UP BOARD SOLUTION FOR CLASS 11 POLITICAL SCIENCE CHAPTER 4 सामाजिक न्याय

UP BOARD SOLUTION FOR CLASS 11 POLITICAL SCIENCE CHAPTER 4 सामाजिक न्याय

अभ्यास प्रश्नोत्तर :

Q1 . हर व्यक्ति को उसका प्राप्य देने का क्या मतलब है? हर किसी को उसका प्राप्य देने का मतलब समय के साथ-साथ कैसे बदला?

उत्तर : न्याय शब्द की उत्त्पति ‘जस’ से हुई है जिसका अर्थ है “किसी को देना” | परन्तु किसी को देने की अवधारणा समाज में विभिन्न होती है उदाहरण के लिए समय के एक बिन्दू पर महिलाओं को समाज में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त था परन्तु कालांतर में इसकी उपेक्षा की गई और उनकी स्थिति ख़राब हो गयी तथा विभिन्न प्रकार की यातनाएं दी जाने लगी | अब न्याय के विचार के लिए सत्यता, ईमानदारी, निष्पक्षता, समान अवसर, समान व्यवहार और आवश्यकताओं की पूर्ति आदि आवश्यक माने गए है ।।

प्लेटो के अनुसार,

न्याय के अंतर्गत प्रत्येक वर्ग को अपने क्षेत्र में कार्यों की उपलब्धि और दूसरी के कार्यों में हस्तक्षेप न करना ही न्याय है ।।

मार्क्सवादी के अनुसार,

न्याय की अवधारणा की दृष्टि से अलग है और किसी का उचित स्थान का विचार भी अलग है ।। वह पूँजीवादी व्यवस्था से अच्छी तरह से परिचित था जो अन्याय पर आधारित था ।। इसलिए उसने न्याय की अलग आवश्यकताएं बताई ।। उसने अपने न्याय की योजना में सुझाव • दिया की उत्पादन के साधनों और वितरण पर सामूहिक स्वामित्व होना चाहिए ।। इसी के साथ प्रत्येक व्यक्ति की मिल आवश्यकताओं को पूर्ति होनी चाहिए ।।

वर्तमान में न्याय की अवधारना में कुछ तथ्यों का समावेश हो गया है ।। आज न्याय ण केवल सामजिक आर्थिक पक्ष की व्याख्या करता है बल्कि नैतिक मनोवैज्ञानिक आत्मिक और मानववादी पक्ष की व्याख्या करता है ।।

Q2 . अध्याय में दिए गए न्याय के तीन सिद्धांतों की संक्षेप में चर्चा करो ।। प्रत्येक को उदाहरण के साथ समझाइये ।।

उत्तर : विभिन्न प्रकार के न्याय अनेक सिद्धांत उनके अनुसार बनाए गए है जो निम्नलिखित है :

1 . समान के लिए समान व्यवहार समान के लिए समान व्यवहार अति महत्वपूर्ण और आवश्यक माना जाता है यह अपेक्षया स्वीकार किया जाता है की व्यक्ति कुछ है विशेषतायें मानव जाति के रूप में दिखाता है, इसलिए प्रत्येक समान दशाओं में समान व्यवहार कायम करता है ।। अधिकांश क्षेत्रों में जिसमे हम समानता के व्यवहार की आशा करते है, ये निम्नलिखित है

नागरिक अधिकार

• सामाजिक अधिकार

• राजनितिक अधिकार

समान के लिए समान व्यवहार का एक अन्य पहलु यह है की वर्ग जाति या लिंग के आधार पर किसी प्रकार का भेदभाव नहीं होना चाहिए | प्रत्येक व्यक्ति को उसके प्रतिभा और कौशल के कार्य पर मुल्यांकन करना चाहिए ।।

1 . आनुपातिक न्याय आनुपातिक न्याय से तात्पर्य यह है कि लोगों को वेतन और गुण में एक अनुपात होना चाहिए कर्तव्य और पुरस्कार का निर्धारण करना चाहिए और परिभाषित करना चाहिए वास्तविक न्याय के लिए आधुनिक समाज में समान व्यवहार का सिद्धांत आनुपातिक सिद्धांत से संतुलित करने की आवश्यकता है ।।

2 . विशेष आवश्यकता की पहचान यह लोगों की विशेष आवश्यकताओं के संदर्भ में पहचान करती है जब किसी को पुरस्कार या कार्य वितरित किया जाता है तो हमें अपनाया जाता है ।। कभी-कभी हमें न्याय के लिए संशोधित उपायों का सहारा लेना पड़ता है और लोगों के साथ विशेष व्यवहार करना पड़ता है ।। इसको ही विशेष आवश्यकता की पहचान कहते है इसे असंतुलन को संतुलन करना भी कहा जाता है |

Q3 . क्या विशेष जरूरतों का सिद्धांत सभी के साथ समान बरताव के सिद्धांत के विरुद्ध है?

