्त्रिक व्यवस्था केवल केन्द्र तथा राज्य सरकारों तक ही सीमित नहीं है बल्कि विस्तार स्थानीय स्तर पर भी किया गया है ।

2– स्थानीय स्वशासन का महत्व बताइए ।
उत्तर— स्थानीय स्वशासन लोकतंत्र का आधार है । यह लोकतांत्रिक विकेन्द्रीकरण की प्रक्रिया पर आधारित है । यदि प्रशासन को जागरूक तथा अधिक कार्यकुशल बनाना है तो उसका प्रबन्धन एवं संचालन स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप स्थानीय संस्थाओं द्वारा ही संचालित होना चाहिए । स्थानीय स्वशासन के महत्व निम्नलिखित हैं
(i) लोकतांत्रिक परम्पराओं को लागू करने में सहायक
(ii) भावी नेतृत्व का निर्माण
(iii) जनता और सरकार के पारस्परिक संबंध
(iv) स्थानीय समाज और राजनीतिक व्यवस्था के बीच की कड़ी
(v) लोकतांत्रिक परम्पराओं के अनुरूप
(vi) नागरिकों को निरन्तर जागरूक बनाए रखने में सहायक
(vii) प्रशासनिक अधिकारियों की जागरूकता
(viii) नोकरशाही की बुराईयों की समाप्ति ।

3– ग्रामपंचायत के कोई दो अनिवार्य कार्य लिखिए ।
उत्तर— ग्राम पंचायत के दो अनिवार्य कार्य निम्नलिखित हैं
(i) व्यवसाय संबंधी कार्य- इन कार्यों के अन्तर्गत निम्नलिखित कार्य आते हैं
(क) पुस्कालयों एवं वाचनालयों की व्यवस्था करना, (ख) पार्क बनवाना, (ग) अस्पताल खुलवाना, (घ) गृह-उद्योगों को उन्नत करने के प्रयत्न करना, (ङ) सहकारी समितियों का गठन करना, (च) स्वयंसेवक का दल का संगठन करना, (छ) पशुओं की नस्ल सुधारना, (ज) अकाल या अन्य आपदा के समय गाँववालों की सहायता करना, (झ) सड़कों के किनारे छायादार वृक्ष लगवाना आदि, (ण) सहकारी ऋण प्राप्त करने में किसानों की सहायता करना ।

(ii) न्याय संबंधी कार्य- इन कार्यों के अन्तर्गत ग्राम पंचायत के कुछ सदस्य न्याय पंचायत के रूप में कार्य करते हुए अपने गाँव के छोटे-छोटे झगड़ों का निपटारा भी करते हैं तथा फौजदारी के मुकदमों में इसे ₹ 250 तक का जुर्माना करने का अधिकार प्राप्त है । दीवानी के मामलों में यह ₹ 500 के मूल्य तक ही सम्पत्ति के मामलों की सुनवाई कर सकते हैं । तथा देश के चार राज्यों राजस्थान, हरियाणा, मध्य प्रदेश तथा महाराष्ट्र में ग्राम न्यायालयों का गठन हुआ है । यह पंचायती राज व्यवस्था के परिप्रेक्ष्य में जिला स्तरीय प्रशासन में एक क्रान्तिकारी निर्णय होगा ।

4– ग्रामपंचायत के दो महत्वपूर्ण कार्य लिखिए ।
उत्तर— इसके लिए लघु उत्तरीय प्रश्न संख्या-3 के उत्तर का अवलोकन कीजिए ।
5 ग्राम पंचायत का महत्व बताइए ।
उत्तर— ग्राम पंचायत का महत्व- आज के प्रजातांत्रिक शासन व्यवस्था के युग में पंचायतों का बहुत महत्व है । ये संस्थाएँ जनता को जनतंत्र की शिक्षा प्रदान करती है । नागरिक गुणों के विकास के लिए ग्राम पंचायतें प्रारम्भिक पाठशालाओं का काम करती है ।
और जनता में अपने अधिकारों व स्वतंत्रता की भावना को जाग्रत करने में सहायक होती है । ये जनता में सहज बुद्धि, न्यायशीलता, निर्णय-शक्ति और सामाजिकता का भी विकास करती हैं । ग्राम पंचायत स्थानीय स्तर की समस्याओं का समाधान समुचित रूप से कर लेती हैं । शिक्षा, स्वास्थ्य, सफाई तथा मार्गों का निर्माण कराकर ये संस्थाएँ जनहित के कार्यों में संलग्न रहती है । गाँवों के आर्थिक विकास में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका है । वस्तुतः ग्राम पंचायतें ग्राम सभाओं की कार्यकारिणी के रूप में कार्य करती है ।

6 जिला पंचायत का महत्व लिखिए ।
उत्तर— जिला पंचायत द्वारा जिले के संपूर्ण ग्रामीण क्षेत्र का प्रबंध किया जाता है । जिला पंचायत के कार्य बहुत ही व्यापक तथा विस्तृत हैं ।
जिला पंचायत मानव जीवन की अधिकांश आवश्यकताओं की पूर्ति स्थानीय स्तर पर करती है । जिले में जल एवं विद्युत की सुविधा, बस चलवाना, समाज-सुधार का कार्य करना, नई सड़कें बनाना, शिक्षा के विकास के कार्य करना तथा ग्रामवासियों के लिए मनोरंजन के साधन जुटाना और संकट के समय में गाँवों को अनुदान देना आदि के लिए जिला पंचायत का विशेष महत्व है ।

7– नगर पंचायत के चार प्रमुख कार्यों की विवेचना कीजिए ।
उत्तर— नगर पंचायत के चार प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं
() पर्यावरण की रक्षा (ii) शुद्ध एवं स्वच्छ पेयजल की आपूर्ति । । (iii) सार्वजनिक सड़कों, स्थानों व नालियों की सफाई तथा रोशनी का प्रबन्ध (iv) प्रसूति केंद्रों एवं शिशु गृहों की व्यवस्था ।

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न


1– भारत में स्थानीय स्वशासन काअर्थ, आवश्यकता तथा उसके महत्व का वर्णन कीजिए ।
उत्तर— स्थानीय स्वशासन का अर्थ- इसके लिए लघु उत्तरीय प्रश्न संख्या-1 के उत्तर का अवलोकन कीजिए ।
स्थानीय स्वशासन की आवश्यकता- भारत में स्थानीय स्वशासन की आवश्यकता के निम्नलिखित कारण हैं
(i) प्रशासन की दृष्टि से आवश्यक है कि जिन नागरिक सेवाओं की किसी जन-समुदाय को जरूरत होती है, उनको उस समुदाय के आवास-क्षेत्र/प्रदेश की दृष्टि से ही आयोजित, कार्यक्रमबद्ध व संगठित किया जाए, क्योंकि स्थानीय शासन के कार्यों का आधार प्रादेशिक ही होता है ।


(ii) स्थानीय शासन इस दृष्टि से भी आवश्यक है कि कुछ सार्वजनिक आवश्यकताएँ सघनता, स्वरूप तथा विस्तार की दृष्टि से स्थानीय होती हैं, अर्थात् उनका संबंध समस्त क्षेत्रों से नहीं होता । इन समस्याओं को स्थानीय तरीके के समाधानों का विकास करके ही हल किया जा सकता है ।


