UP BOARD SOLUTION FOR CLASS 12TH SAMANY HINDI CHAPTER 7 NINDA RAS

UP BOARD SOLUTION FOR CLASS 12TH SAMANY HINDI CHAPTER 7 NINDA RAS

लेखक पर आधारित प्रश्न

1 . हरिशंकर परसाई जी का जीवन परिचय देते हुए हिन्दी साहित्य में इनके योगदान का वर्णन कीजिए ।।
उत्तर– – लेखक परिचय- श्री हरिशंकर परसाई का जन्म मध्य प्रदेश में इटारसी के निकट स्थित ‘जमानी’ नामक ग्राम में 22 अगस्त सन् 1924 ई० को हुआ था ।। प्रारम्भिक शिक्षा से लेकर स्नातक तक की शिक्षा मध्य प्रदेश में प्राप्त करने के बाद नागपुर विश्वविद्यालय से इन्होंने हिन्दी विषय में स्नातकोत्तर की परीक्षा उत्तीण की तथा कुछ समय तक अध्यापन-कार्य किया ।।
अध्यापन-कार्य करते हुए भी इन्होंने लेखन-कार्य को जारी रखा, किन्तु इन्हें ऐसा अनुभव हुआ कि नौकरी इनके साहित्यसृजन में बाधक है, तब इन्होंने अध्यापन-कार्य छोड़कर साहित्य-सृजन की ओर रूझान किया ।। इन्होंने जबलपुर से ‘वसुधा’ नामक साहित्यिक मासिक पत्रिका का सम्पादन व प्रकाशन किया; परन्तु आर्थिक क्षति के कारण इन्होंने इस पत्रिका का प्रकाशन बन्द कर दिया और ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’ व ‘धर्मयुग’ के लिए ही रचनाएँ लिखते रहे ।। 10 अगस्त सन् 1995 ई० को सरस्वती का यह वरद् पुत्र परलोकवासी हो गया ।। हिन्दी साहित्य में स्थान- परसाई जी ने व्यंग्यप्रधान निबन्धों की रचना बड़ी ही कुशलता के साथ की है ।। वस्तुत: हिन्दीसाहित्य में व्यंग्यप्रधान लेखन के अभाव को हरिशंकर परसाई जी ने दूर कर दिया ।। हरिशंकर परसाई हिन्दी-साहित्य के एक प्रतिष्ठित व्यंग्य-लेखक थे ।। मौलिक एवं अर्थपूर्ण व्यंग्यों की रचना में परसाई जी सिद्धहस्त रहे हैं ।। हास्य एवं व्यंग्यप्रधान निबन्धों की रचना करके, इन्होंने हिन्दी-साहित्य के एक विशिष्ट अभाव की पूर्ति की ।। इनके व्यंग्यों में समाज एवं व्यक्ति की कमजोरियों पर तीखा प्रहार मिलता है ।। आधुनिक हिन्दी-साहित्य जगत में व्यंग्यात्मक कृतियों में प्रणेता हरिशंकर परसाई का नाम सदैव अमर रहेगा ।।

  1. हरिशंकर परसाई जी की भाषा-शैली पर प्रकाश डालिए ।। ।।
    उत्तर– – भाषा-शैली- परसाई जी ने प्रायः सरल, सुबोध, प्रवाहमयी एवं बोलचाल की भाषा को अपनाया है ।। ये सरल एवं व्यावहारिक भाषा के पक्षपाती थे ।। इस कारण साधारण पाठक भी इन्हें आसानी से समझ सकता है ।। इनकी रचनाओं के वाक्य छोटे और व्यंग्यप्रधान हैं ।। इनके व्यंग्यों का विषय सामाजिक व राजनैतिक है ।। भाषा में प्रयुक्त होने योग्य शब्दों का चुनाव परसाई जी बहुत सोच-समझकर करते थे ।। कहाँ पर कौन-सा शब्द अधिक चोट करेगा, कौन-सा शब्द बात को अधिक बल प्रदान करेगा, इस बात का ध्यान परसाई जी सदैव रखते थे ।। भाषा में व्यावहारिकता लाने के लिए इन्होंने उर्दू एवं अंग्रेजी के शब्दों का भी प्रचुर मात्रा में प्रयोग किया है; जैसे- मिशनरी, दगाबाज, टॉनिक, केटलाग आदि ।। इनकी रचनाओं में कहीं-कहीं पर मुहावरों एवं कहावतों का प्रयोग भी देखने को मिलता है ।। परसाई जी की मुख्य शैली व्यंग्यप्रधान है ।। इस शैली का प्रयोग अपने अधिकतर निबन्धों में इन्होंने किया है ।। यह शैली परसाई जी के निबन्धों का प्राण है ।। इस शैली पर आधारित इनके निबन्ध पाठक एवं श्रोता दोनों के लिए रोचक एवं आनन्द प्रदान करने वाले बन गए हैं ।। इनके निबन्धों में प्रश्नात्मक शैली के भी दर्शन होते हैं ।। परसाई जी स्वयं प्रश्न करके उसका उत्तर भी स्वयं ही दे देते हैं ।। इन्होंने अपनी रचनाओं में सूत्रात्मक वाक्यों के प्रयोग से गागर में सागर भर दिया है ।। इनके निबन्धों में प्रयुक्त सूत्र-वाक्य विचारों को सुगठित रूप में प्रस्तुत करने में सहायक सिद्ध हुए हैं ।।

3 . हरिशंकर परसाई जी की कृतियों का उल्लेख कीजिए ।।

उत्तर– – कृतियाँ- इनकी समस्त रचनाओं का संग्रह ‘परसाई रचनावली’ के नाम से छः खण्डों में प्रकाशित हो चुका है ।। यद्यपि इन्होंने साहित्य की अन्य विधाओं पर भी अपनी लेखनी चलाई हैं; परन्तु एक सफल व्यंग्यकार के रूप में इन्हें विशेष प्रसिद्धि प्राप्त हुई है ।। परसाई जी की उल्लेखनीय रचनाएँ इस प्रकार हैंव्यंग्यात्मक निबन्ध- वैष्णव की फिसलन, श्रद्धा का दौर, बेईमानी की परत, तब की बात और थी, सदाचार का ताबीज, पगडण्डियों का जमाना, निठल्ले की कहानी, भूत के पाँव पीछे, सुनो भई साधो, और अन्त में, शिकायत मुझे भी है, ठिठुरता हुआ गणतन्त्र ।।
कहानी-जैसे उनके दिन फिरे हँसते हैं रोते हैं ।।
उपन्यास- रानी नागफनी की कहानी, तट की खोज ।।

1 . निम्नलिखित गद्यावतरणों की ससन्दर्भ व्याख्या कीजिए

(क) ऐसे मौके पर . . . . . . . . . . . . . . . . . आगे बढ़ाना चाहिए ।।


सन्दर्भ- प्रस्तुत गद्यावतरण हमारी पाठ्यपुस्तक ‘गद्य गरिमा’ के ‘हरिशंकर परसाई’ द्वारा लिखित ‘निन्दा रस’ नामक निबन्ध से अवतरित है ।।
प्रसंग-लेखक के पास प्रातः काल एक ऐसा मित्र ‘क’ मिलने आया, जो पहले दिन शाम को किसी दूसरे मित्र से उसकी निन्दा कर रहा था ।। लेखक को यह सूचना पहले ही मिल गयी थी; अत: लेखक सच्चे मन से उससे नहीं मिला; क्योंकि वह जानता था कि यह मित्र उससे छल-छद्मपूर्ण व्यवहार कर रहा है ।।

