UP BOARD SOLUTION FOR CLASS 12TH SAMANY HINDI CHAPTER 4 अशोक के फूल

UP BOARD SOLUTION FOR CLASS 12TH SAMANY HINDI CHAPTER 4 अशोक के फूल

UP BOARD SOLUTION FOR CLASS 12TH SAMANY HINDI CHAPTER 4 अशोक के फूल
पाठ - 4 अशोक के फूल का सम्पूर्ण हल 

1- आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का जीवन-परिचय देते हुए हिन्दी साहित्य में उनका स्थान स्पष्ट कीजिए ।।


उत्तर – – जीवन परिचय- शुक्लोत्तर युग के सुप्रसिद्ध लेखक आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का जन्म बलिया जिले के “दूबे का छपरा” नामक ग्राम में सन् 1907 ई० में हुआ था ।। इनके पिता का नाम अनमोल द्विवेदी तथा माता का नाम ज्योतिकली देवी था ।। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा गाँव के ही स्कूल में हुई ।। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से इन्होंने साहित्य और ज्योतिषाचार्य की परीक्षा उत्तीर्ण की ।। “शान्ति-निकेतन” में इन्होंने संस्कृत व हिन्दी के अध्यापक पद को सुशोभित किया ।। रवीन्द्रनाथ टैगोर से जब इनकी भेंट हुई, तब उन्हीं से साहित्य-सृजन की प्रेरणा इन्हें प्राप्त हुई ।। “विश्व भारती” का सम्पादन इनकी ही लेखनी से हुआ ।। सन् 1949 ई० में लखनऊ विश्वविद्यालय द्वारा इनको “डी. लिट” की उपाधि प्रदान की गई ।। ये पंजाब विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग के अध्यक्ष व प्रोफेसर भी रहे ।। हिन्दी साहित्य में इनके महत्वपूर्ण योगदान के कारण भारत सरकार द्वारा इन्हें सन् 1957 ई० में “पद्मभूषण” से सम्मानित किया गया ।। सन् 1958 ई० में ये राष्ट्रीय-ग्रन्थ न्यास के सदस्य बने ।। “कबीर” नामक कृति पर इन्हें मंगलाप्रसाद पारितोषिक प्रदान किया गया ।। 19 मई 1979 ई० को साहित्य का यह महान् साधक चिर-निद्रा में लीन हो गया ।। हिन्दी साहित्य में स्थान- आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी की कृतियाँ हिन्दी-साहित्य की शाश्वत् निधि हैं ।। इनके निबन्धों और आलोचनाओं में उच्चकोटि की विचारात्मक क्षमता के दर्शन होते हैं ।। हिन्दी-साहित्य जगत में इन्हें एक विद्वान समालोचक, निबन्धकार एवं आत्मकथा लेखक के रूप में ख्याति प्राप्त है ।। यह महान व्यक्तित्व साहित्य-क्षेत्र में युगों-युगों तक अमर रहेगा ।।

2- आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी की भाषा-शैली की विशेषताएँ बताइए ।।

उत्तर – – भाषा-शैली- द्विवेदी जी अपनी बात को सहज-स्वाभाविक रूप में कहते थे ।। इन्होंने ऐसी भाषा का प्रयोग नहीं किया, जो बनावटी अथवा प्रयासजन्य हो ।। इनकी भाषा में बोलचाल की भाषा की ही प्रधानता रही है ।। बोलचाल की भाषा के माध्यम से इन्होंने गम्भीर तथ्यों को भी आसानी से प्रस्तुत कर दिया है ।। द्विवेदी जी के स्मृति-कोश में शब्दों का असीम भण्डार था ।। इन्होंने सभी प्रचलित भाषाओं के शब्दों का प्रयोग करके हिन्दी को समृद्ध बनाया ।। ऐसी शब्दावली को इन्होंने हिन्दी की प्रकृति के अनुकूल बनाकर ही प्रयुक्त किया है ।। द्विवेदी जी ने संस्कृत शब्दावली को प्रायः तत्सम रूप में ही स्वीकार किया है; जैसेप्रारम्भ, क्रियमाण, भण्डार, भग्नावशेष, औत्सुक्य, सलज्ज, अवगुण्ठन आदि ।। द्विवेदी जी ने अपनी अभिव्यक्ति को गहनता के साथ प्रस्तुत करने, भाषा को लोकप्रिय, सरस एवं मनोरंजक बनाने तथा अपने मत के समर्थन के लिए संस्कृत, हिन्दी, बाँग्ला आदि भाषाओं की सूक्तियों का प्रयोग भी पर्याप्त रूप में किया है ।। द्विवेदी जी ने लोकोक्तियों और मुहावरों का आवश्यकतानुसार प्रयोग किया है ।। मुहावरों और लोकोक्तियों को इन्होंने स्थानीय बोलचाल की भाषा से ग्रहण किया है ।। इससे इनकी भाषा की व्यंजना-शक्ति में व्यापकता आई है ।। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने विभिन्न विषयों पर आधारित निबन्धों की रचना की है ।। इनके ये निबन्ध अनेक शैलियों में लिखे गए हैं ।। इनका व्यक्तित्व इनकी शैलियों में पूर्ण रूप से मुखरित हुआ है ।।

द्विवेदी जी ने शोध और पुरातत्व से संबधित निबन्धों की रचना गवेषाणात्मक शैली में ही की है ।। इस शैली पर आधारित निबन्ध साहित्यिक गरिमा से परिपूर्ण है ।। साहित्य के विभिन्न पक्षों पर विचार करते समय तथा शब्दों के नाम-गोत्र, कुशल-क्षेम का पता लगाने में आचार्य द्विवेदी की गवेषणात्मकता विशेष रूप से दिखाई देती है ।। गम्भीर स्थलों पर जब प्रसंग में आत्मीयता उत्पन्न होती है अथवा जब द्विवेदी जी प्रसंग के साथ स्वयं को जोड़ना चाहते हैं, तब इनकी शैली आत्मपरक हो गई है ।। इस शैली में सहजता, सहृदयता और काव्यात्मकता के गुण विद्यमान हैं ।। द्विवेदी जी के साहित्यिक, धार्मिक तथा सांस्कृतिक निबन्धों में विचारात्मक शैली का विशेष प्रयोग हुआ है ।। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की शैली के समान ही इनकी शैली गम्भीर तथा विचार-प्रधान है; किन्तु शुक्ल जी की शैली में जहाँ गुम्फन है, वही द्विवेदी जी की शैली में विशदता और व्यापकता है ।। द्विवेदी जी ने विषय को सरस बनाने के लिए कहीं-कहीं वर्णनात्मक शैली का भी प्रयोग किया है ।। बौद्धिकता के कारण अनेक स्थलों पर द्विवेदी जी द्वारा प्रयुक्त वाक्यों ने सूत्रों का रूप धारण कर लिया है ।। सूत्रात्मक शैली के फलस्वरूप इनके द्वारा प्रयुक्त कथनों में विलक्षणता और चमत्कार की सृष्टि हुई है ।। द्विवेदी जी ने कहीं कहीं अभिव्यक्ति को चमत्कार प्रदान करने के लिए आलंकारिक शैली का भी प्रयोग किया है ।। साहित्यकारों और प्रचलित साहित्यिक प्रवृत्तियों पर मीठी चुटकियाँ लेते हुए द्विवेदी जी ने व्यंग्यात्मक शैली का भी प्रयोग किया है ।।

3- आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी की कृतियों का उल्लेख कीजिए ।।


उत्तर – – हजारीप्रसाद द्विवेदी जी की मुख्य कृतियाँ निम्नलिखित हैं
निबन्ध संग्रह- साहित्य के साथी, कुटज, अशोक के फूल, विचार और वितर्क, कल्पलता, आलोक-पर्व, विचार-प्रवाह आदि ।।
उपन्यास- पुनर्नवा, अनामदास का पोथा, चारू-चन्द्र लेख, बाणभट्ट की आत्मकथा ।।
सम्पादित ग्रन्थ- पृथ्वीराज रासो, सन्देश रासक, नाथ व सिद्धों की बानियाँ ।।
आलोचना- हिन्दी-साहित्य की भूमिका, नाथ सम्प्रदाय, सूरदास और उनका काव्य, सूर-साहित्य, हिन्दी-साहित्य का आदिकाल, कबीर, कालिदास की लालित्य-योजना, साहित्य का मर्म, भारतीय वाङ्मय ।।
अनूदित रचनाएँ- प्रबन्ध-कोष, पुरातन-प्रबन्ध-संग्रह, विश्व-परिचय, प्रबन्ध-चिन्तामणि, मेरा बचपन, लाल कनेर आदि ।।
इतिहास- हिन्दी साहित्य की भूमिका, हिन्दी साहित्य, हिन्दी साहित्य का आदिकाल ।।