(iii) स्थानीय शासन व्यापक क्षेत्र में जनता की सेवाएँ करता है । वह अनेक प्रकार के तथा विशाल स्तर के कार्य संपादित करता है । स्थानीय शासन को बनाए रखना आवश्यक है । उसे सुदृढ़ रूप प्रदान करना आवश्यक है, क्योंकि राज्य शासन यह सभी कार्य सरलतापूर्वक नहीं कर पाता है । सामुदायिक जीवन से संबंधित अनेक ऐसे विषय हैं, जिन्हें राज्य-शासन नहीं, बल्कि स्थानीय शासन ही संपादित कर सकता है ।

स्थानीय स्वशासन का महत्व——-(i) भावी नेतृत्व का निर्माण- स्थानीय स्वशासन की संस्थाएँ भारत का भावी नेतृत्व तैयार करती हैं । ये विधायकों और मंत्रियों को पर्याप्त प्राथमिक अनुभव एवं प्रशिक्षण प्रदान करती है, जिससे वे भारत की ग्रामीण समस्याओं से अवगत होते हैं । इस प्रकार ग्रामों में उचित नेतृत्व का निर्माण करने एवं विकास कार्यों में जनता की रुचि बढ़ाने में पंचायती राज व्यवस्था का महत्वपूर्ण योगदान रहता है ।


(ii) जनता और सरकार के पारस्परिक संबंध- भारत की जनता स्थानीय स्वशासन की संस्थाओं के माध्यम से शासन के बहुत निकट पहुँच जाती है । इससे जनता और सरकार में परस्पर एक-दूसरे की कठिनाइयों को समझने की भावनाएँ उत्पन्न होती हैं । इसके अतिरिक्त दोनों में परस्पर सहयोग भी बढ़ता है, जो ग्रामोत्थान एवं विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है ।

(iii) स्थानीय समाज और राजनीतिक व्यवस्था के बीच की कड़ी-ग्राम पंचायतों के कार्यकर्ता और पदाधिकारी स्थानीय
समाज और राजनीतिक व्यवस्था के बीच एक कड़ी के रूप में कार्य करते हैं । इन स्थानीय पदाधिकारियों के सहयोग के अभाव में राष्ट्र के निर्माण का कार्य सम्भव नहीं हो सकता है और न सरकारी कर्मचारी अपने दायित्व का समुचित रूप से पालन ही कर सकते हैं ।

(iv) प्रशासकीय शक्तियों का विकेन्द्रीकरण- स्थानीय स्वशासन की संस्थाएं केंद्र और राज्य सरकारों को स्थानीय
समस्याओं के भार से मुक्त करती है । स्थानीय स्वशासन की इकाइयों के माध्यम से ही शासकीय शक्तियों एवं कार्यों का विकेन्द्रीकरण किया जा सकता है । लोकतांत्रिक विकेन्द्रीकरण की इस प्रक्रिया में शासन सत्ता कुछ निर्धारित संस्थाओं में निहित होने के स्थान पर, गाँव की पंचायत के कार्यकर्ताओं के हाथों में पहुँच जाती है । भारत में इस व्यवस्था से प्रशासन की कार्यकुशलता में पर्याप्त वृद्धि हुई हैं ।

(v) लोकतांत्रिक परम्पराओं को लागू करने में सहायक- भारत में स्वस्थ लोकतांत्रिक परम्पराओं को लागू करने के लिए
लागू स्वशासन व्यवस्था ठोस आधार प्रदान करती है । उसके माध्यम से शासन-सत्ता वास्तविक रूप से जनता में चली जाती है । इसके अतिरिक्त स्थानीय स्वशासन व्यवस्था, स्थानीय निवासियों में लोकतांत्रिक संगठनों के प्रति रुचि उत्पन्न करती है ।

(vi) लोकतांत्रिक परम्पराओं के अनुरूप- लोकतंत्र का आधारभूत तथा मौलिक सिद्धान्त यह है कि सत्ता का अधिक-से
अधिक विकेन्द्रीकरण होना चाहिए । स्थानीय स्वशासन की इकाइयाँ सत्ता के विकेन्द्रीकरण का प्रत्यक्ष उदाहरण हैं ।

(vii) नागरिकों को निरन्तर जागरूक बनाए रखने में सहायक- स्थानीय स्वशासन की संस्थाएँ लोकतंत्र की प्रयोगशालाएँ हैं । ये भारतीय नागरिकों को अपने राजनीतिक अधिकारों के प्रयोग की शिक्षा देती है तथा साथ ही उनमें नागरिकता के गुणों का विकास करने में भी सहायक होती हैं ।

(viii) प्रशासनिक अधिकारियों की जागरूकता- स्थानीय लोगों की शासन में भागीदारी के कारण प्रशासन उस क्षेत्र की
आवश्यकताओं के प्रति अधिक सजग तथा संवेदनशील हो जाता है ।
(ix) नौकरशाही की बुराइयों की समाप्ति- स्थानीय स्वशासन संस्थाओं में नागरिकों की प्रत्यक्ष भागीदारी से प्रशासन में
नौकरशाही, लालफीताशाही तथा भ्रष्टाचार जैसी बुराईयों के उत्पन्न होने की सम्भावना कम रहती है ।

2– भारत में पंचायती राज व्यवस्था की मुख्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिए ।
उत्तर— भारत में पंचायती राज व्यवस्था(स्थानीय स्वशासन) की विशेषताएँ
(i) स्थानीय क्षेत्र- किसी भी अन्य सरकार की भाँति स्थानीय स्वशासन भी एक भौगोलिक क्षेत्र में कार्य करता है । किसी राज्य अथवा देश की तुलना में यह भौगोलिक क्षेत्र छोटा होता है जैसे- ग्राम, नगर, महानगर । स्थानीय प्रशासन को सुचारु रूप से चलाने के लिए आवश्यक है कि उनके क्षेत्र एवं जनसंख्या की एक निश्चित सीमा हो । जिन महानगरों में स्थानीय प्रशासन का आकार (जनसंख्या) बहुत बढ़ जाता हैं वहाँ विकेन्द्रीकरण कर प्रशासन को स्वतंत्र इकाइयों से बाँटकर या कुछ कार्यों को स्वतंत्र बोर्डों को सौंप देने के प्रयास किए जाते हैं ।


(ii) सांविधिक हैसियत-
स्थानीय संस्थाएँ संवैधानिक होती हैं अर्थात् विधि अधिनियम द्वारा उसकी रचना की जाती हैं और उसी से वह अपनी शक्तियाँ तथा स्थितियाँ प्राप्त करता है । भारत में 73 वाँ तथा 74 वाँ संशोधन प्राप्ति हो जाने के उपरांत स्थानीय प्रशासनों को संवैधानिक अस्तित्व प्राप्त हो गया हैं ।

(iii) स्वायत्त स्थिति- स्थानीय की स्थिति वैधानिक होती हैं । उसकी स्वायत्तता इसका परिणाम है । स्थानीय शासन संस्थाओं को केंद्रीय एवं राजकीय नियंत्रण से मुक्त रहकर काम करने का अधिकार होता हैं । विधि में उल्लेखित कार्यों एवं शक्तियों का प्रयोग करने में स्थानीय प्रशासन तब तक स्वतंत्र होता है, जब तक कि विधानमंडल हल निधि में से संशोधन नहीं कर देता ।

(iv) स्थानीय भागीदारी- स्थानीय प्रशासन के परिचालन में स्थानीय निवासियों की साझेदारी होती है । स्थानीय सरकार के प्रशासन तथा निर्णय प्रक्रिया में स्थानीय लोगों की साझेदारी बहुत महत्वपूर्ण होती है । यही उसको स्वशासन की विशेषता प्रदान करती है ।