उत्तर : समान रूप से समाज के साथ व्यवहार लागू हो सकता है कि लोग जो कुछ दृष्टियो से समान नहीं है उन्हें विभिन्न प्रकार से विचार कर सकते हैं शारीरिक योग्यतायें आयु सफलता की कमी अच्छी शिक्षा या स्वास्थ्य आदि कुछ महत्त्वपूर्ण कारक है जो विशेष व्यवहार के रूप में विचार किया जा सकता है यदि दोनों समूहों के लोगों या सामान्य लोग और अपंग व्यक्तियों को विशेष मदद या उनकी कुछ आवश्कताएं पूरी की जा सके तो इससे न्याय की आवश्यकता की पूर्ति होगी परन्तु यह न्याय से अलग या समान न्याय नहीं होगा |

Q4 . निष्पक्ष और न्यायपूर्ण वितरण को युक्तिसंगत आधार पर सही ठहराया जा सकता है ।। रॉल्स ने इस तर्क को आगे बढ़ाने में ‘अज्ञानता के आवरण’ के विचार का उपयोग किस प्रकार किया ।।

उत्तर : जॉन रॉल्स ने इस प्रश्न का उत्तर देने का प्रयास किया है ।। वह तर्क करते हैं कि निष्पक्ष और न्यायसंगत नियम तक पहुँचने का एकमात्र रास्ता यही है कि हम खुद को ऐसी परिस्थिति में होने की कल्पना करें जहाँ हमें यह निर्णय लेना है कि समाज को कैसे संगठित किया जाय ।। हम नहीं जानते कि किस किस्म के परिवार में हम जन्म लेंगे, हम ‘उच्च’ जाति के परिवार में पैदा होंगे या ‘निम्न’ जाति में, धनि होंगे या गरीब, सुविधा संपन्न होंगे या सुविधाहीन |

रॉल्स कहते हैं कि अगर हमें यह नहीं मालूम हो, कि हम कौन होंगे और भविष्य के समाज में हमारे लिए कौन से विकल्प खुले होंगे, तब हम भविष्य के उस समाज के नियमों और संगठन के बारे में जिस निर्णय का समर्थन करेंगे, वह तमाम सदस्यों के लिए अच्छा होगा ।।

रॉल्स ने इसे ‘अज्ञानता के आवरण’ में सोचना कहा है ।। वे आशा करते हैं कि समाज में अपने संभावित स्थान और हैसियत के बारे में पूर्ण अज्ञानता की हालत में हर आदमी, आमतौर पर जैसे सब करते हैं, अपने खुद के हितों को ध्यान में रखकर फैसला करेगा ।। क्योंकि कोई नही जानता कि वह कौन होगा और उसके लिए क्या लाभप्रद होगा, इसलिए हर कोई सबसे बुरी स्थिति के मद्देनजर समाज की कल्पना करेगा ।। खुद के लिए सोच-विचार कर सकने वाले व्यक्ति के सामने यह स्पष्ट रहेगा कि जो जन्म से सुविधसंपन्न हैं, वे कुछ विशेष अवसरों का उपभोग करेंगे ।। लेकिन दुर्भाग्य से यदि उनका जन्म समाज के वंचित तबके में हो जहाँ वैसा कोई अवसर न मिले, तब क्या होगा? इसलिए, अपने स्वार्थ में काम करने वाले हर व्यक्ति के लिए यही उचित होगा कि वह संगठन के ऐसे नियमों के बारे में सोचे जो कमजोर तबके के लिए यथोचित अवसर सुनिश्चित कर सके ।। इस प्रयास से दिखेगा कि शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास जैसे महत्त्वपूर्ण संसाधन सभी लोगों को प्राप्त होगे – चाहे वे उच्च वर्ग के हो या न हों ।।

Q5 . आम तौर पर एक स्वस्थ और उत्पादक जीवन जीने के लिए व्यक्ति की न्यूनतम बुनियादी ज़रूरतें क्या मानी गई है? इस न्यूनतम को सुनिश्चित करने में सरकार की क्या जिम्मेदारी है?