1- निम्नलिखित गद्यावतरणों की ससन्दर्भ व्याख्या कीजिए


(क) लेकिन पुष्पित अशोक ……………………….……….. कर सकता हूँ ।।

सन्दर्भ- प्रस्तुत गद्यावतरण हमारी पाठ्यपुस्तक ‘गद्य गरिमा” के “आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी” द्वारा लिखित “अशोक के फूल” नामक निबन्ध से अवतरित है ।।
प्रसंग- वर्तमान में भारतीय संस्कृति में अशोक के वृक्ष की उपेक्षा के माध्यम से आचार्य द्विवेदी जी ने प्राचीन संस्कृति के प्रति अपनी चिन्ता प्रस्तुत अवतरण में व्यक्त की है ।।

व्याख्या-द्विवेदी जी कहते हैं कि कभी भारतीय संस्कृति में अत्यधिक आदरित अशोक के वृक्ष को आज जब मैं पुष्पित देखता हूँ तो उसे देखकर मेरा मन उदास हो जाता है ।। वे अपनी उदासी का कारण स्पष्ट करते हुए लिखते हैं कि मैं इसलिए उदास नहीं हूँ कि अशोक के पुष्प अत्यधिक सुन्दर हैं और उनकी सुन्दरता से मुझे कोई ईर्ष्या हो रही है, इसलिए मैं उसकी कमियों का अन्वेषण कर उसे अभागा बताकर उससे सहानुभूति प्रदर्शित करने का प्रयास करते हुए स्वयं को उससे सुन्दर अथवा सर्वगुणसम्पन्न बताकर अपने मन को सुखी बना रहा हूँ ।। यद्यपि संसार में इस प्रकार दूसरों में दोष निकालकर स्वयं पर प्रसन्न अथवा आनन्दित होनेवाले लोगों की कमी नहीं है, किन्तु मैं उन लोगों में से नहीं हूँ, जो दूसरों में दोष निकालकर स्वयं को उनसे श्रेष्ठ सिद्ध करके स्वयं पर खुश होते हैं ।। ऐसे लोगों पर व्यग्य करते हुए द्विवेदीजी कहते हैं कि ये लोग बड़ी दूर तक की सोचनेविचारनेवाले होते हैं ।। ये किसी व्यक्ति के अतीत की तो एक-एक परत को उघाड़ते ही है, उनके भविष्य की मृत्युपर्यन्त तक की सम्भावनाओं-दुर्भावनाओं की विवेचन लोगों के सम्मुख प्रस्तुतकर उन्हें सब प्रकार से दीन-हीन प्रमाणित करने का प्रयत्न करते हैं ।। लेकिन मैं इतनी दूर तक की नहीं सोचता हूँ; क्योंकि मुझे भविष्य में देखने का अवकाश ही नहीं मिलता है अथवा मैं लोगों के भविष्य में झाँकने में स्वयं को असमर्थ पाता हूँ ।। लेखक कहते हैं कि यद्यपि मैं दूसरों के भविष्य को भी देखनेवालों की तरह बुद्धिमान् अथवा विचारशील नहीं हूँ, फिर भी इस फूल को देखकर मैं उदास हो जाता हूँ ।। मेरी इस उदासी का वास्तविक कारण तो मेरे मन में बसनेवाले परमपिता परमात्मा ही जानते होंगे, किन्तु अपनी उदासी के कारण का थोड़ा-बहुत अनुमान तो मुझे अवश्य है ।।

साहित्यिक सौन्दर्य-1-लेखक ने स्वयं को अन्य लोगों से कम दूरदर्शी बताकर अपनी उदारता और महानता का परिचय दिया है ।। उसकी यह भावना महाकवि कालिदास से प्रेरित है; क्योंकि “रघुवंशम् महाकाव्य में उन्होंने भी स्वयं अल्पबुद्धि बताया है


क: सूर्यप्रभवो वंशः क्व चाल्पविषया मतिः ।।
तितीर्घर्दुस्तरं मोहादुडुपेनास्मि सागरम्॥


2- भाषा- संस्कृत शब्दावली से युक्त सरल खड़ीबोली ।।
3- शैली- व्यंग्यात्मक ।।
4- वाक्य-विन्यास- सुगठित,
5- शब्दचयन-विषय के अनुरूप,
6-गुण- प्रसाद,
7-शब्द-शक्ति-अभिधा और लक्षणा ।।

(ख) भारतीय साहित्य में ……………………………………सुकुमारता हैं ।।

सन्दर्भ- पहले की तरह
प्रसंग- प्राचीनकाल में भारतीय साहित्य और जनजीवन में अशोक के वृक्ष का क्या और कितना महत्व था, इसका विवेचन प्रस्तुत गद्यावतरण में किया गया है ।।

व्याख्या-द्विवेदी जी अशोक के वृक्ष की महता पर प्रकाश डालते हुए कहते हैं कि प्राचीन भारतीय साहित्य में अशोक के वृक्ष का पर्याप्त उल्लेख मिलता है ।। अनेक ग्रन्थों में उसके महत्व का प्रतिपादन किया गया है ।। साहित्य क्योंकि समाज का दर्पण होता है; अत: साहित्य में अशोक की महत्ता के प्रतिपीदन से यह स्वयं सिद्ध हो जाता है कि तत्कालीन जनजीवन में अशोक को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त था ।। इसके बाद के साहित्य में अशोक के वृक्ष का उल्लेख प्रायः नहीं मिलता, जिससे स्पष्ट हो जाता है कि बाद में जनजीवन में भी अशोक का कोई महत्व नहीं रह गया था ।। साहित्य और जनजीवन दोनों में इस प्रकार से अशोक का प्रवेश करना और फिर अचानक उससे बाहर हो जाना लेखक को ठीक वैसा ही प्रतीत होता है, जैसे किसी नाटक में कोई पात्र अचानक मंच पर प्रवेश करता है और फिर अचानक ही नाटक से बाहर आ जाता है ।। कालिदासकालीन साहित्य में अशोक का प्रचुरता में उल्लेख मिलता है ।।

लेखक का मानना है कि यह कहना तो कठिन है कि इससे पहले भारतवर्ष में अशोक का नाम कोई नहीं जानता था, किन्तु इतना निश्चित है कि उसका महत्व जनजीवन में नगण्य ही था ।। कालिदास ने अपने काव्य-ग्रन्थों में अशोक की जैसी मोहक छटा और कोमलता (सुकुमारता) का वर्णन किया है, वैसा वर्णन इससे पहले के साहित्य में कहीं नहीं मिलता ।। इससे पहली यदि कहीं उसका उल्लेख मिलता भी है तो केवल नाममात्र के लिए ।। भारतीय साहित्य में अशोक का यह प्रवेश (वर्णन) इतना मोहक और आकर्षक है, जितना मोहक और आकर्षक दृश्य किसी नई नवेली दुल्हन के प्रथम गृह-प्रवेश का होता है ।। जिस प्रकार नई-नवेली दुल्हन का घर में प्रथम आगमन अत्यन्त गरिमापूर्ण पवित्र, निश्छल और नवयौवन की कोमलता (नजाकत और नसाफत) के साथ है, वैसा ही गरिमापूर्ण, पवित्र और सुकोमल वर्णन करके कालिदास ने अशोक का भारतीय साहित्य में प्रवेश कराया है ।।

साहित्यिक सौन्दर्य- 1- भारतीय साहित्य में अशोक के वर्णन की गौरवशाली परम्परा कालिदास से आरम्भ होती है, इसका वर्णन लेखक ने आलंकारिकता के साथ किया है ।।
2- “भारतीय साहित्य में, और इसलिए जीवन में भी” इस वाक्यांश के द्वारा लेखक ने ‘साहित्य समाज का दर्पण होता है” इस सिद्धान्त की पुष्टि की है ।। 3- भाषा- संस्कृत शब्दावली से युक्त सरल-सरस खड़ीबोली ।।
4-शैली- विवेचनात्मक एवं आलंकारिक ।।

(ग) अशोक के जोसम्मान………………………………………………. क्यों ऐसा हुआ?