(v) स्थानीय जवाबदेही- स्थानीय प्रशासन स्थानीय लोगों के प्रति जवाबदेह होता है क्योंकि एक विशेष क्षेत्र के लोगों को ऐसी सेवाएं प्रदान करता है जो स्थानीय महत्व रखती हैं जैसे- सफाई, शिक्षा, यातायात, जल आपूर्ति आदि । स्थानीय लोगों के नियंत्रण के कारण उसे अच्छी सेवाएं प्रदान करने के लिए विवश होना पड़ता है । यदि स्थानीय लोगों के प्रति उनकी जवाबदेही न हो तो वे आवश्यकताओं के प्रति उदासीन हो जाएगें ।

(vi) स्थानीय आर्थिक संसाधन- स्थानीय प्रशासनों के आर्थिक संसाधनों के मुख्य दो स्रोत होते हैं ।
(क) राज्य अथवा केंद्रीय सरकार द्वारा दी जाने वाली सहायता राशि ।
(ख) स्वयं स्थानीय प्रशासनों द्वारा लगाए जाने वाले कर या प्रभार ।

स्थानीय शासन संस्थाएँ अपनी वित्तीय संसाधनों में स्वावलम्बी नहीं होती अत: केंद्रीय या राज्य सरकारें सहायता धनराशि के द्वारा सहायता करती हैं । परंतु अनिवार्य है कि उसके पास कर प्रभार के माध्यम से अपना राजस्व जुटाने की शक्ति हो । अत: स्थानीय शासन संस्थाओं को राजस्व के स्वतंत्र संसाधन सौंप दिए जाते हैं । जैसे-स्थानीय सम्पत्तियों पर कर लगाना, स्थानीय व्यापार स्थानों तथा मनोरंजन के साधनों पर कर लगाना आदि । स्थानीय शासन संस्थाएँ अपने क्षेत्र में रहने वाले लोगों के घरों तक कुछ नागरिक सेवाएँ पहुँचाती हैं । इन सेवाओं के प्रदान से स्थानीय समुदाय का जीवन स्वस्थ तथा सुखमय हो जाता है । यह लोगों की मूलभूत आवश्यकताएँ होती हैं । जैसे सफाई, सड़कों तथा गलियों में रोशनी का प्रबन्ध, मल-जल के निकास का प्रबंध करना ।

(vii) सामान्य उद्देश्य- स्थानीय शासन संस्थाओं का स्वरूप एक उद्देशीय न होकर सामान्य उद्देशीय होता है । यह बहुउद्देशीय संस्थान हैं जो कई प्रकार के कार्यों को करता है । जैसे- स्वास्थ्य, प्राथमिक शिक्षा, सफाई, जल आपूर्ति आदि ।

3– भारत में पंचायती राज व्यवस्था की कार्यप्रणाली का परीक्षण कीजिए ।
उत्तर— निःसन्देह यह कहा जा सकता है कि पंचायती राज के अंतर्गत विकास योजनाओं को बल प्राप्त हुआ है । कृषि, पशुपालन, स्वास्थ्य, चिकित्सा, ग्राम सफाई तथा शिक्षा की उन्नति के लिए परियोजनाएँ बनीं और उन्हें लागू भी किया गया, परंतु कई कारणों से पंचायती राज योजना उतनी सफल साबित नहीं हो सकी, जिनती कि अपेक्षित थीं । 24 अप्रैल, 1993 ई० को 73 वाँ संविधान संशोधन अधिनियम लागू किया गया । इस अधिनियम को लागू करते समय कई प्रकार की चुनौतियाँ और कठिनाइयाँ उत्पन्न होना स्वाभाविक है

(i) सक्रिय भागीदारी का प्रश्न- यह अपेक्षा थी कि पंचायती राज से वास्तव में सत्ता का विकेन्द्रीकरण होगा । वास्तव में वैसा नहीं हुआ । ग्राम पंचायतों में बड़े-बड़े किसानों और समाज के कुछ विशेष वर्गों का वर्चस्व बना रहा । परिणामस्वरूप पंचायतें जनशक्ति का प्रतीक नहीं बन पाई हैं ।
(ii) शांतिपूर्ण और निष्पक्ष चुनावों की समस्या- पंचायतों के चुनावों में भी राजनीतिक दलों की घुसपैठ देखने को मिलती है । परिणामस्वरूप, पंच व सरपंच के लिए योग्य व्यक्तियों का चुनाव नहीं हो पाता है । पंचायतों राज के सभी स्तरों के लिए शांतिपूर्ण निष्पक्ष चुनाव कर पाना एक जटिल समस्या है । राज्य सरकार इस प्रकार का कानून बनाए कि भ्रष्ट और दुष्चरित्र व्यक्ति चुनाव मैदान में न आने पाए । इसके अतिरिक्त प्रत्येक स्तर पर चुनाव व्यय की सीमा निर्धारित करनी होगी ।

(iii) जिला अधिकारियों का अनावश्यक हस्तक्षेप- पंचायती राज संस्थाओं में जो सर्वेक्षण किए गए हैं उनसे ज्ञात होता है कि जिलाधीश तथा अन्य अधिकारी पंचायती संस्थाओं के कार्यों में अनावश्यक हस्तक्षेप करते हैं । जिला अधिकारी के पास संसद-सदस्य और विधानमंडल के सदस्य पहुँचते रहते हैं । वे उन पर यह दवाब डालते हैं कि अमुक पंचायत भंग कर दी जाए अथवा पंचायत के अमुक निर्णय को लागू न किया जाए । कई बार प्रायः इन दवाबों के कारण जिलाधिकारी गलत कार्य कर बैठते हैं । इसलिए 73 वें संशोधन-अधिनियम में यह प्रावधान है कि पंचायतें यदि भंग की गई तो उनके चुनाव 6 महीने में कराने होंगे ।

(iv) अशिक्षा व अज्ञानता- अशिक्षा और अज्ञानता के कारण गाँव वालों को आपसी झगड़ें से ही फुरसत नहीं मिलती । गाँव में अज्ञानता का वातावरण विद्यमान है । बहुत से लोग ढिलाई और आलस के कारण विकास कार्यों में रूचि नहीं लेते । आय के अपर्याप्त साधन- पंचायती और पंचायत समितियों के कार्यों की कोई सीमा नहीं है । ग्रामवासियों का जीवन-स्तर आज भी बहुत नीचा है । उनके सामाजिक व आर्थिक विकास के लिए प्रयत्न किया जाना चाहिए, परन्तु पंचायतों की आय के साधन बहुत सीमित हैं । सरकार से प्राप्त होने वाले दान पर्याप्त नहीं होता । इसलिए यह व्यवस्था की गई है कि प्रत्येक राज्य में एक वित्त आयोग का गठन किया जाएगा । वित्त आयोग पंचायतों की वित्तीय स्थिति की समीक्षा करके उनके आधार को सुदृढ़ बनाने की कोशिश करेगा ।

प्रत्येक पाँच वर्ष के बाद एक नवीन वित्तीय आयोग का गठन किया जाएगा । आवश्यक कौशल अथवा कार्यक्षमता विकसित करने की समस्या- नवीन व्यवस्था के अन्तर्गत पंचायती राज संस्थाओं को नई-नई जिम्मेदारियाँ सौंपी जा रही हैं, जैसे कि विद्युतीकरण, वितरण-प्रणाली का सुधार, गरीबी निवारण कार्यक्रम को लागू करना तथा अपंग और मानसिक दृष्टि से अशक्त लोगों का विकास । इन दायित्वों के निर्वाह के लिए पंचायतों को बहुत-से नवीन विभाग खोलने और उनके लिए कर्मचारियों की नियुक्ति करनी होगी । ग्रामीण क्षेत्रों के लिए आर्थिक योजनाओं का निर्माण और उनका संचालन करना होगा । सभी स्तरों पर कर्मचारियों को गहन प्रशिक्षण की आवश्यकता है । प्रशिक्षण कार्यक्रमों में इन विषयों को सम्मिलित करना पड़ेगा: आर्थिक योजनाओं व परियोजनाओं का निर्माण, हिसाब का रख-रखाव तथा संबंधित विभागों का संरचनात्मक स्वरूप । इसके लिए राज्य सरकार के विभागों, प्रशिक्षण, संस्थानों और गैर-सरकारी संस्थाओं से सहयोग लेने की आवश्यकता होगी ।