व्याख्या- लेखक उस मित्र ‘क’ से प्रेम के साथ गले नहीं मिला ।। लेखक को उस पौराणिक घटना का स्मरण हो आया, जब भीम ने दुर्योधन को मार डाला था और अन्धे धृतराष्ट्र ने अपने पुत्र की हत्या का बदला भीम से छलपूर्वक लेना चाहा था ।। श्रीकृष्ण धृतराष्ट्र का यह मन्तव्य समझ गये थे ।। इसलिए उन्होंने लोहे से बना भीम का पुतला धृतराष्ट्र के सामने बढ़ा दिया था ।। तब धृतराष्ट्र ने प्रेम से गले मिलने के बहाने भीम के लौहनिर्मित कृत्रिम शरीर (पुतले) को अपनी जकड़ से चूर-चूर कर दिया था ।। लेखक कहता है कि जब मित्र ‘क’ मुझसे गले मिला, तब मैंने शरीर से अपने मन को चुपचाप अलग कर दिया था और अचेतन की तरह मैंने अपने शरीर को उसकी बाँहों में सौंप दिया था ।। लेखक के मन में उस मित्र के प्रति सद्भाव न था, अपितु रोष था ।। मन में व्याप्त रोष या द्वेष अदृश्य होता है, परन्तु यदि कहीं भावना के सचमुच काँटे होते तो उस कपटी मित्र को पता चलता कि वह नागफनी को कलेजे में चिपकाए खड़ा है ।। लेखक उस मित्र से सच्चे हृदय से इसलिए नहीं मिला; क्योंकि वह सच्चा मित्र नहीं था ।। वह कल रात दूसरे मित्र से उसकी निन्दा कर रहा था ।। यहाँ लेखक पाठकों को एक परामर्श भी देता है कि जब कोई छली व्यक्ति गले मिले तो उसके सामने अपना पुतला ही बढ़ाना चाहिए; अर्थात् दुष्ट के साथ दिखावटी व्यवहार ही करना चाहिए ।।

साहित्यिक सौन्दर्य- 1 . भाषा- शुद्ध साहित्यिक खड़ीबोली ।।
2 . शैली- उद्धरण शैली द्वारा घटना का स्पष्टीकरण ।।
3 . वाक्य-विन्यास- सुगठित ।।
4 . शब्द-चयन- विषय के अनुरूप ।।
5 . भाव साम्य- कपटी के साथ कपटपूर्ण व्यवहार ही करना चाहिए ।। इस बात को संस्कृत में भी इस प्रकार कहा गया है- ‘शठेशाठ्यं समाचरेत् ।।

(ख) अद्भुत है मेरा . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . सुख होता होगा ।।

सन्दर्भ- पूर्ववत्
प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने विरोधियों की निन्दा से प्राप्त होने वाले आनन्द का वर्णन किया है ।।
व्याख्या — लेखक श्री हरिशंकर परसाई जी का कहना है कि उनका निन्दक मित्र बहत ही अदभुत और विचित्र है जिनके पास दोषों और बुराइयों का अच्छा-खासा सूची-पत्र है ।। उनके सम्मुख जिस किसी की भी चर्चा छिड़ जाती वह उसी की निन्दा में चार-छ: वाक्य बोल दिया करता था ।। लेखक के मन में विचार आया कि क्यों न वह भी अपने कुछ-एक परिचितों की जो उसके विरोधी हैं, की निन्दा उसके माध्यम से करवा ले ।। लेखक ने अपने विरोधियों की चर्चा उनके सामने करनी शुरू कर दी और उनके उस निन्दक मित्र ने बारी-बारी से उनके प्रत्येक विरोधी की भरपूर निन्दा की ।। आरा मशीन की सहायता से लकड़ी काटने का उदाहरण देते हुए लेखक कहता है कि उसने अपने विरोधियों के नाम अपने निन्दक मित्र के समक्ष उसी प्रकार धीरेधीरे खिसकाने शुरू किए जिस प्रकार मजदूर लकड़ी काटने की आरा मशीन के नीचे लकड़ी खिसकाता है ।। उनका वह मित्र भी उनके विरोधियों को वैसे ही आसानी से काटता चला गया जैसे आरा मशीन लकड़ी के लट्ठे को आसानी से काट डालती है ।। वह समय बहुत ही आनन्ददायक था ।। सम्भवतः वैसा ही आनन्द और सुख किसी योद्धा को उस समय प्राप्त होता होगा जब वह युद्ध-भूमि में अपने शत्रुओं को कट-कटकर गिरते हुए देखता होगा ।।

साहित्यिक सौन्दर्य- 1 . निन्दा से प्राप्त सुख और आनन्द की अनुभूति का सरस वर्णन किया गया है ।।
2 . भाषा- शुद्ध साहित्यिक खड़ीबोली ।।
3 . शैली- उद्धरण ।।
4 . वाक्य-विन्यास- सुगठित ।।
5 . शब्द-चयन- विषय के अनुरूप व अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग ।।

(ग) मेरे मन में . …………………………. सलाह दी है ।।

सन्दर्भ- पूर्ववत्

प्रसंग- यहाँ लेखक ने विरोधियों की निन्दा करने में मिले आनन्द का व्यंग्यात्मक चित्रण किया है तथा निन्दा के महत्व का प्रतिपादन करते हुए कहा है कि निन्दकों में ईश्वर भक्तों जैसी लीनता और निमग्नता होती है ।।