सन्दर्भ- पहले की तरह
प्रसंग- प्रस्तुत गद्यावतरण में आचार्य द्विवेदी जी ने इस बात का विवेचन किया है कि महाकवि कालिदास ने किस प्रकार अशोक का वर्णन अपने साहित्य में करके उसे अत्यधिक सम्मान का अधिकारी बनाया ।।

व्याख्या- द्विवेदी जी बताते हैं कि संस्कृति-कवि कालिदास ने अशोक का अत्यधिक वर्णन करके उसे तत्कालीन समाज में सम्मानित स्थान दिलाया ।। इससे पहले किसी भी साहित्यकार ने अशोक को अपना वर्ण्य-विषय नहीं बनाया था ।। कालिदास ने न केवल अशोक की सुन्दरता का वर्णन किया, वरन् उसके चामत्कारिक प्रभावों का विवेचन भी अपने संस्कृत ग्रन्थों में किया ।। उनकी मान्यता के अनुसार अशोक पर तभी पुष्प आते थे, जब कोई अत्यन्त सुन्दर और कोमलांगी युवती अपने मृदु एवं संगीतमय नुपूरवाले चरणों का प्रहार उस पर करती थी ।। अशोक के फूलों की कोमलता, मोहकता और कामोत्तेजक गुणों के कारण सुन्दरियाँ उन्हें अपने कानों का आभूषण बनाती थीं ।। अशोक-फूलों का यह आभूषण जब उनके गालों पर झूलता था तो उनकी मोहकता में अपरिमित वृद्धि हो जाया करती थी ।। वे अपनी काली-नीली वेणी (चोटी) में जब अशोक-पुष्पों को गूंथती थीं तो उनकी चंचल लटाओं की शोभा को ये पुष्प सौ गुना बढ़ाकर उन्हें ऐसा मनोमुग्धकारी रूप प्रदान करते थे ।। कि देखनेवाले की दृष्टि उन चंचल लटाओं से भी स्थिरता को प्राप्त कर लेती थी ।। अर्थात् देखनेवाले की दृष्टि उनसे हटती ही नहीं थी ।। अशोक के कामोत्तेजक गुणों के कारण ही भगवान् महादेव का हृदय उसके प्रति क्षोभ(क्रोध) से भर गया था ।। इसी कारण वियोगी राम भी उसकी पुष्पित लता को अपनी प्रिया के स्तन समझकर उसका आलिंगन करने को उद्यत हो गए थे ।। यह काम के देवता मनोज के एक संकेत पर ऊर्ध्व भाग को इतना कामुक बना देता है, जिसे देखकर ऐसा लगता है कि मानो व्यक्ति के कन्धों पर साक्षात् अशोक का वृक्ष ही फूट पड़ा है ।। किन्तु यह अशोक अचानक ही ऐसे गायब हो गया है जैसे कोई अभिनेता रंगमंच पर आकर, लोगों को अभिभूत कर, रोमांचित कर अचानक मंच से चला गया हो ।। सहृदय कवियों और लेखकों ने उसे क्यों भुला दिया? इस बात का द्विवेदी जी को बहुत दुःख है ।।

साहित्यिक सौन्दर्य-1- भारतीय साहित्य में महाकवि कालिदास ने प्रायः अपने सभी ग्रन्थों में अशोक का अतिशययुक्त वर्णन किया है ।। अशोक का ऐसा वर्णन इससे पहले के साहित्य में नहीं हुआ है ।।
2- अशोक-पुष्पों की कामोत्तेजक विशेषता को कालिदास ने सर्वत्र रेखांकित किया है ।।
3- कालिदास ने अभिज्ञानशाकुन्तलम्, मालविकाग्निमित्रम्, कुमारसम्भवम् एवं रघुवंशम् में अशोक की गद्यांश में वर्णित विशेषताओं का वर्णन किया है ।।
4- भाषा- प्रवाहपूर्ण संस्कृतनिष्ठ खड़ी बोली ।।
5- शैलीविवेचनात्मक ।।

(घ) कंदर्प-देवता के ……………………………….तो अपमान करके ।।

सन्दर्भ- पहले की तरह
प्रसंग- प्रस्तुत गद्यावतरण में लेखक ने अशोक के फूल के प्रति मन में उत्पन्न भावनाओं को व्यक्त करते हुए कालिदास के परवर्ती काव्य से अशोक के गायब होने पर अपना क्षोभ (दुःख) प्रकट किया है ।।

व्याख्या- आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी जी कहते हैं कि भारतीय काव्य-वाङ्मय में कामदेव के पाँच पुष्प-बाणों में अशोक के पुष्प-बाण के अतिरिक्त अन्य समस्त बाणों का सम्मान आज भी वैसा ही है, जैसा पहले हुआ करता था ।। अरविन्द का फूल किसी भी कवि के द्वारा भुलाया नहीं गया, आम्र-पुष्प भी किसी कवि के द्वारा छोड़ा नहीं गया और नीचे कमल की महिमा तो कभी कम हुई ही नहीं ।। चमेली के पुष्प की अब नव-साहित्यिकों में कोई विशेष रुचि नहीं है, लेकिन इसका सम्मान तो पहले भी इससे अधिक नहीं था ।। लेकिन अशोक के फूल को तो भुला ही दिया गया है ।। हजारों वर्षों तक यह पुष्प काव्य-जगत् से दूर रहा ।। किसी ने भी उसकी ओर देखने का अर्थात् उसके सम्बन्ध में कुछ लिखने का साहस नहीं किया ।। मेरे मन में बार-बार विचार उठते रहते हैं कि इतना सुन्दर पुष्प क्या वास्तव में भुला देने की वस्तु था?

लेखक का मन आज से हजारों वर्ष पूर्व के उस भारतीय साहित्य पर न्योछावर होता है, जिसमें अशोक-पुष्प के मोहक वर्णन की रसिकता विद्यमान थी ।। लेखक के मन में यह टीस है कि कालिदास के परवर्ती काव्य में जिस प्रकार से अशोक को भुला दिया गया है, वह कोई स्वस्थ परम्परा नहीं है ।। इस पर लेखक अपना क्षोभ व्यक्त करता हुआ कहता है कि इसलिए लगता है कि कवियों के हृदयों से कोमलता की भावना लुप्त हो गयी थी, अन्यथा उनकी कविता इस प्रकार रूखी न होतीं उनकी रसिकता इस प्रकार सो न गयी होती ।। पुनः लेखक कहता है कि वह इस बात को नहीं मान सकता कि साहित्य से अशोक की उपेक्षा इसलिए की गयी होगी कि साहित्यिक पाठकवर्ग में रसिकता मर गयी थी, इसलिए उसमें अशोक की सुकुमारता के प्रति अरुचि उत्पन्न हो गयी होगी ।। इसके लिए लेखक केवल कविवर्ग को उत्तरदायी मानता है और उसकी दृष्टि में उनका यह कृत्य क्षम्य नहीं है ।। इन कवियों और लेखकों ने एक ओर अक्षम्य कृत्य करके जल पर नमक छिड़कने का कार्य किया है कि उन्होंने लहरदार पत्तियों वाले उस वृक्ष को अशोक के नाम से प्रतिष्ठित कर दिया, जिस पर फूल भी नहीं खिलते ।। उत्तर-भारतीय साहित्यिकों का अशोक के प्रति यह अपमानपूर्ण व्यवहार किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है ।। उन्होंने अशोक का वर्णन अपनी कृतियों में नहीं किया, इससे लेखक के मन को उतनी पीड़ा नहीं हुई जितनी पीड़ा अशोक के नाम से किसी अन्य वृक्ष को प्रतिष्ठत करने से हुई है ।।

साहित्यिक सौन्दर्य- 1- अशोक के पुष्प को कामदेव के पंच पुष्प बाणों में से एक बताया गया है ।।
2- उत्तर भारत में जिस वृक्ष को अशोक के नाम से जाना जाता है, कालिदास के साहित्य में वर्णित अशोक वृक्ष उससे अलग है ।।
3- लोक-जीवन में किस प्रकार परम्पराएँ विलुप्त होती हैं और नयी परम्पराएँ प्रतिष्ठित होती हैं, उनकी प्रक्रिया को अशोक के रूप में किसी निफूले वृक्ष को प्रतिष्ठित किए जाने के माध्यम से प्रकट किया है ।।
4- भाषा- सरल, मुहावरेदार, प्रवाहपूर्ण और साहित्यिक खड़ी बोली ।।
5- शैली-आलोचनात्मक और विवेचनात्मक ।।

(ङ) पंडितों ने शायद ……………………………………..हार मानने वाले जीवनथे ।।

सन्दर्भ- पहले की तरह
प्रसंग- इन पंक्तियों में लेखक ने गन्धर्व और कन्दर्प शब्द की समानता तथा विभिन्न धर्मों और उनके अनुयायियों से अशोक के फूल की सम्बद्धता को स्पष्ट किया है ।।