4– क्षेत्र पंचायत( पंचायत समिति) के संगठन, कार्यों एवं शक्तियों पर प्रकाश डालिए ।
उत्तर— क्षेत्र पंचायत (पंचायत समिति)- पंचायत समिति अथवा क्षेत्र पंचायत को पंचायती राज व्यवस्था के मध्य (खंड)स्तर की संस्था कहा गया है । उत्तर प्रदेश पंचायत विधि (संशोधन) अधिनियम, 1994 ई०’ द्वारा क्षेत्र समिति का नाम बदलकर क्षेत्र पंचायत कर दिया गया है । राज्य सरकार, राजपत्र (गजट) में अधिसूचना जारी कर प्रत्येक खंड के लिए एक क्षेत्र पंचायत गठित करती है तथा क्षेत्र पंचायत का नाम, खंड के नाम पर होता है । क्षेत्र पंचायत (पंचायत समिति ) का गठन-क्षेत्र पंचायत एक प्रमुख और निम्नलिखित प्रकार के अन्य सदस्यों से मिलकर बनती है
(i) खंड की सभी ग्राम पंचायतों के प्रधान ।

(ii) कुछ सदस्य क्षेत्र के प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्रों से प्रत्यक्ष निर्वाचन द्वारा निर्वाचित किए जाते हैं । प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्र की जनसंख्या लगभग दो हजार होती है ।
(iii) लोकसभा और विधानसभा के ऐसे सदस्य, जो उन निर्वाचन क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो पूर्णतः अथवा अंशत: उस खंड में सम्मिलित हैं ।
(iv) राज्यसभा तथा विधानपरिषद् के ऐसे सदस्य जो खंड के अन्तर्गत निर्वाचकों के रूप में पंजीकृत हैं ।
उपर्युक्त सदस्यों में क्रम संख्या 1, 3 तथा 4 के सदस्यों को प्रमुख अथवा उप प्रमुख के निर्वाचन तथा उनके विरुद्ध
अविश्वास के मामलों में मत देने का अधिकार नहीं होता है । स्थानों का आरक्षण- प्रत्येक क्षेत्र पंचायत में अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़े वर्गों के लिए स्थानों के आरक्षण की व्यवस्था जिला पंचायत के अनुरूप ही होती है । क्षेत्र पंचायत में निर्वाचित स्थानों की कुल संख्या के कम-सेकम एक तिहाई (33%) स्थान महिलाओं के लिए आरक्षित होती हैं । कार्यकाल- क्षेत्र पंचायत का कार्यकाल 5 वर्ष है । राज्य सरकार इसे 5 वर्ष से पूर्व भी भंग कर सकती है ।

क्षेत्र पंचायत के पदाधिकारी- क्षेत्र पंचायत का प्रमुख क्षेत्र प्रमुख’ अथवा ‘ब्लॉक प्रमुख’ कहलाता है । इसका निर्वाचन निर्वाचित सदस्य अपने में से ही करते हैं । क्षेत्र प्रमुख के अतिरिक्त ‘ज्येष्ठ उपप्रमुख तथा कनिष्ठ उपप्रमुख’ की भी व्यवस्था है । इनका चुनाव क्षेत्र पंचायत के सदस्यों में से ही किया जाता है । इन सभी की कार्यावधि पाँच वर्ष होती है । क्षेत्र प्रमुख क्षेत्र पंचायत की बैठकों का आयोजन एवं उनका सभापतित्व करता है । क्षेत्र विकास अधिकारी- इसकी नियुक्ति राज्य सरकार द्वारा की जाती है । यह क्षेत्र पंचायत का प्रमुख अधिकारी होता है । इसका पद स्थायी होता है । यही क्षेत्र में योजनाएँ कार्यान्वित करता है । इसकी सहायता के लिए अन्य अनेक कर्मचारी होते हैं । क्षेत्र पंचायत त्रिस्तरीय पंचायत राज व्यवस्था की मध्यवर्ती कड़ी है । यह क्षेत्रीय विकास को प्रोत्साहन देती है तथा क्षेत्रीय स्तर पर प्रारम्भ की जाने वाली योजनाओं तथा प्रस्तावित कार्यक्रमों को क्षेत्र विकास अधिकारी के सहयोग से लागू करने का प्रयास करती हैं । क्षेत्र पंचायत के अधिकार और कार्य-क्षेत्र पंचायत के प्रमुख अधिकार एवं कार्य निम्नलिखित हैं

(i) सार्वजनिक निर्माण संबंधी कार्य करना,
(ii) कुटीर तथा लघु उद्योगों का विकास करना,
(iii) स्वास्थ्य तथा सफाई संबंधी कार्य करना–
(iv) पशुपालन तथा पशु सेवाओं में वृद्धि करना,
(v) कृषि, भूमि विकास, भूमि सुधार और लघु सिंचाई संबंधी कार्यों को करना,
(vi) ग्रामीण आवास की व्यवस्था करना,
(vii) शैक्षणिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विकास संबंधी कार्य करना,
(viii) पेयजल, ईंधन और चारे की व्यवस्था करना,
(ix) बाजार और मेलों की व्यवस्था करना,
(x) प्राकृतिक आपदाओं में सहायता देना–
(xi) चिकित्सा तथा परिवार कल्याण संबंधी कार्य करना, इनके अतिरिक्त भी अन्य बहुत-से कार्य क्षेत्र पंचायत द्वारा संपादित किए जाते हैं ।

5– पंचायती राज व्यवस्था से आप क्या समझते हैं? ग्राम पंचायतों के कार्य एवं शक्तियों का वर्णन कीजिए ।
उत्तर— पंचायती राज व्यवस्था (स्थानीय स्वशासन)- इसके लिए लघु उत्तरीय प्रश्न संख्या-1 के उत्तर का अवलोकन कीजिए ।
ग्राम पंचायत– प्रत्येक ग्राम में एक ग्राम सभा होती है । गाँव का प्रत्येक वयस्क व्यक्ति ग्राम सभा का सदस्य होता है । ग्राम पंचायत का चयन ग्राम सभा द्वारा किया जाता है । ग्राम पंचायत के चुनाव गुप्त मतदान द्वारा वयस्क मताधिकार के आधार पर किए जाते हैं । ग्राम पंयायत के सरपंच का चुनाव पंचायत के सम्पूर्ण निर्वाचित मंडल द्वारा प्रत्यक्ष रूप से किया जाता है । ग्राम पंचायत, पंचायती राज व्यवस्था की सबसे छोटी आधारभूत इकाई है । यह ग्राम सरकार की कार्यपालिका के रूप में कार्य करती है । ग्राम पंचायत के कार्यों तथा शक्तियों की विवेचना निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत की जा सकती हैं