व्याख्या- लेखक कहता है कि मेरा निन्दक मित्र जब तक अपने परिचितों की निन्दा करता रहा, तब तक उसका व्यवहार मुझे उचित नहीं लगा लेकिन जब उसने मेरे विरोधियों की निन्दा करनी प्रारम्भ की, तब उसके प्रति मैं विनम्र हो गया; क्योंकि दोनों की भावनाएँ समान हो गईं और हमारा स्वाभाविक भेदभाव भी समाप्त हो गया; क्योकि इस प्रकार के भेद दोषरूपी अन्धकार में दिखाई नहीं देते और स्वच्छ आचरणरूपी दिन में स्पष्ट हो जाते हैं ।। निन्दा की वैचारिकता के कारण लोगों के मन शान्त एवं तृप्त हो जाते हैं ।। यही कारण है कि दो निन्दक मित्र वैचारिक भिन्नता होने पर भी वे अपने-अपने विरोधियों की निन्दा एकदूसरे से सुनते समय आपस में सहानुभूति का परिचय देते हैं ।। लेखक कहते हैं कि निन्दा की महिमा ही ऐसी होती है अर्थात् निन्दा में एक अद्भुत गुण होता है ।। दो-चार निन्दा करने वाले लोगों को एक जगह बैठाकर निन्दा में लीन देखिए तथा उनकी तुलना भगवान या ईश्वर की भक्ति में लीन उन भक्तों से कीजिए ।। जो ईश्वर का भजन कर रहे हैं अर्थात् ईश्वर की भक्ति में लीन भक्त और निन्दा रस में लीन निन्दक में से निन्दक अधिक मग्न दिखाई पड़ते हैं ।। लेखक कहते हैं कि एकाग्रता, परस्पर, आत्मीयता, अपने आराध्य के ध्यान में डूब जाने के गुण ईश्वर भक्तों में सर्वाधिक पाए जाते हैं; क्योकि इन गुणों के अभाव में ईश्वर भक्ति नहीं हो सकती, मगर ये दुर्लभ गुण ईश्वर भक्तों में ज्यादा निन्दकों में पाए जाते हैं ।। एक सार को ईश्वर-भक्त इन गुणों के अभाव में भक्ति से विरक्त हो सकता है, किन्तु निन्दक कैसी भी विषम परिस्थिति में अपने इन गुणों का त्याग नहीं करता ।। यही कारण है कि कबीर जैसे संत कवियों ने निन्दा करने वाले लोगों को आँगन में कुटी बनवाकर पास रखने की सलाह दी है; क्योंकि निन्दक हमारे दुर्गणों की बार-बार निन्दा करेगा और हम उसकी निन्दा से बचने के लिए अपने दुर्गणों को त्यागकर, सही आचरण करने का प्रयास करेंगे, जिससे हमारा स्वभाव पवित्र हो जाएगा ।।

साहित्यिक सौन्दर्य- 1 . भाषा- सरल, सरस एवं प्रवाहपूर्ण ।।
2 . शैली- व्यंग्यात्मक ।।
3 . वाक्य-विन्यास- सुगठित ।।
4 . शब्द-चयन-विषय के अनुरूप ।।
5 . यहाँ स्वभाववश निन्दा करने वाले व्यक्तियों की प्रवृत्ति का सजीव व्यंग्यात्मक चित्रण किया गया है ।।
6 . रात्रि के अन्धकार की दोषों से और दिन के उजाले की स्वच्छ आचरण से तुलना की गयी है ।।
7 . परसाई जी ने परनिन्दा में तल्लीन होने वाले निन्दकों के प्रति तीखा व्यंग्य किया है ।।
8 . भावसाम्य-किसी कवि ने उचित ही कहा है
निन्दक दूरि न कीजिए, दीजै आदर मान ।।
निर्मल तन-मन सब करै, बकि-बकि आनही आन॥

(घ) कुछ मिशनरी’ . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . लिए दे देगा ।।

सन्दर्भ- पूर्ववत्

प्रसंग- प्रस्तुत पंक्तियों में लेखक ने निन्दकों के विभिन्न प्रकारों में से मिशनरी निन्दकों की विशेषता बतायी है तथा निन्दकों के स्वभाव पर आलंकारिक भाषा में प्रकाश डाला है ।।

व्याख्या- लेखक कहता है कि कुछ निन्दक मिशनरी होते हैं ।। निन्दा करना उनका ‘मिशन’ होता है ।। वे बिना किसी द्वेष-भाव के धर्म-प्रचार और सेवा-भाव में संलग्न मिशनरी की भाँति निन्दा करने में लगे रहते हैं ।। उनका किसी से वैर नहीं होता और न वे किसी का बुरा सोचते हैं, किन्तु निन्दा करना उनका स्वभाव होता है और निन्दा करने में उन्हें विशेष आनन्द की प्राप्ति होती है ।। ऐसा करने में वे कोई पक्षपात नहीं करते ।। ऐसे निन्दक प्रसंग आने पर वे अपने पिता की निन्दा भी उसी आनन्द के साथ करते हैं, जिस आनन्द के साथ अन्य लोग अपने दुश्मनों की ।। निन्दा ऐसे लोगों के लिए ‘टॉनिक’ होती है, जो उन्हें उल्लास और आनन्द प्रदान करती है ।। परसाई जी कहते हैं कि आज ट्रेड यूनियनों का जमाना है, हर छोटी-बड़ी कम्पनी अथवा संस्था में काम करनेवाले सभी वर्गों के लोगों ने अपने अधिकारों और हितों की रक्षा के लिए लड़ने हेतु अपने-अपने संघ (यूनियन) बना लिए हैं ।। इसीलिए निन्दकों ने भी अपने निन्दा के कारोबार को बढ़ाने के लिए अपने संघ बना लिए हैं ।।

निन्दक संघों के सदस्य अपने कार्यों को बड़ी लगन और निष्ठा से सम्पन्न करते हैं ।। ये यहाँ-वहाँ से निन्दा करने हेतु छोटी-बड़ी खबरें जुटाकर अपने संघ के अध्यक्ष अर्थात् मुख्य निन्दक को लाकर देते हैं ।। ये खबरें एक प्रकार से निन्दा के कारोबार के लिए कच्चे माल के समान होती हैं ।। अब संघ-प्रमुख उन खबरों में नमक-मिर्च लगाकर उन्हें पक्के माल में इस प्रकार परिवर्तित करता है कि निन्दापसन्द लोगों को उसमें ऐसा रस मिलता है कि वे चटखारे ले-लेकर उन्हें सुनने-सुनाने लगते हैं ।। जब कच्चे माल से पक्का माल तैयार हो जाता है तो संघ का मुखिया उसे अपने उन सदस्यों को उस निन्दा के पक्के माल को सारे-संसार में फैलाने के लिए बाँट देता है, जो कि खबरों के रूप में कच्चा माल लेकर उसके पास आए थे ।। लेखक यहाँ व्यंग्य करता हुआ कहता है कि संघ का मुखिया यह सब कार्य समाज के अधिकांश लोगों के कल्याण के लिए करता है ।। समाज के अधिकांश सदस्य निन्दास्पन्द हैं| और उन्हें दूसरों की निन्दा करने और सुनने में परम-सुख प्राप्त होता है ।। उन्हें यह परम-सुख प्रदान करने के लिए ही निन्दक संघ का मुखिया इस पुनीत कार्य को सम्पन्न करता है ।।

साहित्यिक सौन्दर्य-1 . जैसे मूर्ख की मित्रता मूर्ख के साथ ही होती है, उसी प्रकार निन्दक का मेलजोल भी निन्दक के ही साथ होता है और वे अपने जैसे निन्दकों को ढूँढकर अपने जैसे लोगों का समूह बना लेते हैं ।। इसी मनौवैज्ञानिक तथ्य का उल्लेख यहाँ हुआ है ।।
2 . भाषा- व्यंग्यात्मक एवं चुलबुली ।। ‘मिशनरी’ एवं ‘टॉनिक’ जैसे अंग्रेजी शब्दों के प्रसंगानुकूल प्रयोग से भाषा को सशक्त व्यंग्यात्मक रूप में प्रस्तुत किया गया है ।।
3 . शैली- व्यंग्यात्मक ।।
4 . वाक्य-विन्यास-सुगठित,
5 . शब्दचयन-विषय के अनुरूप ।।
6 . भावसाम्य-निन्दा प्रायः सभी की कमजोरी है ।। किसी कवि ने कहा है कि

