UP Board Solutions for Class 11 English Short Story Chapter 3 Drought पाठ का हिंदी अनुवाद free pdf

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Drought - कहानी का हिन्दी अनुवाद

गाँव का नाम काशीपुर था ।। यह एक छोटा-सा गाँव था किन्तु इसका जमींदार और भी अधिक छोटा था (अर्थात् छोटे मन का था) ।। तब भी उसके पट्टेदार किसानों में उसका सामना करने का साहस नहीं था ।। वह बहुत क्रूर था ।।

उस दिन उसके सबसे छोटे पुत्र का जन्मदिन था ।। दोपहर का समय था ।। जमींदार के घर पर पूजन कराने के बाद पुजारी तारकरत्न अपने घर की ओर जा रहे थे ।। मई माह का अन्त आ गया था किन्तु आकाश में बादल का एक टुकड़ा भी दिखाई नहीं दे रहा था ।। बारिश के बिना आकाश आग बरसा रहा था ।। खेत के अन्त में, सड़क के किनारे, गफूर जुलाहे का घर था ।। उस घर की कच्ची दीवारें खराब हो चली थीं, आँगन और सड़क एक हो रहे थे, तथा घर के अन्दर की लज्जा बाहर गुजरते हुए आदमियों की दया पर निर्भर थी ।।

“ऐ! गफूर! कोई अन्दर है?’ सड़क के किनारे के एक पेड़ की छाया में खड़े तारकरत्न ने पुकारा ।। “आपको क्या काम है? पिताजी बुखार में पड़े हुए हैं’, गफूर की दस वर्षीय छोटी-सी बेटी ने दरवाजे पर आते हुए कहा ।।
“बुखार! बुलाओ तो बदमाश को ।। ”


आवाज सुनकर बुखार में काँपता हुआ गफूर बाहर निकल आया ।। टूटी दीवार की ओर झुके हुए पुराने बबूल से एक बैल बँधा हुआ था ।। बैल की ओर संकेत करते हुए तारकरत्न ने जानना चाहा, “वहाँ मैं क्या देख रहा हूँ? क्या तुम्हें पता नहीं कि यह एक हिन्दू गाँव है और जमींदार स्वयं ब्राह्मण है? रोष और धूप की गर्मी से उसका चेहरा गहरा लाल हो रहा था ।। उनके शब्दों का क्रोध के कारण तीखा होना स्वाभाविक था ।। किन्तु उनके शब्दों के महत्व को समझने में अयोग्य गफूर ने उनकी ओर केवल देख भर लिया ।। “अच्छा’, तारकरत्न ने कहा, “मैंने इसको सुबह वहाँ बँधा देखा था और यह अभी तक वहीं है ।। अगर यह बैल मर गया तो तुम्हारा मालिक तुम्हारी खाल उतार लेगा ।। वह कोई साधारण ब्राह्मण नहीं है ।। ‘

“मैं क्या करूँ बाबा? मैं विवश हूँ ।। मुझे कुछ दिनों से बुखार आ रहा है ।। मैं उसे बाहर चराने के लिए नहीं ले जा सकता हूँ ।। मेरी हालत बहुत खराब है ।। ”

“क्या तुम उसे अपने आप चरने के लिए नहीं छोड़ सकते हो?”
“उसे कहाँ छोड़ दूँ, बाबा? लोगों ने अभी तक अपने धान को गाहकर अलग नहीं किया है ।। वह अभी तक खेतों में पड़ा हुआ है ।। .

भूसा भी इकट्ठा नहीं किया गया है ।। सब कुछ झुलसकर राख हो गया है….. घास का एक तिनका तक नहीं है ।। मैं उसे कैसे छोड़ दूँ, बाबा ।। वह किसी के धान में मुँह मारना शुरु कर सकता है या किसी का भी भूसा खाना चालू कर सकता है ।। ” तारकरत्न थोड़ा नरम पड़े ।। “किन्तु तुम कम-से-कम उसे कहीं छाया में तो बाँध सकते हो और मुँह चलाने के लिए दो-एक मुट्ठी भूसा भी दे सकते हो? क्या तुम्हारी बेटी ने भात नहीं बनाया है ।। उसे एक बर्तन में चावल का माँड़ भी नहीं दे सकते हो? उसे यही पिला दो ।। ‘ गफूर ने कोई उत्तर नहीं दिया ।। वह विवश दृष्टि से तारकरत्न की ओर देखता रहा और उसके दिल से एक गहरी आह निकल गई ।।