व्याख्या- आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का कहना है कि उनके पूर्ववर्ती विद्वानों द्वारा गन्धर्व और कन्दर्प शब्द को एक ही अर्थ का बोधक तथा भिन्न-भिन्न उच्चारणों को ध्वनित करने वाला माना है ।। गन्धर्वो को वर्तमान में देवताओं की एक योनि माना जाता है और कन्दर्प को काम के अधिष्ठाता कामदेव का एक पर्याय-वाचक ।। कामदेव ने यदि अपने अस्त्रों के लिए अशोक का चयन किया तो इसे निश्चित रूप से आर्य सभ्यता से अलग किसी अन्य सभ्यता की देन माना जाना चाहिए ।। इसका कारण यह है कि आर्यों के अतिरिक्त जो जातियाँ अथवा सभ्यताएँ भारतभूमि पर विद्यमान थीं, उनके द्वारा पूजित देवताओं में जल के अधिष्ठाता वरुण, धन के अधिष्ठाता कुबेर तथा देवताओं के स्वामी वज्र को धारण करने वाले इन्द्र थे ।। वर्तमान समय में काम के अधिष्ठाता कामदेव का ही एक नाम कन्दर्प भी है, तथापि यह तो निश्चित ही है कि कन्दर्प शब्द गन्धर्व का ही पर्याय है; अर्थात् दोनों ही एक ही अर्थ का बोध कराते हैं ।। भारतीय वाङ्मय में उल्लेख है कि ये एक बार भगवान शिव के पास उनको विजित करने की दृष्टि से गए, लेकिन जल गए, ये विष्णु से भी बहुत भयभीत रहते थे और भगवान बुद्ध से भी युद्ध कर पराजित हो वापस लौट आए थे ।। लेकिन ये ऐसे देवता थे, जो अपनी पराजय स्वीकार ही नहीं करते थे ।।


साहित्यिक सौन्दर्य-1- भारत में प्रचलित विभिन्न धर्मो और मतों के शीर्ष पुरुषों द्वारा पराजित होने पर भी कन्दर्प देवता द्वारा उनके अनुयायियों को पराजित किए जाने का वर्णन साहित्यिक शब्दावली में किया गया है ।।
2- मनुष्य-योनि में काम की सर्वव्यापकता का संकेत किया गया है ।।
3- भाषा- तत्सम शब्दों से युक्त सरल, सहज और प्रवाहयुक्त खड़ी बोली ।।
4-शैलीवर्णनात्मक और विश्लेषणात्मक ।। 5- वाक्य-विन्यास- सुगठित ।।
6- शब्द-चयन- विषय के अनुरूप ।।
7- गुण- प्रसाद ।।
8-शब्द-शक्ति- अभिधा, लक्षणा और व्यंजना ।।

(च) जहाँ मूठ थी ………………………………………………………………फूलों में बदल गया ।।


सन्दर्भ- पहले की तरह
प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश में विभिन्न प्रकार के पुष्पों के निर्मित होने की साहित्यिक प्रक्रिया पर प्रकाश डाला गया है ।।

व्याख्या-किसी एक विषय को प्रारम्भ कर अनेक विचारों को स्पर्श करने की कला में निपुण आचार्य द्विवेदी जी का कथन है कि वह निश्चित ही कोई बुरा मुहूर्त था, जब मन को मथने वाले कामदेव के ध्यान मग्न भगवान् शिव की समाधि को भंग करने के लिए उन पर अपने फूलों वाले धनुष से बाण का प्रहार किया था ।। परिणाम यह हुआ कि कामदेव का शरीर भगवान् शंकर के क्रोध से भस्मीभूत हो गया और वामन पुराण के षष्ठ अध्याय के अनुसार उसका रत्नमय धनुष टुकड़े-टुकड़े होकर धरती पर गिर गया ।। उसका मूठ वाला भाग जो रुकम अर्थात् सुवर्ण से बना था- वह चम्पे का फूल बन गया ।। हीरे से बना नाह अर्थात् बन्धन वाला भाग मौलसरी के मन को हारने वाले फूलों में बदल गया ।। इन्द्रनील मणियों से बना धनुष का कोटि वाला भाग अर्थात् अग्र-भाग टूटकर पाटल के फूलों में बदल गया ।। कामदेव के धनुष का मध्य भाग जो चन्द्रकान्त गणियों से निर्मित था, वह टूटकर चमेली के फूलों और विद्रम से बना नीचे का किनारा भाग टूटकर बेला के पुष्पों में परिवर्तित हो गया ।। जिस अत्यन्त कठोर धनुष ने स्वर्ग पर विजय पायी थी वहीं जब धरती पर गिरा तो उसने कोमल फूलों का रूप धारण कर लिया ।। WWW.UPBOARDINFO.IN

साहित्यिक सौन्दर्य- 1- भाषा- परिष्कृत साहित्यिक खड़ी बोली ।।
2- शैली- भावात्मक ।।
3- शब्द-चयन- विषय के अनुकूल ।।
4- वाक्य-विन्यास- सुगठित ।।
5- विचार-विश्लेषण- धरती का स्पर्श इतना महत्वपूर्ण है, जो दैवीय साधनों को और भी अधिक सुन्दरता और कोमलता प्रदान करता है ।।

(छ) कहते हैं, दुनिया………………………………. अखाड़ा ही तो है ।।

WWW.UPBOARDINFO.IN
सन्दर्भ- पहले की तरह
प्रसंग-साहित्यिकों ने अशोक के पुष्प को भुला दिया है, इसी पर अपने विचार व्यक्त करते हुए द्विवेदी जी कहते हैं

व्याख्या- यह संसार बड़ा स्वार्थी है ।। इसलिए यह उन्हीं बातों को याद रखता है, जिनसे उसका कोई स्वार्थ सिद्ध होता है, अन्यथा व्यर्थ की स्मृतियों से यह आपको बोझिल नहीं बनाना चाहता ।। यह उन्हीं वस्तुओं को याद रखता है, जो उसके दैनिक जीवन की स्वार्थ-पूर्ति में सहायता पहुँचाती है ।। बदलते समय की दृष्टि में अनुपयोगी होने पर कोई वस्तु उपेक्षित हो जाती है ।। समय-परिवर्तन के साथ अशोक की भी मूल्यवती उपयोगिता नष्ट हो गई है ।। सम्भवतः इसीलिए मनुष्य को उसकी आवश्यकता ही नहीं रह गई, फिर अकारण उसे स्मरणकर वह अपनी स्मरण शक्ति को क्यों खर्च करता? सारा संसार स्वार्थ के विविध कार्य-व्यापारों से भरा हुआ एक क्रीडा-स्थल ही तो है ।।

साहित्यिक सौन्दर्य-1- संसार को स्वार्थी सिद्ध किया गया है ।।
2- अशोक को विस्मृत करने का आधार स्वार्थ-वृत्ति को माना गया है ।।
3- भाषा- सरल, सरस एवं साहित्यिक खड़ी बोली है ।।
4-शैली- व्याख्यात्मक एवं सूत्रात्मक ।।

(ज) मुझे मानव-जाति ………………………………………भी पवित्र है ।।


सन्दर्भ- पहले की तरह
प्रसंग- प्रस्तुत गद्यांश में लेखक मानव के जीने की इच्छा-शक्ति की बलवत्ता पर प्रकाश डाल रहे हैं ।।

व्याख्या- आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी जी कह रहे हैं कि मानव-जाति के विकास के हजारों वर्षों के इतिहास के मनन और चिन्तन के परिणामस्वरूप उन्होंने जो अनुभव किया है वह यह है कि मनुष्य में जो जिजीविषा है वह अत्यधिक निर्मम और मोह-माया के बन्धनों से रहित है ।। सभ्यता और संस्कृति के जो कतिपय व्यर्थ या मोह थे, उन सबको रौंदती हुई व सदैव आगे बढ़ती चली गई ।। मानव जीवन की इस धारा ने विभिन्न धर्मों द्वारा प्रतिपादित अनगिनत आचरणों, विश्वासों, उनसे सम्बद्ध उत्सवों और व्रतों को अपने में समा लिया या परिष्कृत करते हुए आगे ही बढ़ती चली गई ।। ऐसे ही अनेकानेक संघर्षों के परिणामस्वरूप मनुष्य सदैव नवीन शक्ति अर्जित करता रहा है ।। वर्तमान समय में समाज का जैसा भी स्वरूप हमारे सामने है वह अनगिनत स्वीकृतियों और त्याग का परिणाम है ।। आशय यह है कि मनुष्य ने अपने विकास-क्रम में जो कुछ उचित समझा उसे स्वीकार कर लिया और जिसे अनुचित समझा उसका त्याग कर दिया ।। जाति और देश की जो संस्कृति है, वह बाद की ही बात है; अर्थात् इसका विकास तो मनुष्य के विकास के बाद ही हुआ है ।। लेखक का कहना है कि आज जो कुछ भी हमारे सम्मुख उपलब्ध है, उनमें मिलावट है, वह सब कुछ शुद्ध नहीं है ।। शुद्ध केवल एक ही चीज है और वह है मनुष्य के जीने की दुर्दमनीय इच्छा अर्थात् जिजीविषा ।। यह मात्र मनुष्य की जिजीविषा ही है कि जिससे आज मनुष्य विभिन्न क्षेत्रों में ऊँचा और ऊँचा उठता ही चला जा रहा है ।। जिस प्रकार गंगा की अबाधित-अविरल धारा सब कुछ को अपने में समाहित करती हुई, आज भी पवित्र है और आगे बढ़ती ही चली जा रही है, वैसे ही मनुष्य की दुर्दमनीय जिजीविषा भी है, जो कि अपने विकास-मार्ग में आए पवित्रअपवित्र, ग्राह्य-अग्राह्य सभी को समाहित करती हुई अबाधित रूप से अपने पवित्र स्वरूप में सतत आगे बढ़ती ही जा रही है ।। WWW.UPBOARDINFO.IN