उत्तर : एक समाज उस समय अन्यायपूर्ण माना जाता है जब व्यक्ति व्यक्ति में अंतर इतना बड़ा होता है जो उनके न्यूनतम आवश्यताओं के पहुंच के संदर्भ में प्रयाप्त नहीं होता है इसलिए एक न्यायपूर्ण समाज को लोगों के न्यूनतम मूल आवश्यकताओं के साधन उपलब्ध करना चाहिए | जिससे लोग स्वस्थ सुरक्षित जीवन जी सके तथा अपने प्रतिभा का विकास कर सके ।। लोगों को समाज में सम्मानजनक स्थान प्राप्त करने के लिए समान अवसर भी उपलब्ध कराना चाहिए ।।

लोगों को आवश्यकतायें जो जीवन की मिल न्यूनतम दशायें होती है संचालन के लिए विभिन्न सरकारों द्वारा विभिन्न प्रकार के उपाय किये गए है इससे अंतर्राष्ट्रीय संगठनों – विश्व स्वास्थ्य संगठन और राष्ट्रिय सेवा योजना का भी महत्त्वपूर्ण योगदान है इन आवश्यकताओं में स्वास्थ्य, आवास, खान पान, पेय जल, शिक्षा और न्यूनतम मजदूरी आदि शामिल है ।।

Q6 . सभी नागरिकों को जीवन की न्यूनतम बुनियादी स्थितियाँ उपलब्ध कराने के लिए राज्य की कार्यवाई को निम्न में से कौन-से तर्क से वाजिब ठहराया जा सकता है? (क) गरीब और ज़रूरतमदों को निशुल्क सेवाएँ देना एक धर्म कार्य के रूप में न्यायोचित है ।।

उत्तर : लोगों के जीवन की न्यूनतम दशायें उपलब्ध कराने में राज्य के कार्यों के सम्बन्ध में न्यायसंगत है ।।

(ख) सभी नागरिकों को जीवन का न्यूनतम बुनियादी स्तर उपलब्ध करवाना अवसरों की समानता सुनिश्चित करने का एक तरीका है ।।

उत्तर: सभी नागरिकों को मूल न्यूनतम स्तर की जीविका अवसरों की समानता की दृष्टि से एक तरफा है ।।

(ग) कुछ लोग प्राकृतिक रूप से आलसी होते हैं और हमें उनके प्रति दयालु होना चाहिए ।।

उत्तर : सभी नागरिकों को मूल न्यूनतम स्तर की जीविका अवसरों की समानता की दृष्टि से एक तरफा है

(छ) सभी के लिए बुनियादी सुविधाएँ और न्यूनतम जीवन स्तर सुनिश्चित करना साझी मानवता और मानव अधिकारों की स्वीकृति है ।।

उत्तर : सभी नागरिकों के लिए मूल सुविधाएं और न्यूनतम स्तर की जीविका प्रदान करना मानवता और मानव अधिकार की पहचान है ।।

अतिरिक्त प्रश्नोत्तर :

Q1 . आनुपातिक न्याय के विचार से आप क्या समझते है ?

उत्तर : आनुपातिक न्याय से तात्पर्य यह है कि लोगों को वेतन और गुण में एक अनुपात होना चाहिए | कर्तव्य और पुरस्कार का निर्धारण करना चाहिए और परिभाषित करना चाहिए | वास्तविक न्याय के लिए आधुनिक समाज में समान व्यवहार का सिद्धांत आनुपातिक सिद्धांत से संतुलित करने की आवश्यकता है ।।

Q2 . न्याय का अर्थ क्या है ?