सातो सागर मैं फिरा, जंबू दीप दै पीठ ।।
पर निन्दा नाहीं करै, सो कोई बिरला दीठ॥

(ङ) ईष्या-द्वेष से प्रेरित . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . दुगुना हो जाएगा ।।

सन्दर्भ- पूर्ववत्
प्रसंग- प्रस्तुत गद्यावतरण में ईर्ष्या-द्वेष के कारण निन्दा करनेवाले निन्दकों की दयनीय स्थिति का अत्यन्त मार्मिक वर्णन व्यंग्यात्मक शैली में किया गया है ।।

व्याख्या- परसाई जी के अनुसार निन्दक दो प्रकार के होते हैं- प्रथम, मिशनरी निन्दक अर्थात् जिनका स्वभाव ही निन्दा करने का है और दूसरे, ईर्ष्या-द्वेष से प्रेरित निन्दक ।। मिशनरी निन्दकों के लिए निन्दा टॉनिक का कार्य करती है, किन्तु ईर्ष्या-द्वेष से प्रेरित निन्दक अत्यधिक पीड़ित होता है ।। वह निरन्तर द्वेष की भावना से जलता रहता है, वह निन्दारूपी जल के माध्यम से अपने आप को तृप्त करता है ।। निन्दक की यह दशा बड़ी दयनीय होती है ।। अपने अभावों के कारण वह दुःखी होता हुआ जिस प्रकार कुत्ता रात्रि के अन्धकार को देखकर भौंकता रहता है, उसी प्रकार सम्पूर्ण रात्रि ईर्ष्या की अग्नि में जलता रहता है ।। इस प्रकार ईर्ष्या से प्रभावित व्यक्ति को दण्ड की आवश्यकता नहीं होती; क्योंकि वह स्वयं ही अपनी प्रकृति के कारण दुःख प्राप्त करता है ।। ऐसे व्यक्ति जीवन में किसी प्रकार की उन्नति की अपेक्षा दुःख के भागी होते हैं ।। ऐसे व्यक्ति को दण्ड देने की आवश्यकता नहीं है ।। क्योंकि आप तो सुख से चैन- की नींद सोते हैं और वह निन्दक ईर्ष्या की पीड़ा के कारण एक भी पल को चैन से सो नहीं पाता ।। अब भला इससे अधिक कठोर और कौन-सा दण्ड इस व्यक्ति को दिया जा सकता है ।। आपके द्वारा लगातार अच्छे कार्य करने से उसकी पीड़ा बढ़ती जाएगी और वह अधिक ईर्ष्या करेगा जिससे उसका दण्ड बढ़ता जाएगा ।। उदाहरण के लिए किसी कवि ने किसी अच्छी कविता की रचना की, उससे ईर्ष्या करने वाले निन्दक को उसके इस कार्य से पीड़ा होगी, परंतु यदि उस कवि ने एक और अच्छी ‘कविता की रचना कर दी, तो उस निन्दक का दुःख या पीड़ा कई गुणा बढ़ जाएगी ।।

साहित्यिक सौन्दर्य- 1 . निन्दक व्यक्ति को दण्ड देने की आवश्यकता नहीं होती, वह अपने स्वभाव के कारण स्वयं ही दण्डित होता रहता है ।।
2 . भाषा- सरल, सुबोध एवं प्रवाहमयी ।।
3 . शैली- विषय के अनुकूल एवं व्यंग्यात्मक ।।
4 . वाक्यविन्यास- सुगठित ।।
5 . शब्द-चयन-विषय के अनुरूप ।।

(च) निन्दा का उद्गम . . . . . . . . . . . . . . . . . . ईर्ष्या होती है ।।


सन्दर्भ- पूर्ववत्
प्रसंग- प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने निन्दा की उत्पत्ति का कारण हीनता और आलस्य को बताया है ।।


व्याख्या- लेखक कहता है कि मनुष्य की हीन-भावना और कर्म न करने की प्रवृत्ति ही उसमें दूसरों की निन्दा करने की भावना को जन्म देती है ।। वह व्यक्ति अपनी हीनता को प्रकट नहीं होने देना चाहता है और दूसरों की निन्दा करके दूसरों को अपने से तुच्छ सिद्ध करने का असफल प्रयास करता है ।। वह दूसरों की निन्दा करके यह दिखाने की कोशिश करता है कि दूसरे उससे तुच्छ हैं और वह उनसे महान् ।। वह दूसरों की निन्दा करके आत्म-सन्तोष की अनुभूति करने लगता है ।। उसका यह प्रयास ऐसा ही है, जैसे कोई व्यक्ति बड़ी लकीर (महान् व्यक्ति) को मिटाकर, छोटी लकीर (हीन व्यक्ति) को बड़ा (महान् व्यक्ति) समझने लगे ।। लेखक कहता है कि जैसे-जैसे निकक्मेपन की भावना बढ़ती जाती है, निन्दा करने की प्रवृत्ति को भी बढ़ावा मिलता है ।। आदमी जब खाली बैठा रहता है, तब खाली समय में वह दूसरों की निन्दा करता रहता है ।। जो व्यक्ति निरन्तर कठिन कर्म में व्यस्त रहता है, उसका ध्यान निन्दा जैसी व्यर्थ की बातों की ओर नहीं जाता ।। लेखक कहता है कि इन्द्र को बड़ा ईर्ष्यालु माना जाता है; क्योकि वह निठल्ला रहता है, उसे कुछ नहीं करना पड़ता ।। उस खाने के लिए अन्न नहीं उगाना पड़ता, फल पाने के लिए पेड़ नहीं बोने पड़ते तथा रहने के लिए बना-बनाया महल मिल जाता है ।। स्वर्ग में ये सभी चीजें स्वतः प्राप्त हो जाती हैं, इन्हें प्राप्त करने के लिए कुछ भी श्रम नहीं करना पड़ता ।। खाली रहने के कारण उसे अपनी अप्रतिष्ठा का डर बना रहता है ।। इसलिए वह अपनी कर्मठता से मेरे पद को न छीन ले; अत: वह उससे ईर्ष्या करने लगता है ।।

साहित्यिक सौन्दर्य-1 . लेखक का मत है कि निन्दा का जन्म कर्महीनता की स्थिति में होता है ।।
2 . यहाँ लेखक ने समाज को कर्मठ बनने की प्रेरणा दी है ।।
3 . इन्द्र का उदाहरण देकर लेखक ने अकर्मण्य और आलसी व्यक्तियों पर तीखा व्यंग्य किया है ।।
4 . भाषा- सरल एवं बोधगम्य ।।
5 . शैली- व्यंग्यात्मक ।।

(छ) निन्दा कुछ लोगों ………………………………………………………….अनुभव करते हैं ।।

सन्दर्भ- पूर्ववत्
प्रसंग- यहाँ निन्दा करने वाले व्यक्तियों की प्रकृति और आचरण का व्यंग्यात्मक चित्रण किया गया है ।।