(i) व्यवसाय संबंधी कार्य- इन कार्यों के अन्तर्गत निम्नलिखित कार्य आते हैं
(क) पुस्कालयों एवं वाचनालयों की व्यवस्था करना, (ख) पार्क बनवाना, (ग) अस्पताल खुलवाना, (घ) गृह-उद्योगों को उन्नत करने के प्रयत्न करना, (ङ) सहकारी समितियों का गठन करना, (च) स्वयंसेवक का दल का संगठन करना, (छ) पशुओं की नस्ल सुधारना, (ज) अकाल या अन्य आपदा के समय गाँववालों की सहायता करना, (झ) सड़कों के किनारे छायादार वृक्ष लगवाना आदि,
(ण) सहकारी ऋण प्राप्त करने में किसानों की सहायता करना ।

(ii) न्याय संबंधी कार्य- इन कार्यों के अन्तर्गत ग्राम पंचायत के कुछ सदस्य न्याय पंचायत के रूप में कार्य करते हुए अपने
गाँव के छोटे-छोटे झगड़ों का निपटारा भी करते हैं तथा फौजदारी के मुकदमों में इसे ₹ 250 तक का जुर्माना करने का अधिकार प्राप्त है । दीवानी के मामलों में यह ₹ 500 के मूल्य तक ही सम्पत्ति के मामलों की सुनवाई कर सकते हैं । तथा देश के चार राज्यों राजस्थान, हरियाणा, मध्य प्रदेश तथा महाराष्ट्र में ग्राम न्यायालयों का गठन हुआ है । यह पंचायती राज
व्यवस्था के परिप्रेक्ष्य में जिला स्तरीय प्रशासन में एक क्रान्तिकारी निर्णय होगा ।

(iii) सार्वजनिक कार्य- ग्राम पंचायत द्वारा सम्पादित होने वाले सार्वजनिक कार्यों के अन्तर्गत निम्नलिखित कार्य आते हैं
(क) गाँव की सफाई की व्यवस्था करना, (ख) गाँव एवं गाँव की इमारतों की रक्षा करना, (ग) रोशनी का प्रबन्ध करना, (घ) संक्रामक रोगों की रोकथाम करना, (ङ) बालक एवं बालिकाओं की शिक्षा की समुचित व्यवस्था करना, (च) खेलकूद की व्यवस्था करना, (छ) कृषि की उन्नति हेतु प्रयत्न करना, (ज) श्मशान भूमि की व्यवस्था करना, (झ) जन्म-मरण का लेखा-जोखा करना, (ण) सार्वजनिक चरागाहों की व्यवस्था करना, (ट) जनगणना और पशुगणना करना, (ठ) अग्निकांड होने पर आग बुझाने का प्रबन्ध करना, (ड) प्राथमिक चिकित्सा का प्रबन्ध करना, (ढ) समय-समय पर कानून द्वारा यथा निर्देशित अन्य कार्य करना, (ञ) खाद एकत्र करने के लिए स्थान सुनिश्चित करना,
(त) ग्रामीण जनता को शासन-व्यवस्था से परिचित कराना, (थ) प्रसूति-गृह खोलना, (द) आदर्श नागरिकता की भावना को प्रोत्साहन देना तथा (ध) जल-संसाधनों की सुरक्षा का प्रबन्ध करना ।

भारतीय संविधान में किए गए 73वें संशोधन द्वारा ग्राम पंचायत को व्यापक अधिकार एवं शक्तियाँ प्रदान की गई हैं । साथ ही ग्राम पंचायत के कार्य-क्षेत्र को व्यापक बनाया गया है । इसके कार्य-क्षेत्र के अन्तर्गत 29 कार्यों से युक्त एक विस्तृत सूची को रखा गया है ।

6– नगर पंचायत की रचना तथा कार्यों का वर्णन कीजिए ।
उत्तर— नगर पंचायत- ‘उत्तर प्रदेश नगरीय स्वायत्त शासन विधि (संशोधन) अधिनियम, 1994 के अनुसार’ 30 हजार से एक लाख की जनसंख्या वाले क्षेत्रों को ‘संक्रमणशील क्षेत्र’ घोषित किया जाएगा तथा ऐसे प्रत्येक क्षेत्र की एक ‘नगर पंचायत’ होगी । संक्रमणशील क्षेत्र- ‘संक्रमणशील क्षेत्र’ तात्पर्य ऐसे क्षेत्र से है, जो ग्रामीण क्षेत्र से नगर बनने की ओर बढ़ रहा है । उत्तराखण्ड स्थित गढ़वाल और कुमाऊँ मंडलों के जिलों में 15 हजार से अधिक जनसंख्या वाले स्थानों पर भी नगर पंचायत की स्थापना की संस्तुति शासन स्तर से की गई हैं । नगर पंचायत का गठन- प्रत्येक नगर पंचायत में एक अध्यक्ष तथा निम्नलिखित तीन प्रकार के सदस्य होते हैं


(i) पदेन सदस्य
(क) राज्यसभा तथा विधानपरिषद् के ऐसे सदस्य जो उस नगर पंचायत के क्षेत्र के अन्तर्गत पंजीकृत है ।
(ख) लोकसभा तथा विधानसभा के ऐसे सदस्य, जो उन निर्वाचन क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिनमें पूर्णत: अथवा
अंशत: वे नगर पंचायत क्षेत्र सम्मिलित हैं ।
(ii) मनोनीत सदस्य- प्रत्येक नगर पंचायत में राज्य सरकार 2 या 3 ऐसे सदस्यों को मनोनीत करती हैं जिन्हें नगरपालिका
प्रशासन का विशेष ज्ञान अथवा अनुभव हो । यह संख्या राज्य सरकार द्वारा निश्चित होती हैं । इन मनोनीत सदस्यों को नगर पंचायत में मत देने का अधिकार नहीं होता । नगर पंचायत के सदस्यों को भी सभासद कहा
जाता है ।
(iii) निर्वाचित सदस्य- नगर पंचायत में निर्वाचित सदस्यों की संख्या कम-से-कम 10 तथा अधिकतम 24 निर्धारित है । नगर पंचायत के सदस्यों की संख्या राज्य सरकार द्वारा निश्चित की जाती है तथा यह संख्या सरकारी गजट में अधिसूचना के रूप में प्रकाशित की जाती है । ।


स्थानों का आरक्षण- प्रत्येक नगर पंचायत के निर्वाचित सदस्यों में अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों व अन्य पिछड़े वर्गों तथा महिलाओं के लिए स्थान आरक्षित होते हैं । ये आरक्षित स्थान नगरपालिका परिषद् के आरक्षित स्थानों के समान ही होते हैं । नगर पंचायतों में अनुसूचित जातियों व जनजातियों के लिए आरक्षण पर उस नगर पंचायत क्षेत्र का जनसंख्या के अनुपात में होते हैं । पिछड़े वर्गों के लिए 27% और इन आरक्षित स्थानों में 33% स्थान महिलाओं के लिए आरक्षित होते हैं । इससे संबद्ध चुनावों में भी आरक्षण की चक्रानुक्रम व्यवस्था लागू है । नगर पंचायत के पदाधिकारी एवं अधिकारी- नगर पंचायत के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष तथा अधिकारी व कर्मचारी, नगरपालिका परिषद् की व्यवस्था के समान ही होते हैं । इसके अतिरिक्त नगर पंचायत के विघटन के सन्दर्भ में भी वही व्यवस्था है, जो नगरपालिका परिषद् के संदर्भ में हैं । नगर पंचायत के कार्य- नगर पंचायत अपने क्षेत्र में वे सभी कार्य करते हैं जो कार्य नगरपालिका परिषद् द्वारा अपने क्षेत्र में किए जाते हैं । नगर पंचायत के प्रमुख कार्य इस प्रकार से हैं