“समझा, तुम्हारे पास इतना भी नहीं है ।। तुमने अपने हिस्से के भूसे का क्या किया? क्या तुमने अपना पेट भरने के लिए उसे भी बेच दिया है ।। बैल के लिए एक गठरी भी बचाकर नहीं रखा? तुम कैसे निर्दयी हो!” इस प्रकार के निर्दयी दोषारोपण से ऐसा प्रतीत हुआ जैसे गफूर की बोलने की शक्ति ही समाप्त हो गई ।। “इस वर्ष मुझे अपने हिस्से का भूसा मिलने वाला तो था”, एक क्षण के संकोच के बाद गफूर ने धीरे से कहा, “किन्तु मेरे पिछले वर्ष के शेष लगान के हिसाब में मालिक ने वह सब ले लिया ।। मैं उनके पैरों पर गिरकर गिड़गिडा, “मान्यवर, आप हमारे भगवान और मालिक है ।। आपका राज्य छोड़कर मैं कहाँ जाऊँगा? मुझे थोड़ा-सा भूसा रख लेने दो ।। मेरे छप्पर पर भी भूसा नहीं रह गया है और हमारे पास केवल एक झोपड़ी है जिसमें हम दो-बाप और बेटी रहते हैं ।। इस बरसात के मौसम में तो हम छप्पर पर ताड़ के पत्तों की थेगली लगाकर किसी तरह काम चला लेंगे लेकिन बिना खाने-दाने के हमारे महेश का क्या होगा?’ “वास्तव में! तो तुम बैल से इतना प्यार करते हो कि उसे महेश कहकर पुकारते हो? यह तो एक मजाक है ।। ”

किन्तु उसका ताना गफूर की बुद्धि में नहीं घुस पाया ।। “लेकिन मालिक ने मुझ पर कोई दया नहीं की,” वह कहता गया ।। “उसने मुझे दो महीने चलने के लायक धान दिया है ।। मेरे हिस्से का भूसा उसके भण्डार में मिला लिया गया ।। महेश को उसमें से एक गट्ठर भी नहीं मिला ।। ” “अच्छा, तो क्या तुम उसके कर्जदार नहीं हो?” तारकरत्न ने स्थिर भाव से कहा ।। “क्या तुमको कर्ज लौटाना नहीं चाहिए? क्या तुम चाहते हो कि जमींदार तुम्हें पाले?”

“पर मैं उनका कर्ज कैसे उतारूँ? हम उनके लिए चार बीघा जमीन जोतते हैं लेकिन पिछले दो वर्षों में बरसात न होने के कारण धान की फसल खेतों में ही सूख गई ।। मेरे और मेरी लड़की के खाने तक के लिए पूरा अनाज नहीं है ।।

मेरी झोंपड़ी को देखिए ।। जब बरसात होती है तो मैं और मेरी बच्ची एक कोने में सिमटकर रात बिताते हैं ।। हम अपने पाँव भी नहीं फैला सकते ।। महेश की ओर देखिए ।। आप उसकी हड्डियाँ तक गिन सकते हैं ।। कृपा करके मुझे थोड़ा-सा भूसा उधार दे दीजिए ताकि उसे दो-एक दिन खाने के लिए कुछ मिल जाए ।। ” और गफूर धरती पर ब्राह्मण के चरणों में गिर पड़ा ।। “नहीं, नहीं! एक तरफ हो! मुझे घर जाने दे, देर हो रही है ।। ” तारकरत्न ने चलने की नीयत से कुछ मुस्कराते हुए हरकत की ।। “हे भगवान! यह तो लगता है कि मेरे लिए अपने सींग घुमा रहा है ।। मारेगा क्या?’ वे बैल के समीप से एकदम पीछे हटते हुए भय एवं गुस्से से चिल्ला पड़े ।।

गफूर लड़खड़ाकर अपने पैरों पर खड़ा हुआ ।। “वह एक मुट्ठी खाना चाहता है”, तारकरत्न के हाथ में चावल की गीली पोटली एवं फलों की ओर संकेत करते हुए गफूर ने कहा ।।