व्याख्या- निन्दा करने वाले व्यक्तियों के विचित्र स्वभाव पर व्यंग्य करते हुए परसाई जी कहते हैं कि कुछ लोग निन्दा को उसी प्रकार महत्व देते हैं, जैसे व्यापारी अपनी पूँजी को ।। वे निन्दा को पूँजी समझते हुए ही अपना व्यापार बढ़ाने में लगे रहते हैं ।। प्रत्येक व्यक्ति की अधिक-से-अधिक और सर्वत्र निन्दा करना ही उनके जीवन का प्रमुख लक्ष्य होता है ।। उनकी यह धारणा होती है कि वे जितनी अधिक निन्दा करेंगे, उतने ही अधिक लाभ उन्हें प्राप्त होंगे ।। कुछ लोगों को तो प्रतिष्ठित होने का अवसर भी इसीलिए प्राप्त हो पाता है कि वे दूसरों की निन्दा करने में कुशल होते हैं ।। वे दूसरों की निन्दा करने में उसी प्रकार तत्लीन हो जाते हैं, जैसे ‘रामायण’ का पाठ करनेवाला व्यक्ति रामायण पढ़ने में ।। ऐसे निन्दक अत्यन्त रुचिपूर्वक दूसरों के जीवन से सम्बन्धित कलंकपूर्ण घटनाओं को सुनाया करते हैं ।। कभी-कभी तो निन्दा रस में रुचि लेनेवाले लोग मात्र कल्पना के आधार पर ही किसी को बदनाम कर दिया करते हैं ।। दूसरों के प्रति ऐसा वास्तविक, किन्तु काल्पनिक दुष्प्रचार करके वे स्वयं को सन्त समझने और स्वयं के अहम् की तुष्टि करने का ही प्रयास करते हैं ।। दूसरों की निन्दा करके वे भ्रमवश ऐसा अनुभव करने लगते हैं कि अन्य व्यक्तियों की तुलना में वे बहुत अधिक श्रेष्ठ हैं ।।

साहित्यिक सौन्दर्य-1 . मनोविज्ञान के परिप्रेक्ष्य में निन्दक व्यक्ति को भ्रमित धारणा को स्पष्ट करने की दृष्टि से लेखन को पूर्ण सफलता प्राप्त हुई है ।।
2 . भाषा-सरल, सुबोध एवं आलंकारिक ।।
3 . शैली- व्यंग्यात्मक ।।

(ज) उस मित्र की . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . रसाल’ कहा है ।।
सन्दर्भ- पूर्ववत्
प्रसंग- यहाँ लेखक ने अपने मित्र से मिलने के बाद स्वयं की मनोस्थिति का वर्णन किया है ।।
व्याख्या- लेखक कहते हैं कि उस मित्र से मुलाकात होने पर उसके जाने के दस-बारह घंटे बाद मेरे मन में वही बस बाते घूम रही है, जो उसने कही थी अर्थात् उसकी बातों का प्रभाव मेरे मन पर अभी तक था ।। परंतु अब इस समय मैं उदासीन हो गया हूँ अर्थात् उन बातों से मुझे उतना रस प्राप्त नहीं हो रहा है जितना कि उस समय हो रहा था, जब सुबह उसके आने पर उसके साथ बैठकर हो रहा था ।। उस समय तो मैं निन्दा रूपी काला सागर मैं तैरते हुए आनन्दित हो रहा था ।। लेखक कहते हैं कि मित्र की बातें ध्यान आने पर उनका प्रभाव तो मन पर हैं परन्तु आनन्द प्राप्त नहीं हो रहा है ।। लेखक कहते हैं कि निन्दा में बहुत आनन्द प्राप्त होता है ।। इसलिए ही तो कवि सूरदास ने भी निन्दा को आम के समान मीठा बताया है ।।

साहित्यिक सौन्दर्य- 1 . यहाँ लेखक ने अपने मन पर पड़ने वाले निन्दा के प्रभाव का वर्णन किया है ।।
2 . भाषा- शुद्ध
साहित्यिक खड़ीबोली ।।
3 . शैली- व्यंग्यात्मक ।।

2 . निम्नलिखित सूक्तिपरक वाक्यों की ससन्दर्भ व्याख्या कीजिए

(क) भावना के अगर काँटे होते तो उसे मालूम होता कि वह नागफनी को कलेजे से चिपकाए है ।।

सन्दर्भ- प्रस्तुत सूक्ति हमारी पाठ्यपुस्तक ‘गद्य गरिमा’ में संकलित ‘निन्दा रस’ नामक निबन्ध से अवतरित है ।। इसके लेखक ‘हरिशंकर परसाई’ जी हैं ।।

प्रसंग- यहाँ यह स्पष्ट किया गया है कि छल करनेवाले के साथ छलपूर्ण नीति का ही प्रयोग करना चाहिए ।।

व्याख्या- भावना व्यक्ति का ऐसा गुण है, जिसका अनुमान केवल व्यक्ति को देखकर नहीं लगाया जा सकता ।। प्रायः होता यह है कि व्यक्ति के मन में होती तो दुर्भावना है, किन्तु वह सामाजिक एवं नैतिक बाध्यताओं के कारण स्वयं को सद्भावना के पुतले के रूप में प्रस्तुत करता है ।। अपने मित्र से मिलते समय लेखक ने भी ऐसा ही प्रदर्शन किया ।। यदि भावना के काँटे होते, तब उसके मित्र को यह पता चलता कि वह अपने प्रिय मित्र को गले से नहीं चिपटाए हैं; बल्कि नागफनी को अपने कलेजे से लगाए है ।।

(ख) छल का धृतराष्ट्र जब अलिंगन करे तो पुतला ही आगे बढ़ाना चाहिए ।।

सन्दर्भ- पूर्ववत्
प्रसंग-प्रस्तुत सूक्ति में कहा गया है कि छल करने वाले के साथ छल का ही व्यवहार करना चाहिए ।।

व्याख्या- महाभारत के युद्ध का आधार लेते हुए लेखक कहते हैं कि महाभारत के युद्ध में अपने सभी पुत्रों को मारने का दोषी मानकर, धृतराष्ट्र भीम को मारना चाहता था ।। इसके लिए उसने भीम से स्नेह का नाटक रचा और उसे गले लगाने की बात कही, परन्तु श्रीकृष्ण उसका मन्तव्य समझा गये थे ।। उन्होंने लोहे का पुतला आगे बढ़ाकर कह दिया कि यह भीम है ।। धृतराष्ट्र ने लोहे के पुतले को आलिंगन में लेकर कुछ ही देर में तोड़ दिया ।। लेखक का मित्र बीती रात किसी से लेखक की जी भरकर निन्दा करता रहा और अब झूठा स्नेह दिखाने के लिए आँखों में आँसू भरे उससे गले मिल रहा है ।। लेखक ने भी अपने शरीर से मन को खिसकाकर अपनी कँटीली देह उसकी बाँहों में डाल दी ।। तात्पर्य यह है कि वह मन से उससे नहीं मिला ।।

(ग) कुछ लोग बड़े निर्दोष मिथ्यावादी होते हैं ।।

सन्दर्भ- पूर्ववत्
प्रसंग- इस सूक्ति में यह भाव निहित है कि यदि कोई व्यक्ति अपने किसी स्वार्थ अथवा लोभ के वशीभूत होकर झूठ नहीं बोलता है तो उसके द्वारा बाले गये झूठ को दोषपूर्ण नहीं कहा जाना चाहिए ।।