(i) पर्यावरण की रक्षा,
(ii) श्मशान-स्थलों की व्यवस्था,
(iii) शुद्ध तथा स्वच्छ पेयजल की आपूर्ति,
(iv) सार्वजनिक सड़कों, स्थानों व नालियों की सफाई तथा रोशनी का प्रबन्ध,
(v) प्रसूति केंद्रों तथा शिशु गृहों की व्यवस्था,
(vi) पशु चिकित्सालयों तथा प्राथमिक स्कूलों की व्यवस्था,
(vii) जन्म तथा मृत्यु का पंजीयन,
(viii) अग्नि-शमन की व्यवस्था

7– जिला पंचायत का गठन कैसे होता है? इसके प्रमुख कार्य क्या हैं?
उत्तर— जिला पंचायत-जिला पंचायत द्वारा जिले के सम्पूर्ण ग्रामीण क्षेत्र का प्रबन्ध किया जाता है । उत्तर प्रदेश में सन् 1961 ई० के अधिनियमित कानून के अन्तर्गत जिलापरिषदों का गठन किया हुआ था, परन्तु ‘उत्तर प्रदेश पंचायत विधि (संशोधन) अधिनियम, 1994’ द्वारा जिला परिषद् का नाम जिला पंचायत कर दिया गया है । जिला पंचायत का नाम जिले के नाम पर होता है तथा प्रत्येक जिला पंचायत एक नियमित निकाय होता है ।
जिला पंचायत का गठनसदस्य- प्रत्येक जिला पंचायत में कुछ निर्वाचित सदस्य और कुछ अन्य सदस्य होते हैं यथा

(i) क्षेत्र पंचायतों के प्रमुख- जिले की समस्त क्षेत्र पंचायतों के प्रमुख भी जिला पंचायत के सदस्य होते हैं ।
(ii) निर्वाचित सदस्य- निर्वाचित सदस्यों की संख्या राज्य सरकार द्वारा निश्चित की जाती है विभिन्न जिलों की पंचायतों में यह संख्या भिन्न-भिन्न होती है । इन सदस्यों का निर्वाचन वयस्क मतदान के आधार पर होता है । 50 हजार की जनसंख्या पर एक सदस्य निर्वाचित किया जाता है ।

(iii) लोकसभा तथा विधानसभा के वे सदस्य जो जिला पंचायत क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं ।

(iv) लोकसभा, राज्यसभा, विधानसभा तथा विधानपरिषद् के वे सदस्य जो जिला पंचायत के क्षेत्र के अन्तर्गत निर्वाचकों के रूप में पंजीकृत हैं, जिला पंचायत के सदस्य होते हैं ।

स्थानों का आरक्षण- जिला पंचायत में अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों के लिए जनसंख्या के आधार पर 21 प्रतिशत तथा पिछड़े वर्गों के लिए 27 प्रतिशत स्थान आरक्षित किए गए हैं । जिला पंचायत में निर्वाचित स्थानों की कुल संख्या के कम-से-कम एक-तिहाई स्थान महिलाओं के लिए आरक्षित किए गए हैं ।

जिला पंचायत के अधिकारी- प्रत्येक जिला पंयायत का एक अध्यक्ष और एक उपाध्यक्ष होता है । अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष का निर्वाचन निर्वाचित सदस्यों द्वारा गुप्त मतदान प्रणाली के आधार पर होता है । इन पदाधिकारियों को कम-से-कम 21 वर्ष की आयु का अवश्य होना चाहिए । अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष का निर्वाचन 5 वर्ष के लिए होता है । इस अवधि से पूर्व भी उन्हें अविश्वास का प्रस्ताव पारित करके पदच्युत किया जा सकता है । जिला पंचायत के अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष के अतिरिक्त और भी अनेक छोटे-बड़े स्थायी एवं वैतनिक अधिकारी होते हैं । इन सबको अध्यक्ष के निर्देशन में कार्य करना होता है । समितियाँ- जिला पंचायत अपना कार्य अनेक समितियों के माध्यम से संचालित करती हैं । इसमें कार्य समिति’, ‘जिला समिति’, ‘शिक्षा एवं जन स्वास्थ्य समिति’, ‘कृषि, उद्योग एवं निर्माण समिति’ तथा ‘समता समिति’ प्रमुख हैं ।

जिला पंचायत के कार्य-जिला पंचायत के प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं(i) सड़क, पुल, तालाब, नाले आदि बनवाना तथा जल निकासी की उचित व्यवस्था करना, (ii) संक्रामक रोगों के नियन्त्रण व उनकी रोकथाम की व्यवस्था करना, (iii) पशु चिकित्सालय खुलवाना, (iv) अस्पताल खोलना, (v) सामाजिक अन्याय और शोषण से अनुसूचित जातियों और जनजातियों की रक्षा करना, (vi) पुलों का निर्माण करवाना, (vii) विद्युत प्रकाश का प्रबन्ध करना, (viii) कृषि उत्पादन बढ़ाने के उपाय करना और गोदामों की स्थापना एवं उनका अनुरक्षण करना आदि, (ix) पुस्तकालयों तथा वाचनालयों का प्रबन्ध करना, (x) कृषि की उन्नति की समुचित व्यवस्था करना आदि । निष्कर्ष- जिला पंचायत के कार्यों की समीक्षा करने के उपरान्त हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि जिला पंचायत के कार्य बहुत-ही व्यापक तथा विस्तृत हैं । जिला पंचायत की कार्य प्रणाली की विशेषता यह है कि यह मानव जीवन की अधिकांश आवश्यकताओं की पूर्ति स्थानीय स्तर पर कर सकती है । इन कार्यों के अतिरिक्त ट्राम बस आदि चलवाना, समाज-सुधार का प्रयत्न करना, नई सड़कें बनवाना, शिक्षा के विकास के कार्य करना, ग्रामवासियों के लिए मनोरंजन के साधन जुटाना और संकट के समय गाँवों को अनुदान देना आदि जिला पंचायत के अन्य ऐच्छिक कार्य हैं ।

8– नगर निगम की रचना तथा उसके कार्यों का उल्लेख कीजिए ।
उत्तर– निगम- उत्तर प्रदेश नगरीय स्वायत्त शासन विधि (संशोधन) अधिनियम, 1994′ के प्रावधानों के अन्तर्गत 5 लाख से अधिक जनसंख्या के नगरों को, जिन्हें पहले महापालिका कहा जाता था, अब नगर निगम’ कहा जाएगा । नगर निगम का गठन- प्रत्येक नगर निगम एक ‘महापौर’ (मेयर) और निम्नलिखित तीन प्रकार के सदस्यों से मिलकर बनता है

(i) पदेन सदस्य(क) लोकसभा और राज्य की विधानसभा के वे सदस्य, जो उन निर्वाचन क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिनमें यह नगर पूर्णतया अथवा अंशतः समाविष्ट है ।
(ख) राज्यसभा और राज्य विधानपरिषद् के वे सदस्य है, जो उस नगर में निर्वाचक के रूप में पंजीकृत हैं ।
(iii) उत्तर प्रदेश सहकारी समिति अधिनियम, 1965 ई० के अधीन स्थापित समितियों के वे अध्यक्ष, जो निगम के सदस्य नहीं हैं । (ii) मनोनीत सदस्य- राज्य सरकार 5 से लेकर 10 तक ऐसे सदस्यों को मनोनीत करती है, जिन्हें नगरपालिका प्रशासन का विशेष ज्ञान अथवा अनुभव प्राप्त होता है ।