“खाना चाहता है? वास्तव में जैसा मालिक है वैसा ही जानवर भी है ।। स्वयं के पास तो भूसे का एक तिनका भी नहीं है पर खाने को चावल और फल अवश्य चाहिए ।। इसे ले जाकर कहीं और बाँध दे ।। कैसे सींग हैं! एक-न-एक दिन यह किसी को लहूलुहान करके जान से मार डालेगा ।। ” एक किनारे को थोड़ा-सा सरकते हुए पुजारी जी शीघ्रता से वहाँ से खिसक गए ।।

उनसे नजर हटाते हुए गफूर महेश को शान्त भाव से देखता रहा ।। जिसकी दोनों गहरी आँखों में पीड़ा और भूख भरी हुई थी ।। “एक मुट्ठी भी नहीं दी”, बैल की गर्दन और पीठ को थपथपाते हुए वह बुदबुदाया ।। “तुम तो मेरे बेटे हो, महेश’, वह फुसफुसाया ।। “तुम आठ साल तक हमारी सेवा करके बूढ़े हो चले हो ।। मैं तुम्हे भरपेट खाना भी नहीं दे सकता लेकिन तुम यह तो जानते हो कि मैं तुम्हें कितना प्रेम करता हूँ, जानते हो या नहीं?” महेश ने केवल गर्दन आगे बढ़ाकर तथा प्रसन्न होकर अपनी आँखें मूंद लीं ।।

“मुझे बताओ’, गफूर कहता गया, “इस भयानक वर्ष में मैं तुम्हें कैसे जीवित रखू? यदि मैं तुम्हें खुला छोड़ दूँ तो तुम किसी दूसरे के धान को खाना या किसी और के केले के पत्तों को चबाना शुरू कर दोगे ।। मैं तुम्हारे लिए क्या करूँ? तुम्हारे शरीर में कोई शक्ति शेष नहीं रह गई है-कोई भी तुम्हें नहीं लेगा ।। लोग कहते हैं कि मैं तुम्हें पशुओं के बाजार में बेच दूँ ।। ” इस विचार से उसकी आँखों में फिर से आँसू भर आए ।। अपने आँसूओं को अपने हाथ से पोंछता और इधर-उधर ताकता हुआ वह झोंपड़ी के पिछवाड़े से थोड़ा-सा बदरंग-सा हुआ पुराना भूसा लाया ।। “मेरे बच्चे, इसको जल्दी से खा ले, वरना….. ।। ” उसे महेश के सामने डालते हुए उसने विनम्रता से कहा ।।

“पिताजी ………” क्या है?”
“आओ खा लो’, गफूर की बेटी ने दरवाजे से बाहर देखते हुए उत्तर दिया ।। “क्यों क्या आपने फिर महेश को अपने छप्पर का भूसा दे दिया?” उसे यही भय था, “वह तो पुराना भूसा था- सड़ा जा रहा था’, शर्म में डूबते हुए उसने उत्तर दिया ।। “पिता जी मैंने आपको
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उसे खींचते हुए सुना ।। ” “नहीं बेटी, ऐसा तो नहीं ……. ।। ‘
“लेकिन पिता जी आप जानते हो कि दीवार कमजोर होकर गिर जाएगी………. ।। “

गफूर शान्त रहा ।। उसके पास झोंपड़ी के अलावा कुछ नहीं रह गया था ।। उससे अधिक अच्छी तरह और कौन जानता था कि अगर वह सावधानी नहीं बरतेगा तो वह दीवार अगले बरसात के मौसम को झेल नहीं पाएगी ।। उसमें बचा ही क्या था?
“अपने हाथ धो लो, और आकर खा लो ।। मैंने आपका भोजन परोस दिया है”, नन्हीं-सी बच्ची ने कहा ।। “मुझे भात का माँड़ दे दो, मुझे उसे खिलाने दो ।। ‘ वह तो बिल्कुल नहीं है, पिता जी वह तो बर्तन में ही सूख चुका है ।। “

लगभग एक सप्ताह बीत गया ।। शरीर से रोगी और चिन्ता का मारा हुआ गफूर अहाते में बैठा हुआ था ।। एक दिन पहले का गया हुआ महेश वापस नहीं लौटा था ।। वह स्वयं भी विवश था ।। बहुत सुबह से ही अमीना बैल को हर जगह पर तलाश चुकी थी ।। जब वह घर लौटी तो शाम की परछाइयाँ लम्बी हो चुकी थीं ।। “पिताजी, तुमने सुना? मानिक घोष ने महेश को काँजी हाउस भेज दिया है”, वह बोली ।। ‘क्या बकवास है ।। “

“हाँ, पिताजी यह सच है ।। उसके नौकर ने मुझसे कहा कि अपने पिताजी से कहो कि बैल को दरियापुर में खोज लें…….. ।। ” उसने किया क्या था?”