व्याख्या- समाज में कुछ व्यक्ति स्वार्थवश अथवा लोभवश झूठ बोलते हैं ।। विशेषकर स्वार्थपूर्ण उद्देश्यों के लिए बोला जाने वाला झूठ अत्यन्त निम्नस्तरीय होता है ।। इस प्रकार के व्यक्ति दोषी होते हैं और उनका अपराध अक्षम्य होता है ।। इसके विपरीत कुछ व्यक्ति ऐसे भी होते हैं जो केवल आदत पड़ जाने के कारण ही झूठ बोलते हैं ।। झूठ बोलने के पीछे उनका कोई स्वार्थ निहित नहीं होता; अर्थात् किसी को धोखा देने अथवा किसी लोभ के कारण वे झूठ नहीं बोलते ।। इस प्रकार के व्यक्तियों को दोषी मानकर उनका तिरस्कार करना उचित नहीं है ।।

(घ) अद्भुत है मेरा यह मित्र ।। उसके पास दोषों का केटलाग है ।।
सन्दर्भ- पूर्ववत्
प्रसंग-लेखक यहाँ अपने एक निन्दक मित्र पर हास्यपरक टिप्पणी करता हुआ उसकी विशेषताओं से अवगत करा रहा है ।।

व्याख्या- परसाई जी प्रस्तुत पंक्ति में अपने मित्र की विचित्रता का परिचय दे रहे हैं कि उनका वह निन्दक मित्र ऐसा विचित्र है कि उससे जिसकी चाहे उसकी निन्दा करवायी जा सकती है ।। रात को वह ‘ग’ के समक्ष मेरी निन्दा कर रहा था ।। यहाँ आते ही मेरे समक्ष ‘ग’ की निन्दा करने लगा ।। उसके सामने मैंने जिस किसी जानकार व्यक्ति का नाम लिया, उसी के बारे में उसने चारछह वाक्य निन्दा के कह दिये ।। ऐसा प्रतीत होता है, मानो मेर इस मित्र के पास बुराइयों का सूची-पत्र हो ।। निन्दा करने के लिए जो भी शब्द प्रयुक्त हो सकते हैं, वे सब इसके सूची-पत्र में है और जिस-जिस में जो भी कमी हो सकती है, उसकी पूर्ण जानकारी उसके पास सदैव उपलब्ध रहती है ।।

(ङ) निन्दा का ऐसा ही भेदनाशक अँधेरा होता है ।।


सन्दर्भ- पूर्ववत्
प्रसंग-प्रस्तुत सूक्ति में लेखक ने निन्दकों के भेद को दूर करने में निन्दारूपी अन्धकार को सहायक बताया है ।।
व्याख्या- परसाई जी कहते हैं कि यदि दो निन्दकों में किसी प्रकार का भेद हो तो रात्रि के अन्धकार की भाँति निन्दा का अन्धकार उस भेद को मानो अपने प्रभाव से समाप्त कर डालता है; क्योंकि लेखक ने जब अपने निन्दक मित्र के साथ मिलकर बहुत-से विरोधियों की निन्दा की तो निन्दक मित्र के प्रति उनके मन में जो भी द्वेष था, वह दूर हो गया ।। इससे तात्पर्य है कि निन्दा के अन्धकार से समस्त भेदभाव समाप्त हो जाते हैं ।।

(च) इसलिए संतोंने निन्दकों को ‘आँगन कुटी छवाय’ पास रखने की सलाह दी है ।।

सन्दर्भ- पूर्ववत्
प्रसंग- इस सूक्ति में समाज और व्यक्ति के लिए निन्दा और निन्दक के महत्व का प्रतिपादन किया गया है ।।

व्याख्या-लेखक कहता है कि साथ बैठकर निन्दा करने वाले लोगों में परस्पर जो अपनापन, तन्मयता और एकाग्रता होती है, वैसी एक साथ बैठकर ईश्वर का भजन करने वाले भक्तों में भी नहीं होती ।। यही कारण है कि कबीर जैसे सन्त कवियों ने निन्दा करने वाले लोगों को आँगन में कुटी बनवाकर पास रखने की सलाह दी; क्योंकि निन्दक हमारे दुर्गुणों की बार-बार निन्दा करेगा और हम उसकी निन्दा से बचने के लिए अपने दुर्गुणों का त्यागकर, सही आचरण करने का प्रयत्न करेंगे ।। इससे हमारा स्वभाव बिना प्रयास के ही पवित्र हो जाएगा ।।

(छ) ईर्ष्या-द्वेष से प्रेरित निन्दा करने वाले को कोई दंड देने की जरूरत नहीं है ।।
सन्दर्भ- पूर्ववत् प्रसंग-प्रस्तुत सूक्ति के माध्यम से निन्दा करने वाले व्यक्ति की दयनीय स्थिति को प्रदर्शित किया गया है ।।

व्याख्या- लेखक के अनुसार निन्दा करने वाले व्यक्ति की स्थिति अत्यन्त दयनीय हो जाती है ।। वह अपनी अयोग्यताओं एवं असमर्थताओं के कारण सदैव दुःखी रहता है और दूसरों की सुख-समृद्धि एवं प्रगति को देखकर उसी प्रकार बड़बड़ाता रहता है, जिस प्रकार चन्द्रमा को देखकर कोई कुत्ता पूरी रात भौंकता रहे ।। अपनी योग्यताओं एवं सामर्थ्य में वृद्धि करने के स्थान पर वह निरन्तर हीन ही बना रहता है और अपने अहं की तुष्टि हेतु, सक्षम एवं प्रगतिशील व्यक्तियों की निन्दा में ही व्यस्त रहता है ।। ईर्ष्या-द्वेष से प्रेरित निन्दक व्यक्ति का दण्ड देने की आवश्यकता नहीं है; क्योंकि वह निन्दा की जलन में स्वयं पीड़ित रहते हुए निरन्तर तड़पता रहता है ।।

(ज) निन्दा का उद्गम ही हीनता और कमजोरीसे होता है ।।
सन्दर्भ- पूर्ववत् प्रसंग-प्रस्तुत सूक्तिपरक पंक्ति में लेखक ने कहा है कि निन्दा की प्रवृत्ति का जन्म हीनता की भावना से होता है ।। व्याख्या- विद्वान लेखक का कहना है कि किसी मनुष्य के मन में पर निन्दा की प्रवृत्ति उसकी अपनी कमजोरी और आलस्य के कारण उत्पन्न होती है ।। अपने समकक्ष किसी व्यक्ति के पास जो कुछ है, वह उसके पास नहीं है; अर्थात् वह उससे छोटा या तुच्छ है ।। अपनी इसी हीन भावना के कारण उसकी निन्दा करके स्वयं को इससे बड़ा साबित करने का निरर्थक प्रयास करता है और उसकी निन्दा करने लगता है, जिससे कि वह दूसरों की नजर में नीचे गिर जाए ।।

(झ) ज्यों-ज्यों कर्म क्षीण होता जाता है, त्यों-त्यों निन्दा की प्रवृत्ति बढ़ती जाती है ।।

सन्दर्भ- पूर्ववत्
प्रसंग- इस सूक्ति वाक्य में निन्दा-प्रवृत्ति की उत्पत्ति सम्बन्धी व्याख्या की गई है ।।