(iii) निर्वाचित सदस्य- निगम के सदस्यों को सभासद कहा जाता है । प्रत्येक निगम के सदस्यों की संख्या राज्य सरकार द्वारा निश्चित की जाती है तथा सरकारी गजट में प्रकाशित कर दी जाती है । निगम के सदस्यों की संख्या कम-से-कम 60 तथा अधिक-से-अधिक 110 होती है । सभासद निर्वाचित होने के लिए अर्हताएँ- सभासद के पद पर निर्वाचित होने के लिए प्रत्याशी में निम्नलिखित अर्हताएँ होनी चाहिए
(i) प्रत्याशी का नाम नगर की मतदाता सूची में हो ।
(ii) वह 21 वर्ष की आयु पूरी कर चुका हो ।
(iii) आयु के अतिरिक्त अन्य सभी बातों की दृष्टि से राज्य विधानमंडल का सदस्य निर्वाचित होने की योग्यता रखता हो ।

सभासदों का निर्वाचन- प्रत्येक नगर को लगभग समान जनसंख्या वाले वार्डों (प्रादेशिक क्षेत्रों) में विभाजित किया जाता है । प्रत्येक वार्ड एक सदस्यीय निर्वाचन क्षेत्र होता है तथा प्रत्येक वार्ड से वयस्क मताधिकार और प्रत्यक्ष निर्वाचन पद्धति के आधार पर एक सभासद निर्वाचित किया जाता है ।

महापौर का निर्वाचन- महापौर (मेयर) नगर का प्रथम नागरिक होता है । इसका चयन नगर के समस्त वयस्क मतदाताओं द्वारा मतदान के आधार पर किया जाता है । स्थानों का आरक्षण- प्रत्येक निगम में अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए स्थान आरक्षित किए जाते हैं । पिछड़े वर्गों के लिए प्रत्यक्ष चुनाव से भरे जाने वाले स्थानों का 27% आरक्षित किया जाएगा । नगर निगम में प्रत्यक्ष चुनाव से भरे जाने वाले कुल स्थानों की संख्या के कम-से-कम एक-तिहाई स्थान महिलाओं के लिए आरक्षित रहेंगे । इन आरक्षित स्थानों में मनोनीत सदस्यों के स्थान भी सम्मिलित हैं । उत्तर प्रदेश के स्थानीय निकाय चुनावों में आरक्षण की चक्रानुक्रम व्यवस्था का प्रावधान है ।

निगम के पदाधिकारी- महापौर नगर निगम का सर्वोच्च अधिकारी होता है । इसका निर्वाचन समस्त मतदाताओं द्वारा वयस्क मताधिकार और प्रत्यक्ष निर्वाचन के आधार पर होता है । इसका कार्यक्रम पाँच वर्ष है । उप महापौर का निर्वाचन निगम के सभासदों द्वारा एक वर्ष के लिए किया जाता है ।

नगर आयुक्त तथा अन्य अधिकारी- प्रत्येक नगर निगम का एक नगर आयुक्त होता है । वह अखिल भारतीय प्रशासकीय सेवा (IAS) अथवा प्रान्तीय सेवा का उच्च अधिकारी होता है । इसकी नियुक्ति राज्य सरकार द्वारा होती है । नगर निगम की समस्त गतिविधियों पर इसका पूर्ण नियंत्रण रहता है इसकी सहायता के लिए कई उप नगर अधिकारी, सहायक नगर अधिकारी, स्वास्थ्य अधिकारी, शिक्षा अधिकारी व अभियन्ता आदि अनेक वैतनिक अधिकारी भी होते हैं ।

नगर निगम के कार्य- नगर निगम के प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं(i) नगरवासियों के लिए पेय जल की समुचित व्यवस्था करना । (ii) नागरिकों के जीवन की सुरक्षा की दृष्टि से पुराने खस्ता हाल मकानों को गिरवाना । (iii) सम्पूर्ण नगर को स्वच्छ रखने की व्यवस्था करना । (iv) सार्वजनिक निर्माण संबंधी कार्य जैसे कुएँ, नालियाँ, सड़कें, पुल आदि बनवाना । (v) सड़कों, गलियों आदि सभी सावजनिक स्थानों पर प्रकाश का समुचित प्रबन्ध करना । (vi) शिक्षा की समुचित व्यवस्था के लिए प्राइमरी एवं जूनियर हाईस्कूल स्तर के विद्यालयों की व्यवस्था करना (vii) निःशुल्क औषधालय एवं चिकित्सालय खोलना । (viii) संक्रामक रोग के प्रसार पर उनके नियंत्रण हेतु समुचित प्रबन्ध करना । (ix) संक्रामक रोगों के टीके लगवाना । (x) स्वास्थ्य की दृष्टि से हानिकारक पदार्थों की बिक्री पर प्रतिबन्ध लगवाना । (xi) नगर की आर्थिक प्रगति के लिए नगर के उद्योगों तथा व्यापार की उन्नति के लिए कार्य करना आदि । (xii) समाज के कमजोर वर्गों के हितों का संरक्षण करना । (xiii) हाट व मेलों की व्यवस्था करना । (xiv) नागरिकों के लिए स्वस्थ मनोरंजन की व्यवस्था करना । नगर निगमों की कार्य-सूची तो बहुत विस्तृत है तथा उनके कन्धों पर सम्पूर्ण नगर के विकास का उत्तरदायित्व है, परन्तु निगमों पर राज्य सरकार का कठोर नियंत्रण होने के कारण वे स्वतंत्रतापूर्वक कार्य नहीं कर पाते हैं ।

9– उत्तर प्रदेश में नगरपालिकाओं( परिषदों) की रचना तथा उनके कार्यों का संक्षेप में वर्णन कीजिए ।
उत्तर— नगरपालिका परिषद्- ‘उत्तर प्रदेश नगरीय स्वायत्त शासन विधि (संशोधन) अधिनियम, 1994’ के अन्तर्गत 1 लाख से 5 लाख तक की जनसंख्या वाले नगर हेतु ‘लघुत्तर नगरीय क्षेत्र का प्रावधान किया गया है तथा इनके प्रबन्ध के लिए ‘नगरपालिका परिषद्’ की व्यवस्था का निर्णय लिया गया है । नगरपालिका परिषद्का गठन- नगरपालिका परिषद् में एक अध्यक्ष और निम्नलिखित तीन प्रकार के सदस्य होते हैं

(i) पदेन सदस्य——-
(क) इसमें लोकसभा और राज्य विधानसभा के ऐसे समस्त सदस्य सम्मिलित होते हैं जो उन निर्वाचित क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करते हैं जिनमें पूर्णतः अथवा अंशत: वे नगरपालिका क्षेत्र सम्मिलित होते हैं ।
(ख) इसमें राज्यसभा और विधानपरिषद् के ऐसे समस्त सदस्य सम्मिलित होते हैं जो उस नगरपालिका क्षेत्र के अन्तर्गत निर्वाचक के रूप में पंजीकृत हैं ।

(ii) मनोनीत सदस्य- प्रत्येक नगरपालिका परिषद् में राज्य सरकार द्वारा ऐसे सदस्यों को मनोनीत किया जाता है जिन्हें नगरपालिका प्रशासन का विशेष ज्ञान अथवा अनुभव हो । ऐसे सदस्यों की संख्या 3 से कम और 5 से अधिक नहीं हो सकती । इन मनोनीत सदस्यों को नगरपालिका परिषद् की बैठकों में मत देने का अधिकार नहीं होता । नगर निगम के निर्वाचित सदस्यों (सभासद)के समान नगरपालिका परिषद् के सदस्यों को भी सभासद ही कहा जाता है ।
(iii) निर्वाचित सदस्य- नगर पालिका परिषद् में जनसंख्या के आधार पर निर्वाचित सदस्यों की संख्या 25 से कम और 55 से अधिक नहीं होगी । राज्य सरकार सदस्यों की यह संख्या निश्चित करके सरकारी गजट में अधिसूचना प्रकाशित करेगी ।