“वह उनके बाग में घुस गया, पिताजी ।। ‘ गफूर ने कोई उत्तर नहीं दिया ।। “उन्होंने बताया, तीन दिन बीत जाने पर पुलिस उसे पशुओं के हाट में बेच देगी ।। “

“बेच देने दे’, गफूर ने उत्तर दिया ।।

अमीना नहीं जानती थी कि पशुओं के बाजार का क्या अर्थ होता है ।। अमीना ने कई बार देखा था कि जब कभी महेश के सम्बन्ध में पशुओं के बाजार का नाम लिया गया तभी उसका पिता परेशान हो उठा था, किन्तु आज वह एक भी शब्द बोले बिना बाहर चला गया ।।

रात के अंधेरे में छिपकर गफूर चुपचाप बंशी की दुकान पर जा पहुँचा ।। ।।

“चाचा, तुम्हें मुझको एक रुपया उधार देना ही होगा”, गद्दी के नीचे एक पीतल की थाली रखते हुए उसने कहा ।। इस वस्तु से बंशी अच्छी तरह परिचित था ।। पिछले दो वर्षों में कम-से-कम पाँच बार तो वह उसकी जमानत पर एक-एक रुपया दे चुका था ।। उसने आज भी कोई ऐतराज नहीं किया ।।

अगली सुबह से महेश अपने रोजाना के स्थान पर फिर से दिखाई देने लगा ।। एक वृद्ध मुसलमान बहुत तीखी दृष्टि से उसे परखने में लगा हुआ था ।। थोड़ी दूरी पर, एक किनारे पर गफूर जमीन पर बैठा हुआ था ।। जाँच-परख समाप्त होने पर वृद्ध ने अपनी चादर की खूट

समाप्त होने पर वृद्ध ने अपनी चादर की छूट से दस रुपए का एक नोट निकाला तथा उसको बार-बार सहलाता हुआ बोला, “यह लो ।। मैं कुछ बचाकर नहीं ले जा रहा हूँ ।। पूरी कीमत अदा कर रहा हूँ ।। ”

अपना हाथ पसार कर गफूर ने रुपए तो ले लिए, किन्तु बोला कुछ नहीं ।। वृद्ध के साथ आए हुए दोनों व्यक्ति जैसे ही पशु के गले की रस्सी पकड़ने को हुए, गफूर उछल कर एकाएक खड़ा हो गया ।।

“उस रस्सी को मत छूना, कहे देता हूँ ।। सावधान रहना, बताए देता हूँ”, वह रूखे स्वर में चीख उठा ।। वे लोग भौंचक्के रह गए ।। “क्यों?” वृद्ध ने आश्चर्य से पूछा ।।

“क्यों की कोई बात नहीं है ।। वह मेरी सम्पत्ति है- मैं उसे नहीं बेचूँ खुशी”, उसने उसी स्वर में उत्तर दिया और नोट को फेंक दिया ।।

“लेकिन कल तो तुमने अग्रिम वाले रुपए स्वीकार कर लिए थे ।। ” उन तीनों ने एक ही स्वर में कहा ।। “वह भी वापस ले लो”, उनके ऊपर दो रुपए फेंकते हुए उसने उत्तर दिया ।। गफूर ने पड़ोसियों से चावल का माँड़ माँगा और महेश को खिलाया ।। उसके सिर व सींगों को थपथपाते हुए वह अस्पष्ट आवाज में उस पर लाड़ करते हुए बुदबुदाया ।।