उत्तर : न्याय शब्द की उत्पति ‘जस’ से हुई है जिसका अर्थ है “किसी को देना” | परन्तु किसी को देने की अवधारणा समाज में विभिन्न होती है उदाहरण के लिए समय के एक विन्दू पर महिलाओं को समाज में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त था परन्तु कालांतर में इसकी उपेक्षा की गई और उनकी स्थिति ख़राब हो गयी तथा विभिन्न प्रकार की यातनाएं दी जाने लगी | अब न्याय के विचार के लिए सत्यता, ईमानदारी, निष्पक्षता, समान अवसर, समान व्यवहार और आवश्यकताओं की पूर्ति आदि आवश्यक माने गए है ।।

जे एस मिल के अनुसार,

‘न्याय में ऐसा कुछ अंतर्निहित है जिसे करना न सिर्फ सही है और न करना सिर्फ गलत बल्कि जिस पर बतौर अपने नैतिक अधिकार कोई व्यक्ति विशेष हमसे दावा जता सकता है ।। ‘

प्लेटो के अनुसार,

न्याय के अंतर्गत प्रत्येक वर्ग को अपने क्षेत्र में कार्यों की उपलब्धि और दूसरी के कार्यों में हस्तक्षेप न करना ही न्याय है ।।

मार्क्सवादी के अनुसार,

न्याय की अवधारणा की दृष्टि से अलग है और किसी का उचित स्थान का विचार भी अलग है | वह पूँजीवादी व्यवस्था से अच्छी तरह से परिचित था जो अन्याय पर आधारित था | इसलिए उसने न्याय की अलग आवश्यकताएं बताई | उसने अपने न्याय की योजना में सुझाव दिया की उत्पादन के साधनों और वितरण पर सामूहिक स्वामित्व होना चाहिए | इसी के साथ प्रत्येक व्यक्ति की मिल आवश्यकताओं को पूर्ति होनी चाहिए |

Q3 . न्याय पर जान रॉल के सिद्धांत की व्याख्या कीजिए |

उत्तर : जॉन रॉल्स के सिद्धांत के अनुसार, निष्पक्ष और न्यायसंगत नियम तक पहुँचने का एकमात्र रास्ता यही है कि हम खुद को ऐसी परिस्थिति में होने की कल्पना करें जहाँ हमें यह निर्णय लेना है कि समाज को कैसे संगठित किया जाय ।। हम नहीं जानते कि किस किस्म के परिवार में हम जन्म लेंगे, हम ‘उच्च’ जाति के परिवार में पैदा होंगे या ‘निम्न’ जाति में, धनि होंगे या गरीब, सुविधा संपन्न होंगे या सुविधाहीन |

रॉल्स कहते हैं कि अगर हमें यह नहीं मालूम हो, कि हम कौन होंगे और भविष्य के समाज में हमारे लिए कौन से विकल्प खुले होंगे, तब हम भविष्य के उस समाज के नियमों और संगठन के बारे में जिस निर्णय का समर्थन करेंगे, वह तमाम सदस्यों के लिए अच्छा होगा ।।

रॉल्स ने इसे अज्ञानता के आवरण’ में सोचना कहा है ।। वे आशा करते हैं कि समाज में अपने संभावित स्थान और हैसियत के बारे में पूर्ण अज्ञानता की हालत में हर आदमी, आमतौर पर जैसे सब करते हैं, अपने खुद के हितों को ध्यान में रखकर फैसला करेगा ।। क्योंकि कोई नही जानता कि वह कौन होगा और उसके लिए क्या लाभप्रद होगा, इसलिए हर कोई सबसे बुरी स्थिति के मद्देनजर समाज की कल्पना करेगा ।। खुद के लिए सोच-विचार कर सकने वाले व्यक्ति के सामने यह स्पष्ट रहेगा कि जो जन्म से सुविधसंपन्न हैं, वे कुछ विशेष अवसरों का उपभोग करेंगे ।। लेकिन दुर्भाग्य से यदि उनका जन्म समाज के वंचित तबके में हो जहाँ वैसा कोई अवसर न मिले, तब क्या होगा? इसलिए, अपने स्वार्थ में काम करने वाले हर व्यक्ति के लिए यही उचित होगा कि वह संगठन के ऐसे नियमों के बारे में सोचे जो कमजोर तबके के लिए यथोचित अवसर सुनिश्चित कर सके ।। इस प्रयास से दिखेगा कि शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास जैसे महत्त्वपूर्ण संसाधन सभी लोगों को प्राप्त होगे- चाहे वे उच्च वर्ग के हो या न हों ।।