सभासदों का निर्वाचन- प्रत्येक ‘लघुतर नगरीय क्षेत्र’ को लगभग समान जनसंख्या वाले ‘प्रादेशिक क्षेत्रों में विभाजित किया जाता है तथा ऐसे प्रत्येक प्रादेशिक क्षेत्र को कक्ष कहा जाता है । प्रत्येक कक्ष ‘एक सदस्य निर्वाचन क्षेत्र’ होता है तथा ऐसे कक्ष के वयस्क मताधिकार और प्रत्यक्ष निर्वाचन के आधार पर एक सभासद निर्वाचित होता है । सभासद निर्वाचित होने के लिए अर्हताएँ- सभासद के निर्वाचन हेतु निम्नलिखित अर्हताएँ होनी चाहिए
(i) उसका नाम नगर की मतदाता सूची में हो । (ii) वह 21 वर्ष की आयु पूरी कर चुका हो ।

(iii) वह राज्य सरकार, संघ सरकार तथा नगरपालिका परिषद् के अधीन किसी लाभ के पद पर न हो ।

स्थानों का आरक्षण- अनुसूचित जातियों तथा जनजातियों के लिए आरक्षित स्थानों की संख्या का अनुपात: नगरपालिका परिषद् में प्रत्यक्ष चुनाव से भरे जाने वाले कुल स्थानों की संख्या में यथासम्भव वहीं होता है, जो अनुपात नगरपालिका परिषद् क्षेत्र की कुल जनसंख्या में इन जातियों का है । पिछड़ी जातियों के लिए 27 प्रतिशत स्थान आरक्षित किए गए हैं । इन आरक्षित स्थानों में कम-से-कम एक-तिहाई स्थान इसमें भी आरक्षण की चक्रानुक्रम व्यवस्था का प्रावधान है । इन जातियों और वर्गों की महिलाओं के लिए स्थान आरक्षित किए गए हैं ।

नगरपालिका परिषद् का कार्यकाल- नगरपालिका परिषद् का संगठन पाँच वर्षों के लिए किया जाता है, अतः प्रत्येक पाँच वर्ष पश्चात् नए सदस्यों का चुनाव होता है । राज्य सरकार, संविधान के अनुच्छेद 30 के अधीन परिषद् को इस अवधि के पूर्व भी विघटित कर सकती है ।

नगरपालिका परिषद् के पदाधिकारी- प्रत्येक नगरपालिका परिषद् में एक अध्यक्ष और एक उपाध्यक्ष होता है । अध्यक्ष का निर्वाचन 5 वर्ष के लिए समस्त मतदाताओं द्वारा वयस्क मताधिकार तथा प्रत्यक्ष निर्वाचन के आधार पर होता है । उपाध्यक्ष का निर्वाचन नगरपालिका परिषद् के सभासदों द्वारा एक वर्ष की अवधि के लिए किया जाता है ।

नगरपालिका परिषद् के अधिकारी और कर्मचारी- उपर्युक्त पदाधिकारियों के अतिरिक्त परिषद् के कुछ वैतनिक अधिकारी व कर्मचारी भी होते हैं जिनमें सबसे प्रमुख प्रशासनिक अधिकारी होता है । जिन परिषदों में प्रशासनिक अधिकारी न हो, वहाँ परिषद् विशेष प्रस्ताव द्वारा एक या एक से अधिक सचिव नियुक्त कर सकती है ।
नगर पालिका परिषद् की समितियां — नगर पालिका परिषद् अपने कार्यों के संपादन के लिए विभिन्न समितिया बना लेती है और प्रत्येक समिति को एक विशिष्ट विभाग का कार्य सौंप दिया जाता है | इसकी प्रमुक्घ समितियों के नाम निम्न लिखत है —
1- स्थायी समिति
2- जल समिति
३- अर्थ अथवा वित्त समिति
4- शिक्षा समिति आदि
इन सभी समितियों में स्थायी समिति सबसे अधिक महत्वपूर्ण है
नगरपालिका परिषद के कार्य—–नगर पालिका परिषद् के प्रमुख कार्य निम्न है
1-शिक्षा क प्रबंध — अपने नगर वासियों की शैक्षिक स्थिति को सुहाराने के लिए नगर पालिका परिषद् प्राथमिक स्कूल खोलती है |
2- सफाई की व्यवस्था — सम्पूर्ण नग को स्वच्छ एवम् सुंदरा रखने क दायित्व नगर पालिका का ही होता है यह सडको नालियों एवं एनी सार्वजानिक स्थानों पर साफ सफाई कराती है |तथा नगर को साफ रखने के लिए शौचालय एवं मूत्रालय भी व्न्वाती है |

(iii) निर्माण संबंधी कार्य- नगरपालिका परिषद् नगर में नालियों, सड़कों एवं पुलों आदि की व्यवस्था करती है । सड़कों के
किनारे छायादार वृक्ष लगवाना एवं पार्क बनवाना भी इसके प्रमुख कार्य हैं । समृद्ध नगरपालिका परिषदें यात्रियों के लिए
होटल, सरायों एवं धर्मशालाओं का भी प्रबन्ध करती हैं । निर्माण संबंधी ये कार्य नगरपालिका की निर्माण समिति करती है ।

(iv) पानी की व्यवस्था- नगरवासियों के लिए पीने योग्य स्वच्छ जल का प्रबन्ध नगरपालिका परिषद् ही कराती है ।

(v) स्वास्थ्य संबंधी कार्य- नागरिकों के स्वास्थ्य की रक्षा करने का उत्तरदायित्व भी नगरपालिका परिषद् पर ही होता है अतः यह सड़ी-गली वस्तुओं एवं हानिकारक पदार्थों की बिक्री पर रोक लगाकर नागरिकों के स्वास्थ्य की रक्षा करती है । (vi) रोशनी की व्यवस्था- सार्वजनिक स्थानों, सड़कों एवं गलियों पर प्रकाश का समुचित प्रबन्ध भी नगरपालिका परिषद् ही करती है ।
(vii) संक्रामक रोगों की रोकथाम- यह संक्रामक रोगों की रोकथाम का प्रबन्ध करती है, अनेक प्रकार के संक्रमण-निरोधक टीके लगवाती है और यदि फिर भी कोई रोग फैल जाता है तो उसके उपचार हेतु आवश्यक व्यवस्था भी करती है ।
(viii) चिकित्सा की व्यवस्था- नागरिकों के लिए यह अस्पताल एवं औषधालय खोलती है, जहाँ निःशुल्क औषधि दी जाती है । यह पशुओं की चिकित्सा हेतु पशु चिकित्सालय भी खोलती है ।
(ix) मनोरंजन के साधनों का प्रबन्ध- नागरिको के स्वस्थ मनोरंजन के साधनों की व्यवस्था का प्रबन्ध भी नगरपालिका परिषद् ही करती है । इस उद्देश्य से यह बाजार, हाट एवं मेले आदि की व्यवस्था करती है । इन कार्यों के अतिरिक्त ये परिषदें कुछ अन्य ऐच्छिक कार्य भी सम्पन्न करती हैं ।

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