जून का मध्य लगभग आ चुका था ।। जिस किसी व्यक्ति ने भारत के गर्मी के मौसम का आसमान नहीं देखा, वह नहीं समझ सकेगा कि गरमी कितनी भयंकर, कितनी कठोर हो सकती है ।। कहीं भी किसी प्रकार की राहत नहीं थी ।। आज तो यह सोचना भी असंभव लग रहा था कि किसी दिन आसमान का यह रूप बदलेगा, इस पर कोमल जल-भरे बादल छा जाएँगे ।। लगता था जैसे त आसमान दिन-प्रतिदिन लगातार जलता ही रहेगा और अन्त समय तक ऐसा ही होता रहेगा ।।

दोपहर को गफूर लौटकर घर आया ।। उसे किराए के मजदूर के रूप में काम करने का अभ्यास नहीं था और उसका बुखार उतरे हुए भी तो केवल चार या पाँच दिन ही हुए थे ।। उसका शरीर अभी तक कमजोर और थका हुआ था ।। वह काम की तलाश में बाहर गया था किन्तु बेकार रहा ।। उसे सफलता नहीं मिली ।। भूखा, प्यासा, थका हुआ, उसकी आँखों के सामने प्रत्येक वस्तु काली-सी दिखाई पड़ रही थी ।। “क्या खाना तैयार है, प्यारी अमीना” उसने आँगन से पुकारा ।।

बिना कोई उत्तर दिए उसकी लड़की खामोशी के साथ बाहर निकल आई और दीवार का सहारा लेकर खड़ी हो गई ।। “क्या खाना तैयार है?” बिना उत्तर पाए ही गफूर ने दोहराया ।। “क्या कहती है तू? नहीं? क्यों?”

“चावल नहीं हैं, पिताजी ।। ” “चावल नहीं हैं? तूने मुझे सवेरे से क्यों नहीं बताया?” “क्यों, मैंने तो आपको कल रात को ही बता दिया था ।। “

“मैंने तो कल रात को ही बता दिया था’, गफूर ने नकल करते हुए कहा ।। “कल रात बताई गई बात मुझे अब तक कैसे याद रहेगी?’ अपनी स्वयं की बोली की ध्वनि से उसका गुस्सा बढ़ता चला गया ।। “ठीक है, चावल नहीं है”, अपना चेहरा पहले से ही अधिक बिगाड़ कर वह गुर्राया, “तुझे इससे क्या करना है कि तेरे-बाप ने कुछ खाया है या नहीं? लेकिन महारानी जी को तो दिन में तीन बार पेट भरना लेना जरूरी है ।। आगे से मैं जब बाहर जाया करूँगा तो चावल को ताले में बन्द कर जाया करूँगा ।। ला, थोड़ा पानी ही पिला दे, प्यास से मरा जा रहा हूँ……… या तेरे पास पानी भी नहीं है क्या?”

अमीना पहले की तरह सिर झुकाए खड़ी रही ।। यह जानकर कि घर में पानी की एक बूंद भी नहीं है, वह गुस्से से फट पड़ा ।। अमीना के पास वह लपक कर गया और उसके मुँह पर एक जोरदार चाँटा जड़ दिया ।। मनहूस लड़की! तू सारे दिन क्या करती रहती है? इतने लोग मर रहे हैं- तूम क्यों नहीं मर जाती?’

लड़की के मुँह से एक शब्द भी नहीं निकला ।। उसने खाली घड़ा उठाया और चुपचाप अपने आँसू पोंछती हुई तीसरे पहर की चिलचिलाती धूप में बाहर निकल गई ।।

उसके बाहर चले जाने के अगले पल ही उसका बाप पश्चाताप से व्यग्र हो उठा ।। वह जानता था कि उसने उस बिन माँ की बच्ची को किस तरह से पाला है ।। वह जानता था कि इस स्नेही, कर्तव्यनिष्ठ, शान्त लड़की का कोई दोष नहीं था ।। जब उनके पास उतने चावल भी होते थे तब भी उनके पास भोजन पूरा नहीं पड़ पाता था ।। एक दिन में तीन बार का भोजन करना उनके लिए असंभव था ।। पानी न होने के कारण भी उससे छिपा हुआ नहीं था ।। गाँव के तीन तालाबों में से दो तो पूरी तरह सूख चुके थे ।। शिबू बाबू के निजी तालाब में जो थोड़ा बहुत पानी बचा था वह आम जनता के लिए नहीं था ।। दूसरे तालाबों की तलहटी में कुछ गड्डे खोद लिए गए थे ।। लेकिन वहाँ पर उस थोड़े से पानी के पीछे इतनी भीड़ और धक्कम-धक्का होती थी कि इस छोटी-सी लड़की का तो वहाँ तक पहुँच पाना ही असम्भव था ।। वह वहाँ घंटों खड़ी रहती थी और बहुत भीख माँगने पर यदि किसी ने उस पर दया कर दी तो वह थोड़ा-सा पानी लेकर घर आ पाती थी ।। वह यह सब जानता था ।। शायद आज वहाँ पानी बिल्कुल नहीं था या किसी को भी उस बालिका पर तरस खाने के लिए समय नहीं मिला था ।। कुछ-न-कुछ इसी तरह की बात अवश्य हुई होगी, उसने सोचा, और उसकी अपनी आँखें भी आँसुओं से भर आईं ।।