साहित्यिक सौन्दर्य-1- मनुष्य की इच्छा-शक्ति को निर्मम, प्रबल और पवित्र बताया गया है ।।
2- इच्छा-शक्ति की तुलना गंगा की धारा से की गयी है और इसे पवित्र घोषित किया गया है ।।
3- भाषा- तत्सम शब्दों से युक्त सरल, सहज और प्रवाहयुक्त खड़ी बोली ।।
4- शैली- वर्णनात्मक और विश्लेषणात्मक ।।
5- वाक्य-विन्यास- सुगठित ।।
6- शब्द-चयन- विषय के अनुरूप ।।
7-गुण- प्रसाद ।। 8- शब्द-शक्ति- अभिधा और लक्षणा ।।

(झ) आज जिसे हम……………………………………धरतीधसकेगी ।।


सन्दर्भ- पहले की तरह WWW.UPBOARDINFO.IN
प्रसंग-प्रस्तुत पंक्तियों में लेखक बताना चाहता है कि संसार में सब कुछ परिवर्तनशील है; क्योंकि सभी नवीन को ग्रहण करना और प्राचीन को छोड़ना चाहते हैं ।।

व्याख्या- आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी जी का कहना है कि आज जिस संस्कृति को हम मूल्यवान् मानते हैं और जिसे अपने जीवन में अपनाना उचित और श्रेयस्कर समझते है; क्या यह संस्कृति सदैव ऐसी ही बनी रहेगी, इसमें कोई परिवर्तन नहीं आएगा ।। सम्राटों और सामन्ती व्यवस्था के शीर्ष पुरुषों ने जिस आचरण और निष्ठा को अत्यधिक मोहक और मादक स्वरूप प्रदान किया था, वह व्यवस्था भी आज लुप्त हो चुकी है ।। प्राचीन धर्मों के श्रेष्ठ पुरुषों ने ज्ञान और वैराग्य को जनसामान्य के लिए सर्वोत्तम और ग्रहण करने योग्य बताया, वह मान्यता भी आज समाप्त हो चुकी है ।। मध्यकालीन मुस्लिम संस्कृति के अनुयायी धनाढ्यों के अनुसरण करते हुए सामान्य लोगों में जो भोगवादी प्रवृत्ति पनपी थी, वह भी भाप के समान उड़ गयी ।। वर्तमान व्यावसायिक युग में जो आज कमल-पुष्प के सदृश दीख रहा है, वह मध्यकालीन संस्कृति के विनष्ट हो चुके आधार पर अवस्थित है, यह भी स्थायी नहीं रहेगा, समाप्त हो जाएगा ।। महाकाल अर्थात् सबसे शक्तिशाली समय के परिवर्तन होने के कारण पृथ्वी खिसकेगी और जो कुछ भी वर्तमान में विद्यमान है उसका कुछ-न-कुछ भाग हमेशा अपने साथ ले जाएगी ।। WWW.UPBOARDINFO.IN

साहित्यिक सौन्दर्य- 1- विभिन्न उदाहरणों के माध्यम से लेखक ने यह स्पष्ट किया है कि सब कुछ परिवर्तनशील है ।।
2- भाषा-संस्कृतनिष्ठ शब्दों से युक्त जनसामान्य में प्रयुक्त खड़ी बोली ।।
3- शैली- वर्णनात्मक, विचारात्मक व उद्धरणात्मकं
4- वाक्य-विन्यास- सुगठित ।।
5- शब्द-चयन- विषय के अनुरूप ।।
6- गुण- प्रसाद ।।
7- शब्द-शक्ति- अभिधा और लक्षणा ।।
8- भावसाम्य- महात्मा कबीर ने भी ऐसी ही भावना व्यक्त करते हुए संसार को काल का चबैना बताया है

झूठे सुख को सुख कहैं, मानता है मन मोद
जगत चबैना काल का, कछु में कछु गोद॥

(ञ) मगर उदास होना………………………………….मस्ती में हँस रहा है ।।


सन्दर्भ- पहले की तरह प्रसंग-प्रस्तुत गद्यावतरण में मनुष्य की बदलती मनोवृत्ति के परिणाम की विवेचना की गई है ।।

व्याख्या- आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी कहते हैं कि व्यक्ति का किसी भी परिस्थिति में उदास अथवा व्याकुल होना व्यर्थ ही होता है; क्योंकि उसकी यह उदासी अथवा व्याकुलता उन परिस्थितियों में कोई परिवर्तन नहीं ला सकती ।। उसकी किसी समस्या का निराकरण भी उसकी उदासी से नहीं हो सकता, फिर उदास होकर जीने से क्या लाभ? सम्भवतः यही सोचकर अशोक ने उदास होना छोड़ दिया है ।। वह प्रत्येक परिस्थिति में मस्त रहता है ।। आज से दो हजार वर्ष पूर्व कालिदास के समय में, जब वह समाज के द्वारा समादरित होने पर जैसा प्रसन्नचित्त रहता था, वैसा ही प्रसन्नचित्त वह आज अनादरित होकर है ।। उसकी प्रवृत्ति, रूप-स्वरूप में किसी प्रकार का कोई विकार उत्पन्न नहीं हुआ है और न ही उसमें किसी नई प्रवृत्ति का विकास हुआ है ।। भले ही अशोक में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है, किन्तु मनुष्य की मनोवृत्तियों में तो आमूल-चूल परिवर्तन हो गया है ।। यह उसकी परिवर्तित मनोवृत्ति का ही तो परिणाम है कि वह जिस अशोक वृक्ष को कभी अत्यन्त श्रद्धा और विश्वास के साथ अपने जीवन का अभिन्न अंग मानता था, आज उसी वृक्ष को वह बिलकुल ही भूल गया है ।। WWW.UPBOARDINFO.IN

द्विवेदी जी मनुष्य की मनोवृत्ति में परिवर्तन को अनिवार्य मानते हैं, इसलिए वे कहते हैं कि अशोक का काम तो बिना बदले चल गया, किन्तु मनुष्य का काम इससे नहीं चल सकता ।। यदि मनुष्य का काम बिना बदले चल सकता तो उसकी मनोवृत्ति कभी परिवर्तित न होती और आज भी मनुष्य सदियों पुराना जंगली आदिमानव ही होता ।। यदि आदिमानव के बाद की व्यावसायिक परिस्थिति में मनुष्य का जीवन स्थिर हो जाता तो आज उसमें भयंकर व्यावसायिक संघर्ष होता ।। यदि इसके बाद विज्ञान का मशीनी रथ अपने पूर्ण घर्घर नाद के साथ अपनी पूरी गति से दोड़ने लगता तो आज बड़ी विकट समस्या उत्पन्न हो जाती ।। लोगों के हाथों का रोजगार छिन जाता, केवल मुट्ठी भर लोग, जो मशीनों के संचालन में कुशल होते, सर्वसम्पन्न होते और शेष सम्पूर्ण समाज दीन-हीन अवस्था में होता ।। कुछ लोगों का मानना है कि हमारी संस्कृति पूर्ण रूप से परिवर्तित हो गयी है ।। वास्तव में उसमें पूर्ण परिवर्तन नहीं हुआ है ।। वह आंशिक रूप से ही परिवर्तित हुई है, लेकिन सतत परिवर्तनशील है ।। आशय यह है कि संस्कृति ने नवीनता को धारण किया, जो कमियाँ थी, उन्हें दूर किया और अच्छाईयों को ग्रहण किया ।। अशोक का फूल आज भी अपनी उसी पुरानी मस्ती में विहँस रहा है, वह अभी भी अपरिवर्तित है ।।

साहित्यिक-सौन्दर्य-1-लेखक ने उस समय की भारतीय विचारधारा का उल्लेख किया है, जब गाँधीयुग में सम्पूर्ण विश्व मशीनीकरण की ओर कदम तेजी से बढ़ा रहा था, किन्तु गाँधीजी के नेतृत्व में भारत ने मशीनों के स्थान पर मानव-श्रम को ही वरीयता दी ।।
2- लेखक ने आज के मशीनी वैज्ञानिक युग की कल्पना न की थी, अन्यथा वह विज्ञान की धीमी गति की बात न करता ।।
3- भाषा-सरल खड़ी बोली ।।
4-शैली- विवेचनात्मक ।। WWW.UPBOARDINFO.IN

2- निम्नलिखित सूक्तिपरक वाक्यों की ससन्दर्भ व्याख्या कीजिए

(क) वे बहुत दूरदर्शी होते हैं ।। जो भी सामने पड़ गया, उसके जीवन के अन्तिम मुहूर्त तक का हिसाब ले लगा लेते हैं ।।