व्याख्या- हीनभावना से ग्रस्त व्यक्ति दूसरों की निन्दा करके तथा इन्हें तुच्छ और निकृष्ट बताकर अपने अहम् की तुष्टि करता है ।। वह समझता है कि इस प्रकार वह समाज में अपने महत्व की स्थापना कर रहा है ।। उसका यह प्रयास ऐसा ही है, जैसे कोई व्यक्ति किसी की बड़ी लकीर को मिटाकर अपनी छोटी लकीर को बड़ा समझने लगा ।। जैसे-जैसे व्यक्ति कर्महीन होता जाता है, वैसे-वैसे उसमें निन्दा की प्रवृत्ति बढ़ती चली जाती है ।। कर्मठ व्यक्ति में न तो ईर्ष्या और द्वेष का भाव होता है और न उसमें निन्दा की आदत होती है ।। वस्तुतः अपनी कर्मशीलता के क्षणों में उसे इन बातों का ध्यान ही नहीं रहता ।।

अन्य परीक्षोपयोगी प्रश्न

1 . ‘निन्दा रस’ पाठ का सारांश अपने शब्दों में लिखिए ।।


उत्तर– – ‘निन्दा रस’ नामक निबन्ध में ‘हरिशंकर परसाई’ जी ने निन्दा से प्राप्त होने वाले रस पर तीखा व्यंग्य किया है ।। लेखक कहते हैं कि जब एक दिन सुबह वे चाय पीकर अखबार पढ़ रहे थे तो उनके मित्र ‘क’ कई महीने बाद तूफान की तरह कमरे में आए और चक्रवात की तरह उनको अपनी बाँहों में उसी प्रकार जकड़ लिया जिस प्रकार ‘धृतराष्ट्र’ ने भीम से अपने पुत्रों की मृत्यु का बदला लेने के लिए भीम के पुतले को अपनी भुजाओं में जकड़कर चकनाचूर कर दिया था ।। लेखक कहते हैं कि अपने उस मित्र से मैं प्रेम से गले नहीं मिला, जब मित्र ‘क’ उनसे गले मिला तो उन्होंने अपने शरीर से अपने मन को चुपचाप अलग कर दिया था और अचेतन शरीर को उसकी बाँहों में सौंप दिया था ।। लेखक के मन में उस मित्र के लिए सद्भाव न था ।। मन में व्याप्त द्वेष या रोष अदृश्य होता है, परन्तु यदि कही भावनाओं के काँटे होते तो तो उस मित्र को पता चलता कि वह नागफनी को कलेजे से चिपकाए खड़ा है ।। यहाँ लेखक पाठकों को परामर्श भी देता है कि जब कोई छली व्यक्ति गले मिले तो उसके सामने अपना पुतला ही बढ़ाना चाहिए ।।

लेखक आगे कहते हैं कि उनका मित्र अभिनय करने में निपुण है ।। उनसे (लेखक से) मिलकर केवल उसकी आँखें ही सजल नहीं हुई अपितु मिलन के कारण होने वाले हर्ष के सभी चिह्न दिखाई देने लगे ।। और वह लेखक से बोला कि अभी सुबह की गाड़ी से ही वह आया है और तुरंत उनसे मिलने चला आया ।। इनके मित्र ने आते ही झूठ बोला, लेखक के दूसरे मित्र ने उन्हें पहले ही बता दिया था कि उनका मित्र ‘क’ कल से आया हुआ था ।। परन्तु कुछ लोग आदतन प्रकृति के अनुरूप झूठ बोलते हैं ।। लेखक कहते हैं मेरे मित्र ने आते ही ‘ग’ की निन्दा आरम्भ कर दी ।। उसने ‘ग’ की निन्दा में जो शब्द कहे उन्हें सुनकर लेखक यह सोचकर काँप गया कि ‘क’ ने कल ‘ग’ के सामने लेखक की भी इसी प्रकार निन्दा की होगी ।। लेखक परसाई जी कहते हैं कि उनका निन्दक मित्र बहुत ही अद्भुत और विचित्र है, जिसके पास सभी के दोषों और बुराईयों का अच्छा-खासा सूची-पत्र है ।। उसके सामने जिस किसी की भी चर्चा छिड़ती वह उसी की निन्दा में चार-छ: वाक्य बोल देता था ।। लेखक के मन में भी विचार आया कि क्यों न मैं भी अपने कुछ विरोधियों की निन्दा अपने मित्र के माध्यम से करवा लूँ ।। लेखक ने अपने विरोधियों की चर्चा उसके सामने शुरू कर दी और उनके मित्र ने उनके प्रत्येक विरोधी की भरपूर निन्दा की ।। लेखक कहते हैं कि उस समय उन्हें ऐसा आनन्द प्राप्त हुआ जैसा किसी योद्धा को उस समय प्राप्त होता होगा जब वह युद्धभूमि में अपने शत्रु को कट-कटकर गिरते हुए देखता होगा ।।

लेखक कहता है कि मेरा निन्दक मित्र जब तक अपने विरोधियों की निन्दा करता रहा जब तक उसका व्यवहार मुझे उचित नहीं लगा, लेकिन जब उसने मेरे विरोधियों की निन्दा शुरू की तब उसके प्रति मैं विनम्र हो गया, क्योंकि दोनों की भावनाएँ समान हो गई थीं और स्वाभाविक भेद-भाव भी समाप्त हो गया; क्योकि ये भेद दोषरूपी अंधकार में दिखाई नहीं देते और स्वच्छ आचरणरूपी दिन में स्पष्ट हो जाते हैं ।। जब वह विदा हुआ तो हम दोनों को बड़ी शान्ति और तुष्टि थी ।। लेखक कहते हैं कि निन्दा में एक ऐसा गुण है जो अद्भुत है ।। दो-चार लोग एक जगह बैठकर निन्दा करने में इतने तल्लीन हो जाते हैं, जैसे कुछ भक्तगण ईश्वर-भक्ति में तल्लीन होते हैं ।। निन्दा करने में उन्हें वही आनन्द प्राप्त होता है, जो ईश्वर का भजन करने वाले भक्तों को मिलता हैं ।। निन्दकों का मन निन्दा करने में जितना अधिक एकाग्र होता है, आपस में उतना अधिक अपनापन, उतनी एकाग्रता और तन्मयता भक्तों में भी मिलनी कठिन होती है ।। इसलिए सन्तों ने भी निन्दकों को अपने पास रखने की सलाह दी है ।। लेखक कहते हैं कि कुछ निन्दक मिशनरी होते हैं, जिनका मिशन ही निन्दा करना होता है ।। उनका किसी से वैर नहीं होता है, न ही वे किसी का बुरा सोचते हैं, किन्तु निन्दा करना उनका स्वभाव होता है और निन्दा करने में उन्हें विशेष आनन्द की प्राप्ति होती है ।। जिसे करने में वे कोई पक्षपात नहीं करते ।। निन्दा ऐसे लोगों के लिए ‘टॉनिक’ होती है, जो उन्हें उल्लास और आनन्द प्रदान करती है ।।