“गफूर! क्या तुम भीतर हो?’ किसी ने आँगन में से जोर से आवाज लगाई ।। जमींदार का सन्देशहवाहक आया हुआ था ।। “हाँ, मैं भीतर हूँ ।। क्यों?’ गफूर ने कडुवे स्वर में उत्तर दिया ।। “मालिक ने तुम्हें बुलाया है ।। चलो!” “मैंने अभी तक कुछ भी नहीं खाया है ।। मैं बाद में आऊँगा ।। ‘ गफूर बोला ।।

इस प्रकार की धृष्टता संदेशवाहक को असहनीय लगी ।। उसे भद्दी गालियाँ देता हुआ वह जोर से बोला, “यह मालिक का हुक्म है कि तुम्हें घसीट कर ले जाया जाए और तुम्हारी जमकर पिटाई की जाए ।। ”

गफूर दोबारा अपना नियन्त्रण खो बैठा ।। “हम किसी के गुलाम नहीं हैं”, उसने उसी प्रकार की भाषा में उत्तर दिया, “हम यहाँ रहने का किराया देते हैं ।। मैं नहीं चलूँगा ।। “

किन्तु इस संसार में छोटे आदमी के लिए ताकतवर के सामने विनती न करना न केवल बेकार है बल्कि खतरनाक भी है ।। सौभाग्य से छोटी आवाज बड़ों के कानों तक कठिनाई से ही पहुँच पाती है, नहीं तो न जाने क्या हो गुजरे? जब गफूर जमींदार की हवेली से लौटा और चुपचाप लेट गया तो उसका चेहरा और आँखें सूजी हुई थीं ।। इस सारे कष्ट का कारण महेश था ।। सुबह के समय जब गफूर बाहर गया था तब महेश ने अपनी रस्सी तुड़ा ली थी और जमींदार की जमीन में घुसकर फूल खा डाले थे और धूप में सूखता हआ अनाज खराब कर दिया था ।। आखिर में जब लोगों ने उसे पकड़ने की कोशिश की तो उसने जमींदार की सबसे छोटी लड़की को घायल कर दिया और बचकर भाग गया ।। यह सबकुछ पहली बार नहीं हुआ था ।। पिछले अनेक अवसरों पर तो गफूर को गरीब जानकर छोड़ दिया गया था ।। यदि वह और दूसरे अवसरों की भाँति चला जाता और जमींदार से माफी माँग लेता हो उसे शायद क्षमा भी कर दिया जाता, किन्तु इसके विपरीत उसने यह दावा कर डाला कि वह किराया देता है और वह किसी का गुलाम नहीं है ।। शिबू बाबू, जमींदार के लिए यह बात सीमा से अधिक हो गई थी ।। गफूर ने बिना किसी विरोध के मारपीट और अत्याचार सहन कर लिया ।। घर पर भी वह बिना एक शब्द बोले, एक कोने में पड़ा रहा ।। भूख और प्यास तो वह भूल ही चुका था किन्तु उसके अन्दर उसका कलेजा उसी तरह से जल रहा था

जिस तरह बाहर सूर्य जल रहा था ।। उसे कुछ भी होश नहीं था कि समय कैसे बीतता चला गया ।।