Q4 . मुक्त बाजार के लक्षणों का वर्णन कीजिए ।।

उत्तर: मुक्त बाजार के समर्थकों का मानना है कि जहाँ तक संभव हो, व्यक्तियों को संपत्ति अर्जित करने व के लिए तथा मूल्य, मजदूरी और मुनाफे के मामले में दूसरों के साथ अनुबंध और समझौतों में शामिल होने के लिए स्वतंत्र रहना चाहिए ।। उन्हें • लाभ की अधिकम मात्रा हासिल करने हेतु एक दुसरे के साथ प्रयोगिता करने की छूट होनी चाहिए| यह मुक्त बाजार का सरल चित्रण है ।। मुक्त बाजार के समर्थक मानते हैं कि अगर बाजारों को राज्य के हस्तक्षेप से मुक्त कर दिया जाय, तो बाजारी कारोबार का योग कुल मिलाकर समाज में लाभ और कर्त्तव्यों का न्यायपूर्ण वितरण सुनिश्चित कर देगा ।। इससे योग्यता और प्रतिभा से लैस लोगों को अधिक प्रतिफल मिलेगा जबकि अक्षम लोगों को कम हासिल होगा ।। उनकी मान्यता है कि बाजारी वितरण का जो भी परिणाम हो, वह न्यायसंगत होगा ।।

Q5 . न्याय ‘एक को देने से है ।। व्याख्या कीजिए ।।

उत्तर : न्याय शब्द की उत्पति ‘जस’ से हुई है जिसका अर्थ है “किसी को देना” | परन्तु किसी को देने की अवधारणा समाज में विभिन्न होती है ।। उससे क्या संबंधित है, एक व्यक्ति को क्या प्राप्त करना चाहिए और उसका समाज में क्या स्थान है तथा उसे कौन सा अधिकार प्राप्त होना चाहिए परन्तु एक को देने को क्या होना चाहिए और क्या आवश्यकताएं है ।।

उदाहरण के लिए

महिलाओं को समाज में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त था परन्तु कालांतर में इसकी उपेक्षा की गई और उनकी स्थिति ख़राब हो गयी तथा विभिन्न प्रकार की यातनाएं दी जाने लगी | भारतीय संविधान के अनुसार महिलाओं को पुरुषों के बराबर अधिकार दिए गए है जससे महिला अपना विकास कर सके अब न्याय के विचार के लिए सत्यता, ईमानदारी, निष्पक्षता, समान अवसर, समान व्यवहार और आवश्यकताओं की पूर्ति आदि आवश्यक माने गए है |

Q6 . सामाजिक न्याय से आप क्या समझते हैं ?

उत्तर : सामाजिक न्याय का अर्थ है कि समाज में प्रत्येक व्यक्ति का महत्व है | समाज में जाति, धर्म, वर्ण, आदि के आधार पर भेदभाव न किया जाये | दास प्रथा के समय दासों को अन्य नागरिकों से हे समझा जाता था भारत में लम्बे समय तक अछूतो को समाज का उपेक्षित अंग समझा जाता था विश्व के अनेक भागों में अब भी समाज में स्त्रियों की स्थिति पुरुषों के सामान नने है ।। ये सब सामाजिक अन्याय की स्थितिया है | सामाजिक न्याय का स्थिति में सबको समाज में उचित स्थान होता है ।।

Q7 . भारतीय संविधान कुछ प्रावधानों का विवरण दीजिए जिनका उद्देश्य सामाजिक न्याय का निर्माण है ?

उत्तर : भारतीय संविधान निर्माताओं ने सामाजिक न्याय को बढ़ावा देने के लिए निम्निलिखित प्रावधानों की व्यवस्था की है :

(i) मूल अधिकार

(ii) रोजगार, शिक्षा संस्थाओं और वैधानिक संस्थाओं, संसद और विधान सभाओं में आरक्षण का प्रावधान

(iii) छुआछूत का निवारण

(iv) राजनितिक के निति निर्देशक सिद्धांत

Q8 . डा . बी . आर . अम्बेडकर के अनुसार एक आदर्श समाज की क्या स्थिति थी ?