सन्दर्भ- प्रस्तुत सूक्ति हमारी पाठ्यपुस्तक ‘गद्य गरिमा” में संकलित “अशोक के फूल” नामक निबन्ध से अवतरित है ।। इसके लेखक ‘आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी” जी हैं ।।
प्रसंग- द्विवेदी जी ने उन लोगों की प्रवृत्ति पर व्यंग्य करते हुए उनकी आलोचना की है, जो दूसरों को प्रसन्न और सम्पन्न देखकर ईर्ष्यावश उनकी निन्दा करते हैं ।।

व्याख्या- संसार में बहुत-से लोग ऐसे हैं, जिन्हें दूसरों की खुशी अथवा प्रसन्नता और सम्पन्नता किसी भी प्रकार अच्छी नहीं लगती ।। वे सदैव प्रसन्न लोगों से ईर्ष्या करते हुए उनकी आलोचना करके उन्हें स्वंय से निकृष्ट सिद्ध करना चाहते हैं ।। जिन लोगों में वे वर्तमान में ऐसा दोष नहीं ढूँढ पाते, जिसको लेकर वे उनकी आलोचना करें; ऐसे लोगों के विषय में उनके मरने तक की भविष्यवाणियाँ करके यह बताना चाहते हैं कि अमुक व्यक्ति बाहरीतौर पर ही देखने में अच्छा लगता है, किन्तु हृदय से बहुत खराब, दुष्ट अथवा पापी है, इसलिए इसका अन्त बहुत खराब होगा ।। यह कुत्ते की मौत मरेगा ।। इस प्रकार वह बहुत दूर दूसरों के भविष्यों में झाँककर उनके पाप-पुण्यों और स्वर्ग-नर्क तक का विवेचन कर देते हैं ।। इसीलिए लेखकों ने उन्हें व्यंग्य के रूप में दूरदर्शी कहा है ।।

(ख) उस प्रवेश में नववधू के गृह-प्रवेश की भाँति शोभा है, गरिमा है, पवित्रता है और सुकुमारता है ।।

सन्दर्भ- पहले की तरह
प्रसंग-प्रस्तुत सूक्तिपरक पंक्ति में लेखक ने अशोक के पुष्प की तुलना नववधू से की है ।।

व्याख्या- कालिदास से पहले अशोक के पुष्प को व्यक्ति नाममात्र ही जानते थे ।। कालिदास ने अपने काव्यों में इस पुष्प की गरिमामय उपस्थिति करायी ।। जिस प्रकार नववधू के घर में प्रवेश के पूर्व अर्थात् ससुराल में आगमन से पूर्व घर को अच्छी तरह से सजा सँवार कर उसकी गरिमा में वृद्धि की जाती है, उसकी पवित्रता बढ़ायी जाती है ।। उसी प्रकार कालिदास ने भी इस पुष्प को अपने काव्य में स्थान देकर उसकी गरिमा, पवित्रता और सुकुमारता को बनाए रखने का सफल प्रयास किया ।। निष्कर्ष रूप में कह सकते हैं कि कालिदास ने ही अपने काव्य में अशोक के पुष्प को सर्वप्रथम प्रतिष्ठित किया ।। WWW.UPBOARDINFO.IN

(ग) स्वर्गीय वस्तुएँ धरती से मिले बिना मनोहर नहीं होती ।।

सन्दर्भ- पहले की तरह
प्रसंग-प्रस्तुत सूक्ति वाक्य में पार्थिव सौन्दर्य की अनुपमता एवं महत्ता पर प्रकाश डाला है ।।

व्याख्या- इस संसार और परलोक में यदि कहीं मन को मोहनेवाला सौन्दर्य विद्यमान है तो वह इस धरती पर स्थित है ।। स्वर्ग के सौन्दर्य की तो हम केवल कल्पना करते हैं और वह कल्पना अपने सम्पूर्ण स्वरूप में पृथ्वी के सौन्दर्य से ही प्रेरित होती है ।। क्योकि हम कल्पना भी वही कर सकते है, जिसे हमने किसी-न-किसी रूप में अपनी आँखों से देखा हो ।। जब हम किसी अलौकिक अर्थात् स्वर्गीय सौन्दर्य की बात करते हैं तो निश्चय ही वह इस धरती पर कहीं-न-कहीं किसी रूप में उपस्थित होता ही है ।। पृथ्वी के सौन्दर्य की अनुपस्थिति में हम स्वर्गीय सौन्दर्य की बात नहीं कर सकते, भले ही वह किसी दूसरे लोक में विद्यमान हो ।। जिसे न हम अपनी आँखों से देख सकते हैं और न अपने हाथ से स्पर्श कर सकते हैं, ऐसे सौन्दर्य का हमारे लिए कोई महत्व नहीं, तब उसके होने या न होने से क्या लाभ? वह तो हमारी मिट्टी के समान तुच्छ है ।। उसका महत्व, उसका आकर्षण तभी सार्थक है, जब वह इस पृथ्वी पर उपस्थित हो और लोगों के मन को आकर्षित कर आह्लादित करता है ।। इसीलिए अमीर खुसरो ने भी “गैर फिरदौस वर-रु-जमी अस्त, हमीं अस्तो, हमीं अस्तो ।। ” कहकर कश्मीर के विषय में यह घोषणा की है कि यदि पृथ्वी पर स्वर्ग है तो यहीं है. यहीं है ।।

(घ) सारा संसार स्वार्थ का अखाड़ाही तो है ।।

WWW.UPBOARDINFO.IN
सन्दर्भ- पहले की तरह
प्रसंग- प्रस्तुत सूक्ति में लेखक ने अशोक के माध्यम से संसार की स्वार्थी प्रवृत्ति का वर्णन किया है ।।

व्याख्या- यह सारा संसार स्वार्थ के वशीभूत होकर ही अपने क्रिया-कलाप करता है ।। मनुष्य उसी कार्य को करता है, जिसमें उसका कोई हित-साधन छिपा होता है, जिसमें उसका कोई हित नहीं होता, उसके विषय में यह सोचता भी नहीं है ।। यहाँ तक कि धर्म-कर्म के कार्य भी उसके स्वार्थ से प्रेरित होते हैं; क्योंकि व्यक्ति को पता होता है कि इन कार्यों को करके उसको पुण्य की प्राप्ति होगी, जिसके परिणामस्वरूप मरने पर उसको मोक्ष मिलेगा ।। संसार की इसी स्वार्थी प्रवृत्ति के कारण लोगों ने अशोक को भुला दिया है ।। उन्हें ज्ञात है कि अशोक से उन्हें कोई लाभ होनेवाला नहीं है, फिर वे क्यों उसे याद रखें, क्यों उसका संरक्षण करें? आशय यह है कि मनुष्य की स्मरण-शक्ति उसके स्वार्थ से संचालित और प्रेरित है ।। यह संसार की परम्परा है कि लोग केवल उसी बात को याद रखते हैं, जिसमें उनका कोई स्वार्थ निहित होता है, जहाँ उनका स्वार्थ नहीं होता, वहाँ उनकी स्मरण शक्ति कुन्द हो जाती है और वे भुलक्कड़ बन जाते हैं ।।

(ङ) मनुष्य की जीवनी-शक्ति बड़ी निर्मम है, वह सभ्यता और संस्कृति के वृथा मोहों को रौंदती चली आ रही है ।।


सन्दर्भ- पहले की तरह प्रसंग- प्रस्तुत सूक्ति में जीवन के प्रति व्यक्ति के मोह का वर्णन किया गया है ।।
व्याख्या- इस संसार में व्यक्ति को यदि सबसे प्रिय कोई वस्तु है तो वह है उसके प्राण ।। अपने प्राणों को सुरक्षित बचाए रखने की लालसा के कारण ही यह संसार चल रहा है ।। व्यक्ति सदैव अपने प्राणों की रक्षा के लिए ही प्रयत्नशील रहता है ।। इनकी रक्षा के लिए वह कितना ही क्रूर, निर्मम, पापपूर्ण, घृणित कार्य कर सकता है ।। उसका अपने प्राणों के प्रति यही मोह उसकी सबसे बड़ी शक्ति है, जिसे जीवनी-शक्ति कहा जाता है ।। यदि व्यक्ति सीधे-सीधे अपने प्राणों की रक्षा नहीं कर पाता तो वह किसी के भी प्राण लेने में देरी नहीं लगाता ।। एक भूखा व्यक्ति अपने प्राणों की रक्षा के लिए एक टुकड़े को पाने के लिए कितने ही लोगों की जान ले सकता है, अपने प्राणों से प्रिय पुत्र, पुत्री अथवा पत्नी तक के मान-सम्मान अथवा प्राणों तक का सौदा करने में भी वह नहीं हिचकिचाता ।।
इसीलिए संस्कृत में भी कहा गया है भूखा क्या पाप नहीं करता- “बुभुक्षितः किं न करोति पापम् ।। “