उसकी मूर्छा को एक लड़की की चीख ने तोड़ दिया ।। वह जमीन पर असहाय होकर पड़ी हुई थी ।। जो घड़ा वह ला रही थी वह नीचे गिर गया था और जमीन पर फैलकर बहते हुए उसके पानी को महेश चूस रहा था ।। गफूर पूरी तरह से अपना नियन्त्रण खो बैठा था ।। एक क्षण की भी प्रतीक्षा किए बिना उसने अपने हल का कुंडा उठाया था जो एक दिन पहले उसने मरम्मत के लिए निकाली थी और फिर दोनों हाथों से उसे पकड़कर गफूर ने उसको पूरी शक्ति से महेश के झुके हुए सिर पर दे मारा ।। केवल एक बार महेश ने सिर उठाने की कोशिश की किन्तु उसका भूख का मारा हुआ कमजोर शरीर एकदम जमीन में धंस गया ।। उसके कानों से खून की कुछ बूंदें गिर पड़ीं ।। उसका पूरा शरीर दो-एक बार हिला और फिर अपने आगे और पीछे वाले पैरों को पूरी लम्बाई में फैलाते हुए महेश मरा पड़ा था ।। “तुमने क्या कर डाला, पिताजी? अपना महेश मर गया ।। ” अमीना फूट-फूट कर रोने लगी ।।

गफूर न तो हिला-डुला और न उसने कोई उत्तर ही दिया ।। वह उन गतिहीन, गोल, काली चमकदार आँखों के जोड़े को अपलक घूरे जा रहा था ।। दो घण्टे बीतने से पहले गाँव के उस किनारे पर रहने वाले चर्मकार झुण्ड में आ गए और बाँस की एक बल्ली पर महेश को उठा ले गए ।। उनके हाथों में चमकते हुए छुरों को देखकर गफूर ने आँखें बन्द कर ली पर वह बोला कुछ नहीं ।।

पड़ोसियों ने उसे बताया कि जमींदार ने तारकरत्न को परामर्श लेने के लिए बुलवाया है ।। एक पवित्र पशु को मार डालने के लिए प्रायश्चित की रकम गफूर कैसे अदा करेगा?

गफूर ने इन बातों का कोई उत्तर नहीं दिया, बल्कि अपने घुटनों पर अपनी ठोड़ी टिकाए उँकडू बैठा रहा ।। “अमीना बेटी, आओ चलें”, रात के सन्नाटे में अपनी लड़की को जगाते हुए गफूर ने कहा ।।

वह आँगन में पड़ी सो रही थी ।। “कहाँ पिता जी? उसने आँखें मलते हुए पूछा ।। “फुलबेड़े के जूट मिल में काम करने’, गफूर ने कहा ।। लड़की ने उसकी ओर अविश्वासपूर्ण दृष्टि डाली ।। अपने सम्पूर्ण संकटकाल में वह फुलबेड़े जाने से कतराता रहा था ।। “वहाँ न तो कोई धरम है, न कोई सम्मान है, और न औरतों के लिए कोई एकान्त स्थान है”, उसने कई बार गफूर को कहते हुए सुना था ।।

“जल्दी कर मेरी बिटिया, हमें बहुत दूर जाना है”, गफूर ने कहा ।।

अमीना पानी पीने का कटोरा और अपने बाप की पीतल की थाली समेटने चली ।। “उनको वहीं छोड़ दें, बेटी ।। उनसे महेश का प्रायश्चित अदा हो जाएगा” ।। गफूर बोला ।।

रात के सन्नाटे में गफूर अपनी बेटी का हाथ थामकर निकल पड़ा ।। गाँव में कोई ऐसा नहीं था जिसे वह अपना कह सकता ।। किसी से उसे कुछ भी नहीं कहना था ।। आँगन को पार करके वह जब बबूल के पेड़ के पास पहुँचा तो उसके कदम गतिशून्य हो गए और वह फूट-फूटकर रोने लगा ।। “अल्लाह’, तारों से चमकते हुए काले आकाश की ओर मुंह उठाते हुए उसने कहा, “मुझे जितनी चाहे उतनी सजा दे ले-महेश तो प्यास से मरा है ।। किसी ने उसके चरने के लिए जमीन का एक छोटा-सा टुकड़ा तक नहीं छोड़ा ।। जमींदार के पापों को कभी माफ मत करना, उसने तेरी दी हुई घास उसे कभी नहीं खाने दी, उसने तेरा दिया पानी उसे कभी नहीं पीने दिया ।। ‘ फिर वे दोनों जूट मिल के लिए चल पड़े ।।

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