परसाई जी कहते हैं कि आज ट्रेड यूनियनों का जमाना है सभी वर्गों के लोगों ने अपने हितों की रक्षा के लिए लड़ने हेतु अपने-अपने संघ बना लिए हैं ।। इसी प्रकार निन्दकों ने भी अपने संघों का निर्माण कर लिया है ।। इन संघों के अध्यक्ष छोटी-छोटी खबरों को बढ़ा-चढ़ा कर उन्हें पक्के माल में परिवर्तित करके निन्दापसन्द लोगों को बाँटने के लिए दे देते हैं ।। निन्दा के लिए इस प्रकार सामग्री तैयार करना बड़ी फुरसत का कार्य है, जिसे जल्दबाजी में सम्पन्न नहीं किया जा सकता ।। लेखक कहते हैं कि निन्दा दो भावों से की जाती है- मिशनरी भाव से तथा ईर्ष्या भाव से ।। ईर्ष्या भाव से प्ररित होकर निन्दा करने में वह आनन्द नहीं आता, जो आनन्द मिशनरी भावों से प्ररित होकर निन्दा करने में आता है, क्योंकि जो ईर्ष्या-द्वेष के कारण दूसरे व्यक्तियों की निन्दा करता रहता है, वह सदा दुःखी रहता है ।। उसकी दशा बहुत दयनीय होती है ।। ऐसा व्यक्ति स्वयं तो कुछ कर नहीं पाता, किन्तु दूसरे समर्थ व्यक्ति को देखकर इस तरह प्रलाप करने लगता है जैसे रात्रि में चाँद को देखकर कुत्ते भौंकने लगते हैं ।। निन्दक को कोई दण्ड देने की आश्यकता नहीं होती, क्योंकि वह तो निन्दा की जलन में स्वयं ही पीड़ित रहता है ।। मनुष्य की हीन-भावना तथा कर्महीनता की प्रवृत्ति ही उसमें दूसरों की निन्दा करने की भावना को जन्म देती है ।। दूसरों की निन्दा करके वह उन्हें तुच्छ तथा स्वयं को महान् प्रदर्शित करना चाहता है ।। वह दूसरों की निन्दा करके आत्म-सन्तोष की अनुभूति करने लगता है ।। उसकी यह कोशिश ऐसी है, जैसे कोई व्यक्ति बड़ी लकीर को मिटाकर, छोटी लकीर को बड़ा समझने लगे ।। WWW.UPBOARDINFO.IN

लेखक कहते हैं कि जैसे-जैसे निकम्मेपन की भावना बढ़ती जाती है, निन्दा करने की प्रवृत्ति भी बढ़ती जाती है ।। इन्द्र को बहुत बड़ा ईर्ष्यालु माना जाता है; क्योकि वह निठल्ला रहता है उसे खाने के लिए अन्न नहीं उगाना पड़ता, फल पाने के लिए पेड़ नहीं उगाने पड़ते तथा रहने के लिए महल नहीं बनाना पड़ता इसलिए उसे अपनी अकर्मण्यता के कारण अपनी अप्रतिष्ठा का भय बना रहता है, इसलिए वह कर्म करते हुए मनुष्यों को देखकर ईर्ष्या करने लगता है ।। कुछ लोगों के लिए निन्दा उनकी पूँजी के समान होती है ।। वे निन्दा को पूँजी समझते हुए भी अपना व्यापार बढ़ाने में लगे रहते हैं ।। ऐसे लोग दूसरों के जीवन से सम्बन्धित कलंकपूर्ण घटनाओं को बढ़ा-चढ़ाकर दूसरों को सुनाते हैं ।। कभी-कभी तो निन्दा रस में रूचि लेने वाले मात्र कल्पना के आधार पर ही किसी को बदनाम कर दिया करते हैं ।। ऐसे निन्दकों के विषय में दूसरे लोग जो भी समझते हों, पर वे अपने आप को सन्त-महात्मा समझकर स्वयं सन्तुष्ट होने का झूठा अनुभव करते हैं ।। आप इन लोगों के पास बैठकर ऐसा अनुभव कर सकते हैं ।। यहाँ लेखक उदाहरण देते हैं कि एक स्त्री अपने पति से अपनी सहेली के पति की बेईमानी के कार्यों की निन्दा कर रही थी और कह रही थी कि अगर सहेली की जगह मैं होती तो मैं ऐसे पति का त्याग कर देती परन्तु उसके पति के कहने पर मैं भी अमुक कार्य करता हूँ यह सुनकर वह स्तब्ध हो जाती है और वहाँ से चली जाती है, परन्तु त्याग नहीं करती ।। लेखक कहते हैं कि मित्र के चले जाने के दस-बारह घंटे बाद भी उसकी निन्दा का प्रभाव मेरे मन पर था परन्तु अब मुझे उतना रस प्राप्त नहीं हो रहा था जितना उसके साथ बैठकर हुआ था ।। निन्दा करने में बड़ा रस है इसलिए कवि सूरदास जी ने भी निन्दा के शब्दों को मीठा बताया है ।।

2 . लेखक ने निबन्ध में अपने मित्र की कौन-सी आदतों का वर्णन किया है ?

उत्तर– – लेखक ने अपने मित्र की आदतों का वर्णन करते हुए बताया है कि उनका मित्र अभिनय करने में निपुण, झूठ बोलने वाला, स्नेहसिक्त वाणी वाला, तथा निन्दा करने में निपुण है ।।

3 . ‘निन्दा रस’ से लेखक सेक्या अभिप्राय है ? WWW.UPBOARDINFO.IN

उत्तर– – ‘निन्दा रस से लेखक का तात्पर्य दूसरों की निन्दा करने में मिलने वाले आनन्द से है, जो व्यक्ति किसी दूसरे की निन्दा करके प्राप्त करता है ।। ।। दूसरों की निन्दा करके व्यक्ति शान्ति और तृष्टि प्राप्त करता है ।।

4 . निन्दा की महिमा कैसी है ?
उत्तर– – निन्दा की प्रवृत्ति निन्दा करने वाले को और श्रोता को अपरिमित शान्ति और सन्तोष प्रदान करती है ।। दो चार लोग एक जगह बैठकर निन्दा करने में इतने तल्लीन हो जाते हैं, मानो कुछ भक्तगण ईश्वर-भक्ति में तल्लीन हों ।। उन्हें निन्दा करने में, उन्हें वही आनन्द प्राप्त होता है, जो ईश्वर का भजन करने में भक्तों को प्राप्त होता है ।। निन्दकों का मन निन्दा करने में जितना अधिक एकाग्र होता है, आपस में उतना अधिक अपनापन, उतनी एकाग्रता और तन्मयता भक्तों में भी मिलनी कठिन होती है ।।

5 . निन्दा का उद्गम कैसे होता है ? WWW.UPBOARDINFO.IN
उत्तर– – निन्दा का उद्गम मनुष्य की हीन भावना और कर्म न करने की प्रवृत्ति से होता है ।। जब व्यक्ति अपनी हीनता को प्रकट नहीं होने देना चाहता है, तो दूसरों की निन्दा करके उसे तुच्छ सिद्ध कर देना चाहता है ।। वह यह दिखाने की कोशिश करता है कि दूसरा उससे तुच्छ है और वह उनसे महान् ।।

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