(च) सबकुछ अविशुद्ध है ।। शुद्ध केवल मनुष्य की दुर्दम जिजीविषा ।।

सन्दर्भ- पहले की तरह ।।
प्रसंग- प्रस्तुत सूक्तिपरक पंक्ति में लेखक ने मनुष्य की जीवित रहने की इच्छा को ही पवित्र बताया है ।।

व्याख्या- आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी जी का कहना है कि जो कुछ भी उपलब्ध है, वह सब कुछ अविशुद्ध है ।। शुद्ध है मात्र मनुष्य की जीने की दुर्दमनीय इच्छा ।। दुर्दमनीय इच्छा से आशय मनुष्य की दबायी न जा सकने वाली इच्छाओं से है ।। मनुष्य की जीने की यह दुर्दमनीय इच्छा गंगा की अबाधित-अनाहत-अविरल धारा के समान सब कुछ को स्वयं में समाहित करती हुई उत्तरोत्तर आगे बढ़ती जाती है ।। इस अबाधित धारा में सब कुछ बह जाता है ।। वही कुछ क्षण तक संघर्ष कर पाता है, जिसकी जीवनी-शक्ति कुछ समर्थ होती है, कुछ विशुद्ध होती है ।। लेखक का कहना है कि मनुष्य की जिजीविषा के अतिरिक्त सब कुछ अपवित्र है अविशुद्ध है ।। यही कारण है कि प्रबल जिजीविषा वाला मनुष्य ही आगे बढ़ पाता है और शेष सब काल के गाल में समा जाते है ।। Survival of the fittest का सिद्धान्त लेखक की इस मान्यता की पुष्टि करता है ।।

(छ) महाकाल के प्रत्येक पदाद्यात में धरती धसकेगी ।।

सन्दर्भ- पहले की तरह
प्रसंग-संसार की नश्वरता के विषय में प्रस्तुत सूक्ति में प्रकाश डाला गया है ।।

व्याख्या- इस संस्था में सभी कुछ नाशवान् है ।। आज हमें जो कुछ भी देख रहा है, वह सब एक-न-एक दिन नष्ट हो जाएगा, चाहे वह सूर्य हो, चन्द्रमा हो अथवा पृथ्वी ।। समय का चक्र सभी को अपने आपमें समाहित कर लेता है, एक दिन यह पृथ्वी भी उसके प्रहार से बच न सकेगी ।। उसकी एक ही ठोकर से यह रसातल में धंस जाएगी अथवा खंड-खंड होकर नष्ट हो जाएगी ।।

अन्य परीक्षोपयोगी प्रश्न

WWW.UPBOARDINFO.IN


1- “अशोक के फूल” पाठ कासाराशं अपने शब्दों में लिखिए ।।

उत्तर – – अशोक के फूल निबन्ध आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के सामाजिक एवं सांस्कृतिक चिन्तन की परिणति है ।। भारतीय परम्परा में अशोक के फूल दो प्रकार के होते हैं ।। प्रथम-श्वेत पुष्प, जो तांत्रिक क्रियाओं की सिद्धि के लिए उपयोगी है तथा द्वितीय- लाल पुष्प, जो स्मृतिवर्धक होता है ।। लेखक कहते हैं कि कन्दर्प देवताओं ने भी इन लाल छोटे-छोटे फूलों को अपने पाँच तूणीरों में स्थान दिया था ।। परन्तु उनका मन इन फूलों को देखकर उदास है ।। इसका कारण यह नहीं है कि सौन्दर्य से युक्त वस्तुओं को वे अल्प भाग्य वाला मानते हैं और इसमें उन्हें आनन्द मिलता है ।। इस उदासी का कारण क्या है यह तो, उनके अंदर निवास करने वाला ईश्वर ही जानता था ।। इसका तो उन्हें बस कुछ अनुमान ही है ।।

लेखक कहते हैं कि भारतीय साहित्य तथा भारतीय जीवन में अशोक के फूल का प्रवेश और विलुप्त होना विचित्र नाटकीय स्थिति के समान है ।। कालिदास ने अपने काव्य में इस पुष्प को महत्वपूर्ण स्थान दिया ।। कालिदास ने इसे एक नववधू के गृहप्रवेश के समान भारतीय साहित्य में प्रवेश कराया ।। परन्तु भारत में मुस्लिम सल्तनत के प्रवेश ने इसकी प्रतिष्ठा को धूमिल कर दिया ।। ऐसा भी नहीं है कि लोग इसके नाम से परिचित नहीं थे और इसे महत्व नहीं देते थे, लेकिन इसे उसी प्रकार महत्व दिया जाता था, जैसे वर्तमान समय में भगवान बुद्ध और विक्रमादित्य को ।। सुन्दरियों के चरणों के मधुर आघात से अशोक का वृक्ष फूलों से खिल उठता था ।। इन पुष्पों को कानों में धारण करके सुंदरियाँ प्रसन्न होती थी तथा ये फूल सुंदरियों के बालों की शोभा बढ़ाते थे ।। यह पुष्प महादेव शिव तथा श्रीराम के मन में क्षोभ उत्पन्न कर देते थे ।। कंदर्प-देवताओं के तूणीर के अन्य बाणों का महत्व कवियों में अभी भी है इसे कोई नहीं भूला है ।। अरविन्द का फूल, आम्र-वृक्ष, नीला कमल की महिमा कभी खत्म नहीं हुई ।। चमेली के पुष्प में अब कोई विशेष रूचि नहीं है ।। मेरे मन में बार-बार यह विचार उत्पन्न होता है कि क्या यह फूल भुला देने योग्य था ।। WWW.UPBOARDINFO.IN

लेखक अशोक के फूल की उपेक्षा के लिए केवल कविवर्ग को उत्तरदायी मानता है और उनका यह कृत्य अक्षाम्य है ।। इन कवियों ने एक ऐसे लहरदार पत्तियों वाले वृक्ष को अशोक के नाम से प्रतिष्ठित करकर जिस पर फूल ही नहीं खिलते जले पर नमक छिड़कने का कार्य किया है ।। लेखक कहते हैं कि पूर्ववर्ती विद्वानों ने गन्धर्व और कन्दर्प शब्द को एक ही अर्थ का बोधक तथा भिन्न-भिन्न उच्चारणों को ध्वनित करने वाला माना है ।। यदि कामदेव देवताओं ने अशोक के फूल का चुना है तो इसे निश्चित रूप से आर्य सभ्यता से अलग किसी अन्य सभ्यता की देन माना जाना चाहिए ।। कंदर्प यद्यपि गन्धर्व का पर्याय है अर्थात् दोनों एक ही अर्थ का बोध कराते हैं ।। भारतीय वाङ्मय में उल्लेख है कि कामदेव शिव से लड़े, विष्णु से भयभीत रहते थे, भगवान बुद्ध से पराजित हुए परन्तु इन्होंने हार नहीं मानी ।। इन्होंने नए-नए अस्तों का प्रयोग किया और अशोक का फूल इनका अन्तिम अस्त था ।। इस अस्त ने बौद्ध धर्म को घायल कर दिया तथा शैवमार्ग को अभिभूत कर शक्ति साधना को झुका दिया ।।

लेखक ने इसमें रवीन्द्रनाथ टैगोर के विचारों को भी उद्धृत किया ।। जिन्होंने भारतवर्ष को अनेकों मानव जातियों के मिलन या विलीन होने के कारण ‘महामानवसमुद्र” कहा है ।। अनेकों संस्कृतियों के विचित्र एकत्रीकरण के कारण ही भारतीय संस्कृति को “अनेकता में एकता” की संस्कृति कहा जाता है ।। लेखक कहते हैं कि कामदेव ने शिव पर बाण फेंका जिसके कारण कामदेव शिव के क्रोध से भस्मीभूत हो गए तथा वामन पुराण के षष्ठ अध्याय के अनुसार उनका रत्नजड़ित धनुष टूटकर पृथ्वी पर गिर गया और चम्पे मौलसरी, पाटल, चमेली, बेला के पुष्पों में बदल गया ।। जिस कठोर धनुष ने स्वर्ग पर विजय पाई थी ।। पृथ्वी पर गिरकर वह कोमल पुष्पों में परिवर्तित हो गया ।। स्वर्ग की वस्तुएँ धरती से मिलने पर ही मनमोहक रूप धारण कर पाती है ।। परन्तु लेखक यह विचार करते हैं कि क्या वास्तव में ये पुष्प गन्धर्वो की ही देन है? क्या ये फूल उन्हीं से मिले हैं? द्विवेदी जी कहते हैं कि पुराने साहित्य में गन्धर्वो के देवता- कुबेर, सोम, अप्सराएँ देवताओं के रूप में वर्णित है ।। बौद्ध साहित्य में ये भगवान बुद्ध को बाधा देते बताए गए है ।। महाभारत में भी ऐसी कुछ कथाएँ वर्णित हैं, जिनमें स्त्रियाँ सन्तान प्राप्ति के लिए इन वृक्षों के देवता यक्षों के पास जाया करती थी ।। भरहुत, बोधगया तथा साँची आदि में उत्कीर्ण मूर्तियों में इन प्रकार के चित्र अंकित हैं ।। WWW.UPBOARDINFO.IN