उत्तर : डा . बी . आर . अम्बेडकर के अनुसार एक आदर्श समाज वह है जिसमे उच्च और निम्न दृष्कोंण आपस में मिल जाते हैं और एक नये मिश्रित समाज का निर्माण होता है ।।

Q9 . विशेष ज़रूरतों का सिद्धांत सभी के साथ समान बरताव के सिद्धांत के विरुद्ध है? कैसे समझायें ।।

उत्तर : समान रूप से समाज के साथ व्यवहार लागू हो सकता है कि लोग जो कुछ दृष्टियो से समान नहीं है उन्हें विभिन्न प्रकार से विचार कर सकते है | शारीरिक योग्यतायें आयु सफलता की कमी अच्छी शिक्षा या स्वास्थ्य आदि कुछ महत्त्वपूर्ण कारक है जो विशेष व्यवहार के रूप में विचार किया जा सकता है ।। यदि दोनों समूहों के लोगों सामान्य लोग और अपंग व्यक्तियों को विशेष मदद या उनकी कुछ आवश्कताएं पूरी की जा सके तो इससे न्याय की आवश्यकता की पूर्ति होगी परन्तु यह न्याय से अलग या समान न्याय नहीं होगा|

Q10 . भारतीय संविधान में सामाजिक समानता को बढ़ावा देने के लिए किस प्रकार के प्रावधान किये गए है ?

उत्तर: हमारे देश में सामाजिक समानता को बढ़ावा देने के लिए संविधान ने छुआछूत की प्रथा का उन्मूलन किया और यह सुनिश्चित किया कि ‘निचली’ कही जाने वाली जातियों के लोगों को मंदिरों में प्रवेश, नौकरी और पानी जैसी बुनियादी ज़रूरतों से न रोका जा सके ।।

मुख्य बिन्दू : :

प्राचीन भारतीय समाज में न्याय धर्म के साथ जुड़ा था और धर्म या न्यायोचित सामाजिक व्यवस्था कायम रखना राजा का प्राथमिक कर्त्तव्य माना जाता था ।।

समाज में सामाजिक न्याय पाने के लिए सरकारों को यह सुनिश्चित करना होता है कि कानून और नीतियाँ सभी व्यक्तियों पर निष्पक्ष रूप से लागू हों ।।

हमारे देश में सामाजिक समानता को बढ़ावा देने के लिए संविधान ने छुआछूत की प्रथा का उन्मूलन किया और यह सुनिश्चित किया कि ‘निचली’ कही जाने वाली जातियों के लोगों को मंदिरों में प्रवेश, नौकरी और पानी जैसी बुनियादी ज़रूरतों से न रोका जा सके ।।

रॉल्स के अनुसार नैतिकता नहीं बल्कि विवेकशील चिंतन हमें समाज में लाभ और भार के वितरण के मामले में निष्पक्ष होकर विचार करने की ओर प्रेरित करता है ।। डॉ . भीम राव अंबेदकर के अनुसार, न्यायपूर्ण समाज वह है, जिसमें परस्पर सम्मान की बढ़ती हुई भावना और अपमान की घटती हुई भावना मिलकर एक करुणा से भरे

समाज का निर्माण करें ।। जे . एस . मिल के अनुसार, न्याय में ऐसा कुछ अंतर्निहित है जिसे करना न सिर्फ सही है और न करना सिर्फ गलत बल्कि जिस पर बतौर अपने नैतिक अधिकार कोई व्यक्ति विशेष हमसे दावा जता सकता है ।। ‘

अज्ञानता के आवरण वाली स्थिति की विशेषता यह है कि उसमें लोगों से सामान्य रूप से विवेकशील मनुष्य बने रहने की उम्मीद बंधती है ।।

• रॉल्स ने इसे ‘अज्ञानता के आवरण’ में सोचना कहा है ।। वे आशा करते हैं कि समाज में अपने संभावित स्थान और हैसियत के बारे में पूर्ण अज्ञानता की हालत में हर आदमी, आमतौर पर जैसे सब करते हैं, अपने खुद के हितों को ध्यान में रखकर फैसला करेगा ।।

पारिश्रमिक या कर्त्तव्यों का वितरण करते समय लोगों की विशेष ज़रूरतों का ख्याल रखने का सिद्धांत है ।। इसे सामाजिक न्याय को बढ़ावा देने का तरीका माना जा सकता है ।।

• समान अधिकारों के अलावा समकक्षों के साथ समान बरताव के सिद्धांत के लिए ज़रूरी है, कि लोगों के साथ वर्ग, जाति, नस्ल या लिंग के आधर पर भेदभाव न किया जाए ।। उन्हें उनके काम और कार्यकलापों के आधर पर जाँचा जाना चाहिए, इस आधार पर नहीं कि वे किस समुदाय के सदस्य हैं ।।

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