अशोक कल्प के अनुसार अशोक के फूल दो प्रकार के होते हैं- सफेद एवं लाल ।। लेखक कहते हैं कि आर्य जाति बहुत गर्वीली थी उसने किसी जाति की आधीनतता स्वीकार नहीं की ।। सारा भारतीय साहित्य इन्हीं आर्यों की ही देन है परन्तु अशोक वृक्ष की पूजा गन्धर्वो और यक्षों की देन है ।। इस वृक्ष के पूजा के उत्सव में इनके अधिष्ठाता की पूजा की जाती थी जिसे “मदनोत्सव” कहते हैं ।। यह उत्सव त्रयोदशी के दिन मनाया जाता था ।। ‘मालविकाग्निमित्र” तथा “रत्नावली” आदि नाटकों में भी इस उत्सव का वर्णन मिलता है ।। प्राचीन समय में राजघरानों की रानियाँ भी अपने नुपुरमय चरणों के आघात से इस वृक्ष को पुष्पित किया करती थी ।। द्विवेदी जी कहते हैं कि संसार बड़ा स्वार्थी है ।। यह केवल उन्हीं बातों को याद रखता है, जिनसे उनका कोई स्वार्थ सिद्ध होता है ।। शायद समय-परिवर्तन से अशोक की उपयोगिता भी नष्ट हो गई है ।। इसलिए मनुष्य को उसकी आवश्यकता ही नहीं रइ गई ।।

अशोक का वृक्ष कितना भी मनोहर, रहस्यमय तथा अलंकारमय हो, किन्तु यह सदैव सामन्ती सभ्यता का प्रतीक रहा है, जो किसान-मजदूरों का शोषण करती रही है ।। परन्तु समय परिवर्तन हुआ तथा सामन्तों और पूँजीपतियों की बादशाहत समाप्त हो गई ।। सन्तान कामना करने वाली स्त्रियों को गन्धर्वो से शक्तिशाली देवताओं से वरदान प्राप्त होने लगे ।। लेखक कहते हैं कि मनुष्य में जो जिजीविषा है वह बहुत निर्मम है ।। सभ्यता और संस्कृति के जो कतिपय व्यर्थ बचपन थे, उन सबको रौंदती हुई वह सदैव आगे बढ़ती है ।। लेखक कहते हैं कि जो कुछ आज हमारे सामने है उस सबमें मिलावट है ।। वह शुद्ध नहीं है ।। केवल एक चीज शुद्ध है और वह है मनुष्य के जीने की दुर्दुमनीय इच्छा अर्थात् जिजीविषा ।।

द्विवेदी जी कहते हैं कि आज अशोक के फूल देखकर मेरा मन उदास हुआ है, कल जाने किस सहृदय का मन कोई वस्तु देखकर उदास हो जाए ।। द्विवेदी जी कहते हैं कि केवल अशोक के फूल नहीं अपितु किसलय भी हृदय को बींध रहे हैं ।। आज जिस संस्कृति को हम मूल्यवान समझ रहे हैं, क्या वह संस्कृति ऐसी ही बनी रहेगी, इसमें कोई परिवर्तन नहीं आएगा ।। मध्यकालीन संस्कृति के अनुयायी धनवानों के अनुसरण करते हुए सामान्य लोगों में उत्पन्न हुई भोगवादी प्रवृत्ति भी भाप बनकर उड़ गई ।। महाकाल अर्थात् सबसे शक्तिशाली समय के परिवर्तन से पृथ्वी खिसकेगी और जो कुछ भी वर्तमान में है उसका कुछ-न-कुछ भाग अपने साथ अवश्य ले जाएगी ।। भगवान बुद्ध ने काम विजय का उपदेश दिया परन्तु यक्षों के देवता वज्रपाणि इस वैराग्यप्रवण धर्म में घुसकर बोधिसत्वों के प्रमुख बन गए ।। त्रिरत्नों में कामदेव ने स्थान प्राप्त किया ।। परन्तु निराश होना भी व्यर्थ है, क्योंकि उसकी उदासी उन परिस्थितियों में कोई परिवर्तन नहीं ला सकती हैं ।। इसलिए यही सोचकर अशोक ने उदास होना छोड़ दिया ।। आज से दो हजार वर्ष पहले जैसा कालिदास से सम्मान पाकर वह प्रसन्न था ऐसा ही वह आज भी है ।। द्विवेदी जी कहते हैं कि कुछ लोग समझते हैं हमारी संस्कृति पूरी तरह परिवर्तित हो गई है, परन्तु वह पूर्ण नहीं आंशिक रूप से परिवर्तित हुई है ।। अशोक का फूल आज भी उसी मस्ती से हँस रहा है, वह आज भी अपरिवर्तित है ।। कालिदास ने अपने तरीके से इसका रसास्वादन किया था ।। मैं भी अपने तरीके से इसका आस्वादन कर सकता हूँ अर्थात् कालिदास जैसे विचारों के साथ ।। इसलिए उदास होना व्यर्थ है | WWW.UPBOARDINFO.IN

2- रवीन्द्रनाथ टैगोर ने भारतवर्ष को महामानवसमुद्र” क्यों कहा है?

उत्तर – – रवीन्द्रनाथ टैगोर ने भारतवर्ष को “महामानवसमुद्र” अर्थात् अनेकानेक मानव जातियों का मिलन या विलीन होने के स्थान कहा है क्योंकि इस अद्भुत देश में समय-समय पर असुर, आर्य, हूण, नाग, शक, यक्ष, गन्धर्व और अनेक मानव-जातियाँ आई और इसी भूमि में विलीन हो गईं ।। आज के भारतवर्ष का जो भी स्वरूप हमारे सम्मुख है वह इन्हीं मानव-जातियों द्वारा बनाया हुआ है ।।

3- वामन-पुराण के षष्ठ अध्याय से हमें क्या पता चलता है?
उत्तर – – वामन-पुराण के षष्ठ अध्याय से हमें पता चलता है कि शिव के क्रोध से कामदेव का शरीर भस्मीभूत् हो गया ।। और उसका रत्नमय धनुष टुकड़े-टुकड़े होकर धरती पर गिर गया ।। उसका मूठ वाला भाग जो सुवर्ण से बना था- वह चम्पे का फूल बन गया ।। हीरे से बना नाहा अर्थात् बन्धन वाला भाग मौलसरी के फूलों में बदल गया ।। इन्द्रनील मणियों से बना धनुष का कोटि भाग अर्थात् अग्र-भाग टूटकर पाटल के फूलों में बदल गया ।। चन्द्रकांत मणियों का बना हुआ मध्य भाग टूटकर चमेली के पुष्पों में परिवर्तित हो गया तथा विद्रुम से बना नीचे का किनारा भाग टूटकर बेला के फूलों में परिवर्तित हो गया ।।

4- कालिदास से अशोक को क्या सम्मान मिला?

उत्तर – – कालिदास ने जैसे अपने ग्रन्थों में अशोक के फूल की मोहक छटा और कोमलता का वर्णन किया है, वैसा वर्णन इससे पहले के साहित्य में कहीं नहीं मिलता ।। भारतीय साहित्य में अशोक का यह प्रवेश (वर्णन) इतना मोहक और आकर्षक है, जितना मोहक और आकर्षक दृश्य किसी नई नवेली दुल्हन के प्रथम गृह प्रवेश का होता है ।। जिस प्रकार नई-नवेली दुल्हन का घर में प्रथम आगमन अत्यन्त गरिमापूर्ण पवित्र, निश्छल और नवयौवन के साथ है, वैसा ही गरिमापूर्ण, पवित्र और सुकोमल वर्णन अपने ग्रन्थों में करके कालिदास ने अशोक को सम्मान दिया है ।।

5- “मदनोत्सव” किसे कहते हैं? यह उत्सव कब मनाया जाता था?

उत्तर – प्राचीन साहित्य में अशोक के वृक्ष के वृक्ष की पूजा के उत्सवों का वर्णन है ।। वास्तव में यह पूजा अशोक के वृक्ष की नहीं अपितु इसके अधिष्ठाता कामदेव की होती थी ।। इस पूजा के उत्सव को ही मदनोत्सव कहते हैं ।। महाराजा भोज के “सरस्वती कंठाभरण” के अनुसार यह उत्सव त्रयोदशी के दिन मनाया जाता था ।।

Leave a Comment

Your email address will not be published.

Scroll to Top